मनीषा बांगर, एक परिचय

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मनीषा बांगर आज के समय में एक जाना माना नाम है जो जाना जाता है अपनी अनेकों सामाजिक गतिविधियों के कारण। और जिस प्रकार अपना पूर्ण जीवन दे दिया एक ऐसे समाज को जिसके पक्ष में बोलने वाले गिने चुने लोग ही थे। आज के समय में मनीषा बांगर एक नाम भर नहीं रह गया है बल्कि एक आवाज़ बन गया है। आवाज़ उन दबे कुचले लोगों की जो आज़ादी के बाद भी आज़ाद नहीं हो सके हैं। जिनके पैरों में मज़हब की बेड़ियां तो गले में जाति की ज़ंजीर पड़ी हुई है। जिनकी बहुत सतही और बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं की जा रहीं। जिनके पास शिक्षा, स्वास्थ और रोज़गार का भी अभाव है। और उस समाज की इन बहुत बुनियादी ज़रूरतों पर बात करने वाला, आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है। और जो आवाज़ यदा कदा उठती भी है तो उसे दबाने का हर सम्भव प्रयास किया जाता है।

मनीषा बांगर उन्हीं आवाज़ों में से एक एैसी तेज़ आवाज़ है जिसे दबाने के प्रयास तो ख़ूब किये गये लेकिन ये आवाज़ हर बार और गरज कर सामने आई। आज वो समय है के उनके समर्थक हों या उनके विरोधी सब उन्हे जानते भी हैं और मानते भी हैं। ओ बी सी, एस सी, एस टी और पसमांदा मुस्लिम समाज मनीषा बांगर को सर आँखों पर रखता है। एक लम्बे अंतराल के बाद कोई ऐसी नेत्री सामने आई है। हाल ही में हुये लोकसभा चुनाव में नितिन गडकरी जैसे दिग्गज़ नेता की नींदें उड़ाने वाली मनीषा बांगर ने चुनाव में वो शानदार प्रदर्शन किया है के उनके विरोधी अचंभित हैं। मनीषा बांगर चुनावी मैदान में अब आई हैं लेकिन मनीषा बांगर के इस स्तर के समर्थन का कारण राजनीति नहीं। उनके समर्थक इसलिये उनके साथ नहीं क्योंकी उन्होंने कोई चुनावी वादा उनसे कर दिया है बल्कि इसलिये हैं के मनीषा बांगर ने एक लम्बे समय तक इन तमाम लोगों की सेवा की है। ज़मीनी स्तर पर काम किया और वो सारे काम किये जो आम तौर पर हमारे नेता बड़े बड़े वादे करने के बाद भी नहीं कर पाते हैं। अपने चिकित्सक होने के धर्म के साथ किस तरह उन्होंने इन लोगों की आवाज़ बनना स्वीकार किया। कैसे वो बामसेफ़ जैसी संस्था से जुड़ीं और अपना सारा का सारा समय उन लोगो को दिया ये सब हम इस लिखित वार्तालाप में जानेंगे।

मनीषा बांगर के नाम को आज किसी परिचय की आवश्यकता नहीं लेकिन उनके बारे में बहुत सी एैसी बातें हैं जो उनके समर्थक तथा उनसे प्रेम करने वाले लोग जानना चाहते हैं और जो अभी तक छुपी हुई हैं।
इसी बात को ध्यान में रखते हुये मनीषा जी से विस्तारित वार्तालाप यहां प्रसतुत है जिसमें मनीषा जी ने हमारे हर प्रश्न का उत्तर बहुत तसल्ली से दिया है।
हम आभारी हैं मनीषा जी के के अपने बहुत वयस्त जीवन से हमें समय दिया, अपने चाहने वालों को समय दिया।

प्रश्न 1 – मनीषा जी, अपने पारिवार और अपने बचोन के बारे में बतायें और अपनी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा के बारे में भी।

उत्तर – मेरा सम्बंध नागपुर से है। यहीं पैदा हुई और यहीं परवरिश भी पाई। मेरी माँ अमरावती से हैं और पिताजी यहीं नागपुर से। मेरे दादा जी नागपुर की ही एक कॉलोनी (मिल वर्कर कॉलोनी) में रहते थे और एक मिल में काम करते थे। आर्थिक रूप से उतने मज़बूत नहीं थे लेकिन शिक्षित और सभ्य थे। शिक्षा को ले कर बहुत जागरूक थे। परवरिश कुछ इस तरह हुई थी के एैसे हालात में भी पूर्वी नागपुर मुन्सिपल कॉर्पोरेशन के वाइस प्रेसिडेंट रहे और साथ ही साथ यूनियन लीडर भी। उनका नाम बहुत सम्मान से लिया जाता था। पाँच भाई दो बहनों के इस परिवार में शिक्षा का ज़ोर शोर आरम्भ से रहा। ये १९४० तथा १९५० के मध्य की बातें हैं जब मिल वर्कर कॉलोनी में आये दिन तरह तरह के विरोध प्रदर्शन होते रहते थे। इसी कॉलोनी में बड़ी संख्या में ओ बी सी, एस सी, एस टी तथा पसमांदा समाज के लोग रहते थे‌। कुछ ईसाई लोग भी और ये सब डॉक्टर अम्बेडकर के विचारों से बहुत प्रभावित थे।

