बी जे पी की तानाशाही और कशमीर का दुख

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कशमीर के हालात से इन दिनो कौन वाक़िफ़ नहीं है। मुल्क ही नहीं बल्के पूरी दुनिया में इस तानाशाही फ़ैसले का ही तज़किरा है। कशमीर मुद्दे पर अलग अलग मुअक़्क़िफ़ रखने वालों की अलग अलग राय हो सकती है। लेकिन कशमीर के अस्ल हालात क्या हैं इस वक़्त ये या तो ज़ालिम बता सकते हैं या मज़लूम। और कशमीर के के हालात आने वाले वक़्त में क्या होंगे इसकी ख़बर हमें ये बिकाउ मीडिया दे ही रहा है। हालांके हर शख़्स जो ज़रा भी समझ रखता है और सोचने समझने की सलाहियत रखता है वो जानता है के कितने बुरे हालात से अभी कशमीर को गुज़रना है। ज़रा ग़ौर करते हैं कशमीर के मौजूदा हालात पर।

 

कशमीर से अनुच्छेद 370 हटा दिया गया है और इसमें कशमीर की भी कोई राय नहीं ली गई है। सदर ए मुमलकत ने सूबे के निगरां की रज़ामंदी को ही सूबे की रज़ामंदी मान लिया है। सभी अहम कशमीरी लीडरों को नज़रबंद कर दिया गया है।

पूरे इलाक़े में फ़ौजी दस्ते तैनात कर दिये गये हैं। कशमीर के लोग बुरी तरह डरे हुये हैं। और वो कशमीरी जो काम या पढ़ाई के सिलसिले‌ में दीगर शहरों में हैं वो भी घर वालों से बात ना हो पाने की वजह से बुरी तरह परेशान हैं। इंटरनेट और कॉलिंग सब बंद है। पूरा कशमीर ख़ौफ़ के जहन्नम‌ में जल रहा है और बाक़ी मुल्क जश्न मना रहा है। कशमीर से 370 हटाने के साथ साथ सूबे का दर्जा भी छीन लिया गया है। अब कशमीर कोई सूबा नहीं बल्के इसे तोड़ कर दो अइलतों में बदल दिया गया है जहां मरकज़ी हुक़ूमत है। कशमीर को सियासी ऐतबार से अपाहिज कर दिया गया है। कशमीर के लोग बुरी तरह डरे हुये हैं और शायद मौजुदा हालात से ही नहीं बल्के कहीं न कहीं आने वाले हालात से भी। क्यूंकी वो जानते हैं के आगे चलकर इस दर्जा हालात ख़राब होंगे के ज़िन्दगी मौत का तवाज़ुन बिगड़ जायेगा। वो जानते हैं के सरकार के इस तानाशाही फ़ैसले की क़ीमत कशमीरयों को किस तरह अदा करनी होगी।

 

मोदी सरकार का कहना है के ऐसा करने से दहशत गर्दी का बिल्कुल‌ ख़ात्मा हो जायेगा। घाटी में अमन चैन क़ायम किया जा सकेगा। रोज़गार लाया जा सकेगा और तरक़्क़ी के नये रासते खुलेंगे।

ग़ौर कीजिये के कशमीर में जो हालात रहे हैं और जो इस वक़्त वहां का हाल‌ है क्या उसमें किसी भी तरह की तरक़्क़ी के बारे में सोचा जा सकता है।

मोदी सरकार ने तो दहशत गर्दी की कमर नोट बंदी के ज़रिये ही तोड़ दी थी। तो अब समझ नहीं आता के किस दहशत गर्दी की बात ये दोगली सरकार कर रही है।

समझ नहीं आता के ना जाने कौन से एेसे तरक़्क़ी आवर काम थे के जिन के लिये 370 का हटना ज़रूरी था। बिना अवाम का भरोसा जीते ये फ़ैसला निरी तानाशाही के सिवा कुछ भी नहीं।

ये सब वो सवाल हैं जो पूछे जाने चाहिये थे लेकिन नहीं पूछे जायेंगे। हर ज़ुल्म को मन्तिक़ी पैमानो पर रख कर बराबर कर लिया जायेगा। लेकिन कोई सवाल नहीं किया जायेगा क्यूंकी सवाल पूछने वालों के मुंह पहले से भर दिये गयें। और सवाल ना होने की एक दूसरी वजह है एक ख़ास तरह की ज़हनियत जो जो लोगों के दिल और दिमाग़ में इस दर्जा घर कर चुकी है के सवाल ही नहीं करने देगी।

इस ज़हनियत के मारे हुये लोग तो जश्न मनायेंगे। गालियां देंगे कशमीरियों को। वहां की औरतों और बच्चियों को सेब बता कर घर ले आने की बातें करेंगे। वहां के बेगुनाह मासूमों की मौतों को सही साबित करने की हर मुम्किन कोशिश करेंगे। हर एक जब्र को, हर एक ज़ुल्म को कशमीरी पंडितों पर हुये ज़ुल्म से जस्टिफ़ाय कर लिया जायेगा। और कशमीर ही नहीं बल्के कशमीर से बाहर भी कशमीरीयों को मारा पीटा जायेगा।

 

लेकिन ये सब क्यूं हो रहा है। क्या मोदी सरकार कशमीरी मुसलमानों के लिये फ़िक्रमंद है। क्या बहुजनों और मुसलमानो के मुतअल्लिक़ इस पार्टी के ख़्यालात बदल गये हैं।

नहीं! ऐसा नहीं है। कशमीर के मौज़ूअ पर बात शुरू होते ही कशमीरी पंडितों की आड़ में नफ़रतों की उल्टियां करने वालों को ना तो कशमीरी पंडितों से कोई लगाव है ना उनके घर दोबारा बस जाने से। बस उसकी आड़ में ये नफ़रत की खाई जो इन्हों ने ख़ुद से खोदी है में पूरे मुल्क को‌ धकेलना चाहते हैं।

इस मुद्दे को संजय टीकू से बेहतर कोई नहीं बयान कर सकता। संजय टीकू 1990 दहशत गर्द अलगाव वादी कारगुज़ारियों के बाद भी ना सिर्फ़ घाटी में मुक़ीम हैं बल्के वहां आज भी रहने वाले 802 कशमीरी पंडितों के परिवारों के हुक़ूक़ के लिये लड़ने वाली तंज़ीम के सरबराह हैं।

उनका कहना है के 370 हटाने की ये काग़ज़ी कारवाही बहुत ख़तरनाक है। जब के एक वक़्त हुआ 370 अपना वुजूद बहुत पहले खो चुकी है।

वो कहते हैं के बेघर पंडितों की बात तो भूल ही जायें मौजूदा पंडितो पर भी इसी ख़तरे से दो चार होने की नौबत आ गई है। हालात 1990 से ज़्यादा ख़राब हो चले हैं।

संजय कहते हैं के जुनूबी कशमीर और अनंतनाग के कई परिवारों को पुलिस ने कशमीर से बाहर भेज दिया है। आख़िर क्यूं? लेकिन ये भी सोचने की बात है के जो लोग कशमीर में रहने वाले 802 हिंदू परिवारों का दर्द नहीं समझ सकते, उनके ख़ौफ़ को महसूस नहीं कर सकते वो घाटी में तीस सालों से मिलिट्री हुक़ूमत और दहशत गर्दी साथ साथ झेलने वाले मुसलमानों का दर्द क्या समझेंगे।

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