दलित पैंथर ने गीता का दहन क्यों किया?

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By- डॉ सिद्धार्थ रामू ~

दलित पैंथर सार्वजनिक सभाओं में न केवल उन धार्मिक ग्रंथों के खिलाफ बोलते थे, जो जातिगत अत्याचारों के स्त्रोत थे, वरन वे इन ग्रंथों के सार्वजनिक दहन की धमकी भी देते थे. इस तरह के पहले आयोजन के लिए शिवाजी पार्क को चुना गया, जहाँ शिवसेना अपनी रैलीयां आयोजित किया करती थी.

जब दलित पैंथर ने धार्मिक ग्रंथों के बारे में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया, उस समय मुंबई में नगरनिगम चुनाव होने जा रहे थे, जिनमें रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया, शिवसेना का समर्थन कर रही थी. हमने पहले ही इन चुनावों का बहिष्कार करने की घोषणा कर दी थी, जो गुप्तचर सेवा और पुलिस मशीनरी के जानकारी में था. राजा ढाले ने गोरेगांव, मुंबई, में एक आमसभा में गीता को गाय चराने वाले एक व्यक्ति की लिखी हुई मूर्खतापूर्ण पुस्तक बता कर शिवसेना को अत्यंत क्रोधित कर दिया था. शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने इस पर गंभीर आपत्ति लेते हुए घोषणा कर दी थी कि उनकी पार्टी, हिन्दुओं के धर्मग्रंथों का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगी. दलित पैंथर ने इस चुनौती को स्वीकार किया. इससे ठाकरे सकते में आ गए क्योंकि वे आरपीआई का समर्थन चाहते थे और इसके लिए ज़रूरी था कि इस मुद्दे को ज्यादा हवा न दी जाय.

छह मार्च 1973 को हमनें नायगांव, मुंबई के ललित कला भवन के सामने खुले स्थान पर एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया, जिसमें लोगों से चुनाव का बहिष्कार करने का आह्वान किया गया. मैंने नामदेव ढसाळ, जो पुणे में थे, को तार भेज कर कहा था कि वे शिवाजी पार्क में गीता दहन कार्यक्रम में मौजूद रहें. यह दहन, नायगांव की सभा के बाद किया जाना था.

करीब 500 युवकों ने तिलक ब्रिज पार कर दादर (पश्चिम) की ओर बढ़ना शुरू किया, जहाँ चैत्यभूमि और शिवाजी पार्क दोनों हैं. रास्ते में, शिवसेना की एक चुनाव सभा चल रही थी, जिसे वरिष्ठ नेता मनोहर जोशी संबोधित कर रहे थे. हमारे युवकों ने शिवसेना के खिलाफ और दलित पैंथर जिंदाबाद के नारे लगाये परन्तु भीड़ ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. आधी रात के आसपास हम लोग शिवाजी पार्क पहुंचे, जहाँ पुलिस का दस्ता हमसे मुकाबला करने को तैयार था. जोन के डीसीपी और एफ डिवीज़न के एसीपी आगे थे, और उनके पीछे थी पुलिसकर्मियों की एक मानव श्रृंखला. पुलिसकर्मी हेलमेट पहने हुए थे और उनके हाथों में लाठियां थी. स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण थी और कुछ भी हो सकता था.


मैंने भूमिका स्वरुप कुछ शब्द कहे, जिसके बाद ढाले ने मोर्चा संभाला. उन्होंने भीड़ से पूछा कि क्या उन्हें मालूम हैं कि वहां आने का क्या उद्देश्य है? उत्साह से भरी भीड़ ने हाँ में जवाब दिया. इसके बाद, ढाले ने एक संक्षिप्त भाषण दिया, जिसमें गीता दहन की आवश्यकता का वर्णन किया गया. हम इस मुद्दे पर अक्टूबर 1972 से लेकर मार्च 1973 तक बात करने आ रहे थे और दलित पैंथर ने हिन्दू धर्म के बारे में डॉ आंबेडकर के विचारों पर एक पुस्तिका भी प्रकाशित की थी. यह पुस्तिका, डॉ आंबेडकर द्वारा साप्ताहिक मायभूमि को 33 साल पहले दिए गए एक साक्षात्कार पर आधारित थी. हमारे सदस्य इस पुस्तिका को पढ़ चुके थे. ढाले ने गीता की एक प्रति अपनी जेब से निकली और साठे ने उन्हें माचिस की डिब्बी दी. ढाले ने गीता में आग लगा दी.

( दलित पैंथर: एक आधिकारिक इतिहास, फारवर्ड प्रेस से प्रकाशित, पृ.86,87,89)

~ डॉ सिद्धार्थ रामू

वरिष्ठ पत्रकार

संपादक-फारवर्ड प्रेस

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