डॉ मनीषा बांगर एक शानदार समर्पित शख्सियत…

By- Dr. Jayant Chandrapal मुझे नहीं लगता की मनीषाजी की शख्शियत आज किसीके द्वारा दी गई पहचान की मोहताज है... उनके विचार, उनके कार्य, उनके आन्दोलन ने ही उनकी  शख्सियत को समाजजीवन में उभारा है. आज सोशल मीडिया के जमाने में लोग जब हवा-हवाई में वाह वाही लूटने की फ़िराक में लगे रहते है; जिनका जमीनी स्तर पर कुछ भी कॉन्ट्रिब्यूशन नहीं होता ऐसे समय में मनीषाजी हमें दिखाई देती है जमीनी स्तर पर गुर्राते हुए आन्दोलन करती हुई... वह हमें नज़र आती है... कभी स्त्री सन्मान पर तो कभी मूलनिवासी पहचान पर बहुजन आन्दोलन पर राजनितिक वर्तमान पर धर्म…

सिंधु सभ्यता से ब्राह्मणों ने चुराया है योग, बुधनमा

By: Nawal Kishor Kumar कोई भी धर्म तभी लोककल्याणकारी हो सकता है जब समानता और सम्मान उसके बुनियादी मूल्य हों। और लोककल्यणकारी धर्म की सबसे पहली शर्त तो यह है कि वह यथार्थपरक हो। लेकिन हिंदू धर्म में इसका सर्वथा अभाव है। समझे बुधनमा भाई। नवल भाई, मेरा सवाल योग को लेकर है। क्या आप योग को भी पाखंड मानते हैं? मैं योग की ही बात कर रहा हूं बुधनमा भाई। लेकिन पूरी बात समझ में आए, इसलिए सबसे पहले धर्म से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें कह रहा हूं। अच्छा यह बताओ कि धर्म का मतलब क्या केवल पूजा-पाठ होता है या कुछ और भी। हमको लगता है कि धर्म जो…

ईश्वर से बढ़कर है संविधान बुधनमा

By: Nawal Kishor Kumar इस बार लोकसभा को देखके मन हरियर हो गया नवल भाई। एकदम बदला-बदला है इस बार का संसद। आप देखे कि नहीं। क्या देखना था यार बुधनमा। अच्छा यह बताओ कि आप इतने खुश क्यों हो रहे हो। मुझे तो अफसोस हुआ। क्या बात करते हैं नवल भाई। देखे नहीं कि जैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांसद के रूप में शपथ लेने के लिए बढ़े, पूरा सदन मोदी-मोदी और जय श्री राम के नारे से गूंज रहा था। मेरा तो मन एकदम एक्साइटेड हो गया। लगा कि बाबा साहब का संविधान एक झटका में फेंक के सब मनुस्मृति रख देगा संसद में। यह अच्छी बात है कि अब तुम भी संसद…

विश्चकप में पंडित का दर्शन किये बुधनमा?

By: Nawal Kishor Kumar ब्राह्मण भारतीय समाज का कोढ़ है। दुर्भाग्य यह है कि आज भी यह बना हुआ है। कल विश्वकप के मैच में भी यह देखने को मिला। तुमने देखा था बुधनमा भाई? हां, मैच तो देखे थे थोड़ा देर। लेकिन आपको वहां कौन ब्राह्मण मिल गया। वहां तो सब जाति-धर्म के लोग थे। आपकी नजर भी कमाल की है। हजारों की भीड़ में ब्राह्मण मिल ही जाता है। इ तो बताइए कि क्या हुआ। मुझे क्या होगा। मैं तो मैच ही देख रहा था। एक आदमी नंगे बदन दिख गया। पूरे बदन पर उसने इंडिया पोत रखा था। फिर तेंदुलकर भी था उसके शरीर पर। बेचारा कमेंटेटर कुछ बोल रहा था।…

संघ के धुन पर डाक्टरों का नाच देखो बुधनमा

By: Nawal Kishor Kumar राजनीति की परिभाषा क्या केवल यही है कि राज कैसे हासिल की जाय और फिर कैसे राज बनाए रखा जाय? क्या राजनीति में यह शामिल नहीं होता है कि आम इंसान जो कि इस देश का नागरिक है, उसे उसका हक-हुकूक दिये जायें? क्या हुआ बुधनमा? आज सुबह-सुबह इतने गंभीर सवाल। कुछ हुआ है क्या? हां नवल भाई, मन बेचैन है। पटना में भी सब डॉक्टर हड़ताल करने की बात कर रहे हैं। आउर जानते हैं पीएमसीएच से लेकर मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच में इसका असर पड़ रहा है। आप तो जानते ही हैं कि अभी भी इंसेफ्लाइटिस के कारण बच्चे मर रहे हैं। इलाज नहीं होगा…