ये सब बातें हमें हमारे बड़े पापा से पता चलीं। वो ख़ुद भी बाबा साहब के विचारों से बहुत प्रभावित थे और इलाक़े के पहले आई एस अॉफ़िसर भी थे जो बहुजन समाज से सम्बंध रखते थे। बड़े पापा उन कुछ एक लोगों में से थे जिन्होंने नौजवानों को कम्यूनिस्ट विचारों से बचा कर रखा। यही वो ज़माना था जब कम्यूनिस्ट और कांग्रेसी विचारों के लोग अपने पैर जमाने का भरसक प्रयास कर रहे थे।

दादा जी के बारे‌ में बात करें तो वो कांग्रेस में काफ़ी समय कॉर्रपोरेटिव की हैसियत से रहे। यही वो समय था जब दादा जी का पूरा परिवार अम्बेडकर विचारधार से प्रभावित हो रहा था, उनके काम और उद्देश्य से प्रभावित हो रहा था और चिंतित भी हो रहा था बहुजन और पसमांदा समाज के लिये। मेरे पिताजी और उनके भाइयों काम रुझान भी शिक्षा को लेकर बहुत अच्छा था। और न सिर्फ़ पढ़ाई लिखाई बल्कि वो उच्च विचार भी जो किसी पढ़े लिखे व्यक्ति को अस्ल में पढ़ा लिखा बनाते हैं। ज़ाहिर है ये सब दादा जी से उनमें आया होगा।
मेरे चाचा इन्जीनियर बने और भेल(BHEL) में काफ़ी समय काम किया। एक चाचा सिविल मजिस्ट्रेट के पद पर रहे। मेरे पिताजी ने भी वकालत पढ़ी लेकिन घर की ज़िम्मेदारियां ऐसी थीं के जारी न रख सके। क्यों कि दादा जी के बाद वही घर के बड़े थे और घर के हर सदस्य की ज़िम्मेदारी उन पर थी। भरण पोषण से ले कर शिक्षा दीक्षा तक। लेकिन एेेसे हालात में भी एल एल एम किया और अफ़सर हुए। और काफ़ी समय नौकरी में गुज़ारने के उपरांत सेवा निवृत्त हुए। मैंने एक अच्छा समय अपने पिता और चाचा के सानिध्य में गुज़ारा।

मेरी माता के बारें बात करें तो जैसे के मैंने शुरू में बताया के वो अमरावती से थीं। मेरे नाना जी जिनका नाम नाना साहब डोंगरे था ने पहली पत्नि के देहांत के बाद दूसरी शादी मेरी नानी से की। मेरे नाना महाराष्ट्रीयन थे बहुजन समाज से ही थे। नाना साहब जनरल पोस्ट मास्टर थे और छोटे मामा सेना में लेफ़्टिनेंट थे। घर के सामाजिक और आर्थिक हालात बहुत अच्छे थे। और मेरी माँ की शिक्षा दीक्षा बहुत अच्छी तरह हुई।

१९४० ये परिवार धीरे धीरे डॉक्टर अम्बेडकर के सम्पर्क में आने लगा। अभी नाना साहब डोंगरे बौद्ध नहीं हुये थे। लेकिन उनमें मदद करने का ऐसा जज़्बा था के जिसकी मिसाल नहीं मिलती। नाना साहब बहुत इंसान दोस्त व्यक्ति थे। उनके घर के दरवाज़े छात्रों के लिये हमेशा खुले रहते थे। दूर दराज़ के गाँव से पढ़ने वाले बच्चे आ कर कई साल तक उनके घर रह कर पढ़ाई करते। उनके तीन मंज़िला मकान के तीसरे माले पर एेसी व्यवस्था की गई थी वहां छात्र ही रुकते और पढ़ते थे। और इसके अलावा भी और बहुत से सामाजिक काम करते रहते थे। इन तमाम कार्यों के आम लोगों के सामने आने पर नाना साहब का काफ़ी नाम हो गया था। और फिर ये नाम धीरे धीरे डॉक्टर अम्बेडकर के कानो में भी पड़ा। और फिर जब डॉक्टर अम्बेडकर अमरावती आये तो नाना साहब की उनसे मुलाक़ात हुई। और दोनो एक दूसरे से ख़ासे मुतासिर हुये। और मुलाक़ातों का सिलसिला जारी रहा मेरे छोटे मामा जो के फ़ौज में लेफ़्टिनेंनाना से मुलाक़ातें होती रहीं। मुलाक़ातों के लम्बे सिलसिले के बाद अम्बेडकर ने मामा जी के सामने अपने मूवमेंट से जुड़ने का प्रस्ताव रखा। लेकिन उन्होंनें क्षमा चाही अपनी नौकरी की मजबूरी बताते हुये। लेकिन अपनी पत्नि के बारे में बताते हुये कहा के वो पढ़ी लिखी भी हैं और सामाजिक भी। मामा जी की शादी तब नई नई हुई थी। उनकी पत्नि सुलोचना डोंगरे डॉक्टर अंबेडकर से जुड़ीं और जी लगा कर सामाजिक काम करने लगीं। नौजवानों और महिलाओं को मानसिक रूप से सशक्त करने लगीं। महिलाओं का एक बड़ा गिरोह उनसे प्रभावित था। नाना साहब की नज़र जब सुलोचना डोंगरे के सामाजिक कार्यों पर पड़ी तो उन्होंने भी ख़ूब प्रशंसा की और उनके काम में भी हाथ बटाने लगे। अमरावती और उसके आस पास के इलाक़े में ज़ोर शोर से काम होने लगा था।

जारी रहेगा….

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