भोजपुर बिहार का पिछड़ा वर्ग आंदोलन बनाम भूमिहारो का ब्राह्मण – सामंतवाद

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By~Manish Ranjan

:: भोजपुर और कैन्हैया ::

भोजपुर …. आंदोलन के बारे में कल्याण मुखर्जी लिखते हैं :
” 1967 के आम चुनाव में सहार चुनाव क्षेत्र से जगदीश महतो के साथी रामनरेश राम चुनाव लड़ रहे थे। 17 फरवरी 1967 को, वोट वाले दिन, वोट डालने गए जगदीश मास्टर ने एक भूमिहार को वोटों की गड़बड़ी करते पकड़ा। भूमिहार लोग बहुत दिन से इस निडर और अख्खड़ कोइरी को सबक सिखाने का मौका तलास ही रहे थे। जैसे ही जगदीश मास्टर ने उस भूमिहार को पकड़ा, चारो ओर से भूमिहारो ने उनपर हमला कर दिया और इतना पीटा की अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। अपमान और क्षोभ से ग्रस्त जगदीश मास्टर ने उसी दिन संकल्प किया कि 1930 के दशक में शुरू हुवे युद्ध, जो बाद में समाप्त हो गया था, उसे जारी करना पड़ेगा।”
यहाँ 1930 के दसक के जिस युद्ध का इशारा है वह त्रिवेणी संघ द्वारा भोजपुर जिले में शुरू किए गए संघर्ष की ओर है। यह संघर्ष पिछड़े पीजेंटरी द्वारा छेड़ा गया था जो कि ब्राह्मणवाद-सामंतवाद के विरुद्ध और अपने हक-सम्मान के लिए था। यह स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ संघर्ष था। शुरू में इसके पीछे कोई सिद्धांत या वाद नही था। इसका एकमात्र उद्देश्य आत्म-सम्मान की जिंदगी था और इसे सुनिश्चित करने के लिए सत्ता-व्यवस्था में हिस्सेदारी थी । इस तरह स्पष्ट है कि भले ही किसी बाहरी आंदोलन या वाद से शुरू में इसका जुड़ाव नही था पर इसके लक्ष्य और कार्यक्रम में सेल्फ-रेस्पेक्ट और प्रतिनिधित्व आंदोलन का जिन अंतर्निहित था।
यह आंदोलन अपने मूल उद्देश्य में बहुत कामयाब रहा। इसने शाहाबाद जिले में पिछडो में व्यापक सामाजिक-राजनैतिक जागरूकता का संचार किया। यह आसान नही था। बहुत मार-पीट हुवा , कुछ हत्याएं भी हुई और केश-मुकदमा का तो कहना ही नही। इस संबंध में दो मुकदमा का जिक्र बहुत प्रासंगिक है , एक आरा में मर्डर केश और दूसरा गया में इलेक्शन केश। पर उसका विस्तृत जिक्र और कभी …
इसकी विशेष खासियत यह भी थी कि इसे केवल और केवल पिछड़े लोग चला रहे थे। वैसा निच्छका पिछड़ा आंदोलन अभी आज तक नही चला। कही न कही घुसपैठ हो ही जाती है और सब गुड़-गोबर हो जाता है। इससे निकले लोग 1957 से ही विधायक बनने लगे। ऐसे लोगो मे दिनारा से रामअशीष सिंह और कुर्था से रामचरण बाबू उल्लेखनीय हैं। ये दोनों ही नही वल्कि इस आंदोलन के मूल से जुड़े सभी लोग सोसलिस्ट पार्टी में ही गए और वही से विधायक सांसद बने। बाद में जुड़े लोग कांग्रेस में भी गए, लेकिन यह आंदोलन पर प्रश्न नही हो सकता, क्योकि की जब कोई भी धारा बलवती हो जाती है तो उसमें सांप-बिच्छू और खर-पतवार भी आ मिलते ही हैं।
अब पुनः कल्याण मुखर्जी के शब्दों में:


