योगी आदित्यनाथ और नितीश कुमार मोदी बीजेपी को दे रहे भीतर से चुनौती।

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By~ नवल किशोर कुमार

लोकसभा चुनाव दिन-पर-दिन दिलचस्प होता जा रहा है। खासकर उत्तर भारत के राज्यों यथा उत्तर प्रदेश और बिहार में। इन दोनों राज्यों में कुल 120 सीटें हैं। उत्तर प्रदेश में 80 और बिहार में 40। जाहिर तौर पर दिल्ली में सरकार बनाने के लिए इन दोनों राज्यों में फतह जरूरी है। फिर चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा। पिछली बार इन दोनों राज्यों से भाजपा और उसके घटक दलों को कुल मिलाकर 102 सीटें मिली थीं। भाजपा के समक्ष चुनौती न केवल पिछले प्रदर्शन को दुहराने की है बल्कि बेहतर करने की है। वजह यह भी है कि इस बार कांग्रेस और उसके घटक दलों के बीच गठबंधन के कारण दक्षिण, मध्य और पूर्वोत्तर के राज्यों में भाजपा व उसके घटक दलों को पुरजोर चुनौती मिल रही है।

वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की चाल पर लगाम लगती दिख रही है। सबसे पहले उत्तर प्रदेश की बात करते हैं।

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन है। मायावती और मुलायम सिंह यादव के एक साथ आने के बाद भाजपा की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। सामाजिक समीकरणों के हिसाब से बात करें तो इस गठबंधन को करीब 42 फीसदी मत मिलने की संभावना है। इसमें यादव, मुसलमान और दलित वोट शामिल हैं। हालांकि भाजपा सपा-बसपा के आधार वोट में सेंध लगाने के लिए जातिगत दांव खेल रही है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश में इस बार का लोकसभा चुनाव जितना महत्वपूर्ण नरेंद्र मोदी के लिए है, उससे कहीं अधिक योगी आदित्यनाथ के लिए है। एक वजह यह भी कि आरएसएस का एक धड़ा उन्हें देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है। यह महत्वकांक्षा कई अवसरों पर योगी आदित्यनाथ भी प्रकट कर चुके हैं। दूसरी वजह यह कि इस बार यदि मायावती-अखिलेश की बाजी चल गयी तब आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी इसका असर दिखेगा। वैसे भी गोरखपुर और फूलपुर में हुए उपचुनाव में मायावती-अखिलेश की जुगलबंदी का असर योगी आदित्यनाथ देख चुके हैं।

लिहाजा योगी आदित्यनाथ के समक्ष संकट यह है कि वे न तो राजनाथ सिंह जैसे घाघ को कोई मौका देना चाहते हैं और न ही मायावती-अखिलेश को जीतने का।

ऐसे ही हालात बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की है। वहां कांग्रेस महागठबंधन में शामिल है। लिहाजा यह कहना गैर वाजिब नहीं है कि इस बार चुनाव परिणाम में बदलाव होंगे। नीतीश कुमार की त्रासदी यह है कि वे बिहार में अपना खूंटा मजबूत रखना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें भाजपा के खूंटे को कमजोर करने की चुनौती है। यह दिख भी रहा है। यहां तक कि नरेंद्र मोदी के साथ चुनावी सभाओं को संबोधित करने के दरम्यान भी नीतीश इस बात का ख्याल रख रहे हैं कि उनकी अपनी छवि बरकरार रहे। इसके लिए वे भाजपा से अलग अपनी उपलब्धियों को जनता के समक्ष रख रहे हैं।

दरअसल, नीतीश कुमार की रणनीति यह है कि इस बार लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी अधिक से अधिक सीटें जीते। यदि भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में हो तो वे केंद्र में अधिक से अधिक हिस्सेदारी ले सकें। इसका फायदा तभी मिलेगा जब भाजपा को जदयू से कम सीटें आए। वहीं नीतीश कुमार इस विकल्प पर भी विचार कर रहे हैं कि यदि भाजपा के बजाय कांग्रेस गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में रहे तब भी वह सरकार का हिस्सा बनें। इसके लिए भी जदयू का भाजपा पर बीस पड़ना जरूरी है।

बहरहाल, यह तो तय है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा की चुनौती केवल कांग्रेस व अन्य क्षेत्रीय क्षत्रप ही नहीं हैं, उसे असली चुनौती वे भी दे रहे हैं जो इन दोनों राज्यों में एनडीए की बागडोर संभाल रहे हैं।

Via~ – नवल किशोर कुमार

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