अलवर में गौ तस्करी के शक में की गई हत्याओं की ज़िम्मेदार है एक घिनौनी मानसिकता!

0

By- आकिल रज़ा

यह बात मैं बहुत ही ज़िम्मेदारी के साथ लिख रहा हूं.. कि मॉव_लिंचिंग का जो दर्द हम यहां बैठकर महसूस करते हैं, दरअसल वो उतना नहीं है बल्कि उससे कई गुनाह ज्यादा है, वैसे तो देश के कई राज्यों और शहरों में मॉव लिंचिंग की घटनांए हई हैं, लेकिन उन सबसे ऊपर लिस्ट में नाम आता है मेवात क्षेत्र का, मेवात भारत के उत्तरपश्चिम में हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में स्थित एक ऐतिहासिक व पारंपरिक क्षेत्र है। मोटेतौर पर इसकी सीमा में हरियाणा का मेवात जिला, राजस्थान के अलवर, भरतपुर और धौलपुर जिले और साथ ही उत्तर प्रदेश का कुछ क्षेत्र आता हैं।मॉव लिंचिंग की घटनाओं कि अगर बात करें तो मेवात क्षेत्र में आने वाले राजस्थान के अलवर ज़िले में सबसे दुखद परिस्थिति है।
लेकिन यहां पर में पूरे मेवात का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं जिससे यह समझा जा सके कि घटनाओं के लगातार होने और इनपर लगाम नहीं लगने की वजह क्या है?

दरअसल बीती 27 और 28 अक्टूबर को मैंने अपनी टीम यानी ‘नेशनल इंडिया न्यूज़’ की टीम के साथ इस क्षेत्र का दौरा किया था।
जैसे ही मैं अलवर ज़िले में पहुंचा तो शुरुआत वहां के लोकल टेक्सी ड्राइवर से हुई, जौसे कि “चावल पके हैं या नहीं” इस बात को जानने के लिए पतीली का एक चावल बता देता है, कुछ इसी तरह ड्राइवर की बातों से वहां के हालातों का पता चल रहा था। लेकिन बड़ी बात यह थी,
कि वहां के हालातों को जानने के लिए सिर्फ एक चावल का दाना ही काफी नहीं था, हमने जैसे जैसे लोगों सो बात कि तो पता लगा कि मेवात एक बहुत ही गलत प्रवर्ति का क्षेत्र है, ज्यादातर लोगों का यह मानना था कि उधर रहने वाले लोग लूट, चोरी, ठगी (टकलू) जैसी अपराधिक घटनाओं में लिप्त रहते हैं। मतलब साफ था कि लोग यह बताने कि कोशिश कर रहे थे कि उस क्षेत्र में जाकर इंसान सुरक्षित नहीं है। बहरहाल हमें यह समझना था कि वहां जाकर लोग सुरक्षित नहीं है या फिर वहां के लोग सुरक्षित नहीं है।

अभी मैं अलवर सिटी में ही था उस दौरान मेरी मुलाकात एडवोकेट कासिम से होती है, एडवोकेट कासिम शुरुवात से ही पहलू खान का केस
लड़ रहे हैं जो कि 2017 में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार दिया था। एडवोकेट कासिम के पास वो सारे ही दस्तावेज़ थे जिनसे यह समझा जा सकता है कि पहलू खान कोई गौकशी करने वाला नहीं था बल्कि गौ-पालक था। एडवोकेट कासिम ने दस्तावेज़ों को दिखाते हुए बताया कि
पहलू खान कि हत्या में जो मुख्य आरोपी हैं उनको हटा दिया गया है, तो बाकियों को ज़मानत तो बड़ी आसानी से मिल सकती है, उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि घटना के तथ्यों को बदलने के लिए पुरी तरह पुलिस ज़िम्मदेार है। हालात यह है पहलू के परिवार वालो को आज भी
खुलेतोर पर धमकाया जाता है, लेकिन पुलिस कुछ नहीं कर पाती है। अडवोकेट कासिम ने मेवात का ज़िक्र करते हुए कहा कि वहां के लोग
पहले से 2 चीज़ों के लिए मशहूर हैं, पहली चीज़ इमानदारी, और दूसरी चीज़ महमान नवाज़ी और ज़ुवान के सच्चे।

इसके बाद हमारी टीम रकबर खान के गांव कोल गांव पहुंची जो की हरियाणा में लगता है, घर की दहलीज़ पर पहुंचे तो कुछ मासूम बच्चे मन में दबे हुए सवाल लेकर हमे निहार रहे थे, गांव के सरपंच के साथ गांव के बुज़ुर्ग और परिवार के सदस्य भी रकबर के घर के बाहर बैठे थे, परिवार और गांव वालों से बात कि तो हालातों ने आत्मा को झकझोर दिया। पीड़ित परिवार पर कहर महज़ इतना नहीं है कि उनके परिवार का सदस्य जो रोज़ीरोटी का सहारा था वो मार दिया गया, बल्कि इस बात का खौफ है कि आज भी उन्हें कथित तौर पर एक अपराधी की नज़र से देखा जाता है।