” भूमिहारो के मसीहा सहजानंद सरस्वती और त्रिवेणी संघ के सिद्धांतकारों के बीच कोई पुल नही बनाया जा सका। हालांकि संघ के सदस्य मिले-जुले संघर्ष के बारे में सहजानंद का संदेश सुनने के लिए भारी संख्या में इकठ्ठा होते थे, लेकिन उनपर भूमिहार होने का ठप्पा लगा रहा। पटना जिले में बिहटा में स्वामी सहजानंद जी के आश्रम पर जिस समय केसरी मास्टर(त्रिवेणी संघ के नेता) पहुँचे, रात हो चुकी थी। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि स्वामी के आसपास जितने लोग थे वे सभी भूमिहार जाति के लोग थे। इससे घबराकर “त्रिवेणी संघ” का यह नेता अँधेरे में ही वहाँ से खिसक गया।”
इस उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है कि सहजानंद केवल भूमिहारो का नेता था और किसान नेता के तौर पर अपने को प्रोजेक्ट कर रहा था (जैसे आज कैन्हैया के मामले में हो रहा) पर त्रिवेणी संघ के लोग उसके इस छदम को अच्छी तरह से समझ गए थे । इसीलिए वह कोई घालमेल नही कर सका और संघ पूर्णतः अपने मुद्दे पर हमेशा डटा रहा। जैसे आज कैन्हैया के मामले में महागठबंधन नेतृत्व ने किया है।
50 का दसक शुरू होने से पहले ही त्रिवेणी संघ का मूल चरित्र अ-राजनैतिक हो गया। उसके संस्थापक लोग अपने को केवल सामाजिक-सांस्कृतिक मामले तक सीमित कर लिए। फिर भी इसके जो लोग राजनीति में गए वे भले ही सोसलिस्ट पार्टी में ही गए पर वहाँ घालमेल शुरू हो चुका था। सत्ता का अंतर्निहित दोष से वह मुक्त नही था और सवर्ण लोग भी बड़े पैमाने पर घुसपैठ ही नही वल्कि नेतृत्व में भी आ गए थे। त्रिवेणी संघ का वास्तविक चरित्र वहाँ हासिये पर ही था। ऐसा करने-कराने में लोहिया जी की बड़ी भूमिका थी।
इसी घुसपैठ का कारण था कि सहार विधानसभा के जिस चुनाव का ऊपर जिक्र है जहाँ जगदीश मास्टर पर हमला किया गया था, वहां हमलावर भूमिहार, प्रजा सोसलिस्ट पार्टी के तरफदार थे और प्रजा सोसलिस्ट पार्टी उम्मीदवार राजदेव राम के पक्ष में गड़बड़ कर रहे थे जिसे रोकने के कारण मास्टर साहब पर जानलेवा हमला किया गया था।
17 फरवरी 1967 के बाद जगदीश मास्टर की दुनिया ही बदल गई। उनकी पत्नी ने सिंदूर और चूड़ी त्याग दिया जैसे विधवा हों। मास्टर साहब कहते , “इनकी शोभा 17 फरवरी 1967 तक ही थी – अब इनका कोई अर्थ नही है।”
ऐसे में एक दिन मास्टर साहब अपने साथी रामेश्वर अहीर के साथ अदालत में गए और वहां दोनों ने एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करके अपने पुस्तैनी जमीन पर से अपने दावे को त्याग दिया। अब सारी दुनिया उनका परिवार हो गया था। अब वे रात-दिन दोस्तो के साथ मिलकर संगठन बनाने में लग गए। और तब आया अप्रैल 1970। इसी साल 14 तारीख को बाबा साहेब अंबेडकर के जन्म दिन के अवसर पर आरा में एक विशाल जुलूस निकाला गया जिसका नेतृत्व जगदीश महतो, रामेश्वर अहीर और लताफल हुसैन आदि नेता कर रहे थे । यह जुलूस अनाइठ नामक गाँव से निकलकर “हरिजिनिस्तान लड़ के लेंगे” गाते हुवे रमना मैदान तक गया। वहां सभा हुई और सभी नेताओं के जोड़दार भाषण हुवे। इस प्रदर्शन में बहुत बड़ी संख्या में पिछड़ी जातियों के किसानों और खेतिहर मजदूरों ने हिस्सा लिया था। खैर लंबा इतिहास है …

इसी एक धारा के प्रतिनिधि के तौर पर आज आरा में महागठबंधन समर्थित बामपंथी कैंडिडेट हैं राजू यादव। तीसरी पीढ़ी सदस्य ..
जैसे हम देख चुके हैं कि 30 के दसक में शुरू हुवे इस आंदोलन में कोई सवर्ण घुसपैठ नही हो सका था। जब मूल आंदोलन अलग हुवा और बाकी लोग राजनीति में गए तो वहां पूरी तरह घालमेल हो गया और सब गुड़/गोबर होने लगा। सुरु के नेताओं का संघर्ष और त्याग तपस्या व्यर्थ जाने लगा। तब पुनः जगदीश मास्टर और रामेश्वर अहीर जैसे अनेक नेताओं ने अपना सर्वश्र बलिदान देकर संघर्ष को धार दिया। तब जाके सहार बना जिसका जिक्र करते हुवे शहीद जगदेव प्रसाद भी कहते थे कि “पूरे बिहार को सहार बना दो”
हालांकि बाद में यहाँ भी खूब घालमेल हुवा जिससे एक बार फिर अपेक्षित रिजल्ट नही निकला। फिर भी बहुत बदलाव हुवा और आज सालों से बिहार की राजनीति पर पिछड़ा कहेजाने वाले नेतृत्व का जो दबदबा है तो यह उन्ही संघर्षों का परिणाम है। पर दूसरी तरफ ये भी स्पष्ट है कि धरातल पर आम लोगों के जिंदगी में समता का अभाव है और सामंतों-ब्राह्मणवादियों को अग्रता प्राप्त है तो वह इन्ही घालमेलों का दुष्परिणाम है।
अब इससे सबक लेते हुवे हमे आज उन घालमेलों से वैसे ही बचना पड़ेगा जैसे स्वामी भूमिहारानंद से हमारे पूर्वज बचे थे। आज इतना तो संतोष है ही कि बाल भूमिहार कैन्हैया के घालमेल से हम बच गए हैं पर भविष्य में भी घालमेल न हो , यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए ।
– जय मूलनिवासी। हम 85 – भारतवासी।

Via~Manish Ranjan

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