सोनभद्र में आदिवासियों की हत्या मैला आँचल की नजर से:

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सोनभद्र में आदिवासियों की हत्या पिछड़ी जाति से आने वाले गुर्जरों ने की है। मैला आँचल ब्राह्मणवाद के इस खेल को बखूबी चिह्नित करता है कि कैसे अपने वर्गीय हित में पिछड़ी और दलित जातियों को वर्गशत्रु के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता है। 2005 के नया ज्ञानोदय के इस लेख में इसका जिक्र मैंने किया था। आपस में लड़ने और प्रतिस्पर्धा करने वाली गांव की सभी जातियां संथालो के खिलाफ एकजूट हो जाती हैं। कई संथाल मारे जाते हैं। मैला आँचल में जाति, वर्ग और जेंडर संबंध पर मेरे लेख का एक अंश:

वर्गीय संकट के समय कायस्थ, राजपूत मिलकर पंचायत का षड़यंत्र रचते हैं और बालदेव, कालीचरण को समयानुकूल प्रतिष्ठा देकर या नाई टोले अथवा रजक टोले के एक-एक व्यक्ति को प्रतिष्ठा देते हुए अपने हितों की साधना करते हैं। यही है ग्रामीण जातीय व्यवस्था के भीतर की अर्थशास्त्रीय समझ, जो कालीचरन और बालदेव की नेतृत्व क्षमता को भी अपने आर्थिक हितों के पक्ष में इस्तेमाल करती हैं। धरती से ज्यादा उपजाने के लिए गांव की भलाई के नाम पर, देश की बदहाली के नाम पर गरीब जनता और जाति की ‘जजमानी’ खरीदने का भोला षड्यन्त्र मेरीगंज की ग्रामीण जाति व्यवस्था करती है, जिसका उदाहरण उत्तर भारत के गांवों में आज भी मिल जाएगा।

चार पुश्त पहले बसे थे संथाल गांव के सीमान्त पर। तत्कालीन जमींदार ने लोगों को यह समझाकर उन्हें बसाया था कि इनकी मेहनत बंजर जमीन को भी आबाद कर देती है। संथाल सीमान्त पर बसे, उनका जातीयकरण भी हुआ। परन्तु यह जातीयकरण न उन्हें गांव से जोड़ सका और न गांव की जातियां उनसे जुड़ सकीं। उनका सम्बन्ध गांव से या तो श्रम के माध्यम से बनता है या गांवों के श्रमिकों से। जब वर्गीय चेतना अपनी जमीनों पर अधिकार के लिए उन्हें संगठित करती है। तो गांव की तमाम जातियां ऊंची जातियों के नियन्त्रण में उनके खिलाफ खड़ी होकर गोलबन्द हो जाती हैं।

आगत भविष्य का खूनी संघर्ष मैला आंचल के रचनाकाल में ही दिखता है, जो संथालों से होकर गांव के भीतर भी प्रवेश कर जाता है, और जिसके मिथकीय रहनुमा हैं चलितर कर्मकार या कालीचरण। परन्तु जातीय सत्य और सत्यता की तिकड़में इनसे एक-एक कर निपटती हैं- पहले संगठित समुदाय संथालों से और फिर उनके नेता कालीचरण तब वासुदेव से। निपटने की प्रक्रिया में साथ देता है राज्य और उसकी मिशनरियां। एक-एक कर संथाल जेल में डाल दिये जाते हैं तथा बाद में कालीचरण जैसे नेता डकैती के आरोप में। गिरफ्तार तो डाक्टर प्रशान्त भी होते हैं, कम्युनिस्ट होने के शक में, परन्तु उनकी आजादी उपन्यासकार की (यद्यपि स्वनिर्मित) नैतिक मजबूरी भी है तथा वर्गीय सत्य भी।

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