परिवार के इन आरोपों का प्रमाण मुझे उस वक्त मिला जब मैं रकबर के गांव से निकलकर उमर खान के गांव घाटमिका जा रहा था, गांव पहुचने से पहले ही हमारी गाड़ी को घाटमिका पुलिस चौकी पर चैकिंग के दौरान रोक लिया था। वहां कोतवाल के साथ खड़े कुछ सिपाहियों से जो मेरी बात हुई वो बेहद हि दुखद है, एक पत्रकार होने के नाते मैं यह अच्छे से समझ रहा था कि वर्दी पहने इन लोगों कि मानसिकता क्या है? जब उन्होंने मुझ से सवाल किया कि “घाटमिका में क्या काम है” तो, मैंने उमर का नाम लिया, तो उन्होंने कहा कि “कौन उमर खान”? मैने कहा, “उमर खान जिसकी मृत्यु हो चुकी है, तभी चौकी इंचार्ज कहते हैं कि “अच्छा वो उमर गौ-तस्कर…जो गौ-तस्करी में मारा गया” तभी पीछे खड़ा सिपाही भी बोलता है साबजी उसको बताया चंदा मिलने लग गया है, घर वगेरा बन रहा है उसका, इतने में फिर चौकि इंचार्ज कहते हैं अरे इनके यही काम हैं यह लोग चोरी, चकारी करते हैं सब गलत प्रवृत्ति के लोग हैं। उसके बाद मैंने कहा कि अच्छा में चलता हूं हमें देर हो रही है। उसी दौरान टेक्सी ड्राइवर से यह भी पता चलता है कि इस चौकी पर चैकिंग नहीं यह पुलिस वालो का धंदा है, शाम होते ही चैकिंग शुरू कर देते हैं और पत्थर ला रहे ट्रक्स से हफ्ता वसूली करते हैं, इसके अलावा अगर बाहर का आ जाता है तो उसे भी नहीं बकसते हैं।

बहरहाल हालात देखकर बहुत ही दुखद स्थिति में था और मन ही मन यह सोच रहा था कि पुलिस बिना सबूतों और कोर्ट के फैसले के किसी को भी अपराधी कैसे मान सकती है? और जब पुलिस की मानसिकता किसी एक कम्युनिटी को लेकर ऐसी हो तो दूसरे लोगों कि मानसिकता कैसी होगी? आखिर कैसे एक पीड़ित परिवार इंसाफ की उम्मीद लगा सकता है? कैसे अपने आस पास के सिस्टम पर भरोसा जता सकता है? यहां पर एडवोकेट कासिम के पुलिस पर लगाए गए आरोप कहीं न कहीं प्रमाणित होते दिख रहे थे।

तो क्या इन हालातों को देखकर यह मान लिया जाए कि इन घटनाओं के लिए प्रशासनिक सिस्टम भी ज़िम्मेदार है? जिस तरह से वहां के लोग
सरकार और सिस्टम का नाम ले रहे थे, उससे यह तो समझ आ रहा था कि इन घटनाओं कि वजह क्या है?

इस पूरे सफर के आखरी पड़ाव पर मेरी बात अलवर शहर के ही कुछ युवाओं से हुई जो ज्यादातर अपनी पढ़ाई कर रहे हैं, मेवात और
घटनाग्रस्त क्षेत्रों के बारे में जब मैंने सवाल किया तो उन्होंने वो सारी चीज़े बताई जो मैं अब तक कई बार सुन चुका था, लेकिन उन्होंने यह भी बताया कि वहां के लोग इतने बुरे नहीं है जितना दिखाया जाता है, उनके पास भी प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लोकिन उनके दबाया जाता है, वो कह रहे थे कि सर उस क्षेत्र की बुराई तो सब दिखा देते हैं लेकिन अच्छाई के लिए कोई नहीं दिखाता, कितना पिछड़ा है वो क्षेत्र इसका किसी को खयाल नहीं है, लोगों के पास रोज़गार नहीं है इसकी किसी को परवाह नहीं है, तभी एक युवा बताता है कि ” सर विकास की दृष्टिकोण से उस क्षेत्र को देखा जाए तो आज़ादी के बाद से अब तक कोई नहीं पंहुचा है वहां”

इन सारे सवालों और हालातों के बीच एक नाम और बीच-बीच में आ रहा था, और वो नाम था रामगढ़ से बीजेपी विधायक ज्ञानदेव आहुजा का,
लोगों का मानना था कि आहुजा के संरक्षण के चलते ही इन घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। लेकिन सरकार कुछ करने को तैयार नहीं हैं।

बहरहाल अपने इस पूरे सफर में लोगों का नज़रिया देखा, पुलिस की मानसिकता का एहसास हुआ, प्रशासन की कार्रवाई देखी, और लोगों की
मजबूरी को महसूस किया, जिससे इस निष्कर्स तक पहुंचा की हालात जैसे हम सोचते हैं वो वैसे नहीं है, बल्कि कई दृष्टिकोण से उससे कहीं
ज्यादा खतरनाक हैं।

~ AQIL RAZA

उत्तर छोड़ दें

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा।