महिलाओं के साथ बलात्कार संबंधी तथ्य भारतीय पुरूषों की विकृत मानसिकता का प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं

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~Siddharth Ramu

अलवर में दलित महिला के साथ बलात्कार की रूह कंपा देने वाली घटना से अभी ऊबरा ही नहीं था, कि कश्मीर में तीन वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार की खबर आ गई। बलात्कार संबंधी तथ्य यह प्रमाणित करने के लिए काफी हैं कि भारतीय समाज जितना क्रूर-निर्मम दलितों के संदर्भ में है, उतना ही क्रूर-निर्मम महिलाओं के संदर्भ में है। दलित समाज की तो एक सामूहिक आवाज भी है, लेकिन दुखद यह है कि महिलाओं की कोई सशक्त सामूहिक आवाज सुनाई नहीं देती।

बलात्कार संबंधी बुनियादी तथ्य-

बलात्कार पर रोक और बलात्कारी मानसिकता के कारणों पर विचार करने से पहले बलात्कार सम्बन्धी कुछ बुनियादी तथ्यों पर निगाह डाल लेना आवश्यक है –
● भारत में प्रत्येक दिन 106 महिला बलात्कार का शिकार होती है। सिर्फ राजधानी दिल्ली में ही प्रतिदिन 6 लड़कियां बलात्कार का शिकार होती हैं।
● बलात्कार की शिकार महिलाओं में 94 प्रतिशत 2 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की मासूम बच्चियां हैं।
● दुधमुँही मासूम बच्ची से लेकर 70 साल की दादी-परदादी भी बलात्कार का शिकार होती हैं
● सामाजिक तबकों के आधार पर सर्वाधिक बलात्कार की शिकार आदिवासी, दलित तथा अल्पसंख्यक समुदाय की महिलायें होती हैं।
● औसतन प्रत्येक दिन 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है।
● शिक्षण संस्थान, फैक्टरी, ऑफिस, अस्पताल जैसी जगहों से भी आये दिन बलात्कार की खबरें आती हैं।
● धर्म स्थल भी बलात्कार के मुख्य अड्डों में से एक हैं। पहले से ही यहां देवदासी के रूप में बलात्कार का परंपरागत रूप स्वीकृत रहा है।

अगर बलात्कारियों के अलग-अलग समूहों की सूची बनाई जाये तो बलात्कारियों के निम्न समूह सामने आते हैं–

● 94 प्रतिशत बलात्कारी सगे सम्बन्धियों- पिता, भाई, चाचा, मामा, मौसा, फूफा, जीजा, ममेरे, फुफेरे, चचेरे भाई, अन्य रिश्तेदार, पारिवारिक दोस्त तथा पड़ोसी हैं।
● बलात्कारियों की सूची में दूसरा सबसे बड़ा समुदाय पुलिस, सेना तथा अर्द्धसैनिक बलों का शामिल है।
●3 सांसदों और 48 विधायकों ने चुनाव पूर्व की अपनी घोषणा में यह स्वीकार किया है कि उनके ऊपर महिलाओं के खिलाफ हिंसा का आरोप हैं। इसमें बलात्कार का आरोप भी शामिल है।
●हमारे समाज में पुरुष प्रायः अपनी पत्नियों के साथ उनकी अनिच्छा के बावज़ूद, और कभी-कभी तो विरोध के बावज़ूद शारारिक सम्बन्ध बनाते हैं जो कि सारतः बलात्कार ही है।
● बलात्कारियों का अन्य समुदाय जाति-धर्म के आधार पर बनता है। भारत में दलित स्त्रियों के साथ गैर दलितों द्वारा सामूहिक बलात्कार की घटनायें आये दिन अंजाम दी जाती हैं।
●सामूहिक बलात्कार का दूसरा शिकार धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय है। गुजरात दंगे के दौरान खुलेआम सड़क पर गर्भवती महिला के साथ बलात्कार तथा पेट फाड़ने की घटना ने सबको शर्मशार कर दिया था । यह अपवादस्वरूप घटने वाली घटना नहीं, यह हर साम्प्रदायिक दंगे की सच्चाई है। हाल ही में, हिन्दुवादियों की स्त्री-विरोधी होने का घिनौना चेहरा मुजफ्फरनगर दंगो में सामने आया जब गाँव के ही लोग जिन्हें कल तक मुस्लिम स्त्रियाँ अपना चाचा, ताऊ, भाई, बेटा कहकर पुकारती थीं, उनके साथ सामूहिक बलात्कार करने में इन ताऊओं, चाचाओं, बेटों, भाईयों को कोई शर्म नहीं आयी। शर्म की जगह गर्व की अनुभूति हुई। वे आज भी गर्व से फूले घूम रहे हैं, कई तो सांसद भी बन गये।
●असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली मजदूर महिलाओं को आये दिन यौन शोषण का शिकार होना पड़ता है लेकिन इसकी कोई सुनवाई तक नहीं होती।
देश के पूर्वोत्तर राज्यों तथा कश्मीर की महिलाओं के साथ भारतीय पुलिस, अर्द्धसैनिक बल तथा सेना आये दिन महिलाओं की मर्यादा का उल्लंघन करती रहती है।
●नक्सल विरोधी– माओवादी विरोधी युद्ध के नाम पर पुलिस तथा अर्द्धसैनिक बलों के लोग आये दिन आदिवासी औरतों के साथ बलात्कार तथा यौन हिंसा करते रहते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अर्ध सैनिक बलों द्वारा बस्तर में बलात्कार की घटनाओं की पुष्टि की है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि घर या बाहर कोई जगह ऐसी नहीं है जहाँ किसी भी उम्र की औरत अपने को पूर्ण सुरक्षित महसूस कर सके और न ही पुरुषों का कोई ऐसा समुदाय है जिससे स्त्री अपने को हिंसा की दृष्टि से पूर्णतः सुरक्षित समझे। फिर किसकी-किससे, कहाँ-कहाँ पुलिस, कानून से रक्षा की जा सकती है तथा किसको-किसको फाँसी दी जाये। कानून और दंड, चंद अपराधियों के लिए होते हैं, जब समाज का बहुलांश हिस्सा ही किसी समुदाय के प्रति अपराधी मानसिकता रखता हो, तब क्या किया जाय?

Siddharth Ramu
Senior Journalist
N Delhi

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