रामराज और आदर्शराज का अंतर समझो बुधनमा

By- Nawal Kishor Kumar आज भोरे-भोरे एतना काहे चवनिया मुस्की मार रहे हो बुधनमा भाई। कोई खास बात है का? आउर दिन तो मुंह से ताड़ी के बास आता रहता है। आप भी न नवल भाई। आप एक नंबर के चालू आदमी हैं। हमको खुश होने का एको गो मौका नहीं देना चाहते हैं। आज का खबर नहीं देखे। कौन सी खबर बुधनमा भाई। नयका सरकार ने आते ही काम कर दिया। तीन तलाक वाला जो कानून है, उसको कैबिनेट ने पास कर दिया है। अब सब मुस्लिम महिलाओं के अधिकार की रक्षा हो सकेगी। इ काम तो ठीक किया है ई मोदी। अब तो रामराज आ ही गया। बुधनमा भाई। आप न एक नंबर के मासूम इंसान हैं।…

बुधनमा आज पा रंजीत की बारी

फिल्मी दुनिया खाली फिल्मी नहीं होता है समझे बुधनमा भाई। कुछ लोग होते हैं जो सच कहने का साहस भी दिखाते हैं। का हो गया नवल भाई। आज सुबह-सुबह फिलिम-विलिम की बातें। कोई सिनेमा में रोल मिल गया का। एतना चहक काहे रहे हैं? चहकने वाली बात ही है बुधनमा भाई। एक फिल्म तो तुमने देखी ही होगी। अरे वही रजनीकांत की फिल्म काला। हां, देखे थे। ऐसे भी साउथ के फिलिम सब होता बहुते झकास है। हीरो तो एके वार में सैंकड़ों को मार गिराता है। लगता है जैसे कि बजरंग बली का पूरा ताकत ओकरे में समा जाता है। धांसू फिलिम होता है सब। रजनीकांत के तो बाते दूसर है।…

क्रांति का प्रतीक चे ग्वेरा: खूबसूरत दुनिया के लिए जिंदगी और मौत से मोहब्बत करने वाला क्रांतिकारी

(जन्म 14 जून 1928- शहादत 9 अक्टूबर 1967) क्रांतिकारियों की गैलेक्सी के एक चमकते सितारे का नाम अर्नेस्टो चे ग्वेरा है। एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही नसें तन जाती हैं। दिलो-दिमाग उत्तेजना से भर जाता है। हर तरह के अन्याय के खिलाफ लड़ने और न्यायपूर्ण दुनिया बनाने के ख्वाब तैरने लगते हैं। उम्र छोटी हो, लेकिन खूबसूरत हो, यह कल्पना हिलोरे मारने लगती है। कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन यह सच है सिर्फ और सिर्फ 39 साल में शहीद हो जाने वाला एक नौजवान इतना कुछ कर गया जिसे करने के लिए सैकड़ों वर्षों की उम्र नाकाफी लगती है। वह फिदेल कास्त्रो के…

स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में क्या सोचते थे? फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर

स्त्री-पुरुष के बीच कैसे रिश्ते हों? इस संदर्भ में भारत में दो अवधारणाएं रही हैं- ब्राह्मणवादी-मनुवादी अवधारणा और दलित-बहुजन अवधारणा। ब्राह्मणवादी-मनुवादी अवधारणा यह मानती है कि स्त्री पूर्णतया पुूरुष के अधीन है। यह ब्राह्मणवादी-मनुवादी विचारधारा तमाम शास्त्रों, पुराणों, रामायण, महाभारत, गीता और वेदों व उनसे जुड़ी कथाओं, उप-कथाओं, अंतर्कथाओं और मिथकों तक फैली हुई है। इन सभी का एक स्वर में कहना है कि स्त्री को स्वतंत्र नहीं होना चाहिए। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य-स्मृति जैसे धर्म-ग्रंथों ने बार-बार यही दोहराया है कि ‘स्त्री…

ब्राह्मणवादी-मनुवादी संस्कृति के बुनियादी लक्षण क्या हैं?

भारत में उत्तर से लेकर (एक हद  तक) दक्षिण तक और पूरब ले लेकर पश्चिम तक आर.एस.एस. (संघ), भाजपा एवं अन्य आनुषांगिक संगठनों और कार्पोरेट घरानों की विजय और उनका वर्चस्व केवल एक राजनीतिक और आर्थिक परिघटना नहीं है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा गहरे व्यापक स्तर पर यह एक सांस्कृतिक परिघटना भी है, जिसने उस मनःस्थिति और चेतना का निर्माण किया, जिसके चलते   सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर देश के  हिंदूकरण (ब्राह्मणीकरण)  और विकास के नाम पर कार्पोरेटाइजेशन (पूंजी की लूट को खुली छूट) का मार्ग प्रशस्त हुआ। आखिर ब्राह्मणवादी-मनुवादी संस्कृति या…