ह्यूस्टन में ‘हाउडी मोदी’ जलवा का क्या है सच?

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घर का जोगी जोगरा, आन गांव का सिद्ध. यह कहावत इकतरफा तो बिल्कुल भी नहीं है. आदमी को भी अपने गांव-जवार के लोगों से अधिक दूसरे गांव-जवार के लोग अच्छे लगते हैं. कई वजहें हैं, बाहर गए आदमी के बारे में बाहर के लोग बहुत नहीं जानते. इसलिए दूसरे गांव का साधारण आदमी भी उनको सिद्ध आदमी लगता है और कथित सिद्ध आदमी के पास भी अवसर होता है कि वह अपनी विद्वता झाड़े. मामला जब अंतरराष्ट्रीय हो तो और भी दिलचस्प हो जाता है. उस पर से राजा हो तो फिर कहना ही क्या.

दरअसल, हुआ यही है नरेंद्र मोदी के साथ. भारत में मोदी, ह्यूस्टन में हाउडी. कल जब ट्वीटर पर यह हैशटैग उछाल मारते देखा तो मेरा दिल भी उछल पड़ा. उछले भी आखिर क्यों नहीं?

आपने देखा वह वीडियो जिसमें हॉस्टन के मैदान में नरेंद्र मोदी अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का हाथ अपने हाथों में लेकर ऐसे घुमा रहे हों जैसे वे हॉस्टन में नहीं बल्कि गुजरात के किसी स्टेडियम में हों.

हाथ पकड़ने का अंदाज भी देखिए. एकदम कोरा में सटाके. कितना नायाब दृश्य था यह. भारत का प्रधानमंत्री अमेरिका के राष्ट्रपति को उसके ही देश में राह दिखा रहा है.

जाहिर तौर पर यह कोई ऐसा-वैसा कार्यक्रम तो था नहीं। अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव होने हैं। अमेरिका में भी इस बार भी ट्रंप सरकार बनवाना मोदी जी का लक्ष्य बन गया है. ऐसे में यदि वे मोदी से हाउडी हो गये तो बुरा क्या है.

सच में कोई बुराई नहीं है. भारत के सरकार का इकबाल चाहे भले ही भारत में खत्म हो रहा है, जीडीपी पांच फीसदी से कम देख आरबीआई सहित देश के आर्थिक विशेषज्ञों का माथ चकरघन्नी की तरह नाच रहा है, अमेरिका में उनकी तूती बोल रही है.

भक्त ताली बजा रहे हैं. जम्मू-कश्मीर पौने दो महीने से नजरबंद है. वहां के नागरिक सिविल नाफरमानी कर सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं. सरकार की लाख कोशिशों के बाद वे अपने घरों से निकल नहीं रहे ऐसे में वह दृश्य तो वाकई देखने लायक था जब हाउडी जी (अपने प्रधानमंत्री जी का अमेरिकी नाम) कश्मीरी पंडितों से मिल रहे थे.

अब यह मत कहिएगा कि केवल कश्मीरी पंडितों से ही क्यों? और किसी जाति धर्म के लोगों से क्यों नहीं मिले हाउडी जी? तो इसका जवाब यही है कि विदेश जाकर लात-जूता खाना कोई अच्छी बात है? आप क्या चाहते हैं कि ह्यूस्टन में जब हाउडी जी जलवा बिखेर रहे थे तो पीछे से कोई मुर्दाबाद के नारे लगाए.

(ये शब्द नवल किशोर के हैं)

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