जय श्रीराम के नारे का मुकाबला फुले, पेरियार और आंबेडकर की विचारधारा से ही किया जा सकता है।

भाजपा के राजनीतिक विस्तार में जय श्रीराम के नारे की सबसे निर्णायक भूमिका रही है। लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए शुरू की गई रथयात्रा का मुख्य नारा जय श्रीराम था। बाबरी मस्जिद का विध्वंस भी जय श्रीराम के नारे के साथ किया गया था। मंडल की राजनीति को पराजित करने के लिए यह नारा व्यापक पैमाने पर उछाला गया। गुजरात नरसंहार का भी मूल नारा जय श्रीराम था। जय श्रीराम के नारे, विचार और एजेंडे की भाजपा को 2 सांसदों की पार्टी से 300 से अधिक सांसदों की पार्टी बनाने में अहम भूमिका रही है। जिसने वर्ण-जाति आधारित हिंदू राष्ट्र…

डॉ मनीषा बांगर को डॉ पायल तडवी की दुखद घटना सुनकर अपने मेडिकल पढ़ाई के वक्त का ये वाकया याद आया।

डॉ. पायल तडवी अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी जान किसने ली, अब यह हम सभी जानते हैं। यह भी कि किस तरह द्विज जातियों की तीन महिलाएं जो कि स्वयं भी मेडिकल की छात्राएं हैं, के द्वारा जातिगत और विद्वेषपूर्ण आचरण के कारण डॉ पायल तडवी ने खुदकुशी कर ली। हालांकि पुलिस ने इन तीनों महिलाओं के खिलाफ एक्शन लिया है, लेकिन भारतीय न्यायिक व्यवस्था में कानूनी प्रावधानों को देखते हुए इन तीनों को सजा मिलेगी, यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता है। मैं स्वयं चिकित्सक हूं और मैंने स्वयं उस पीड़ा को महसूस किया है जो डॉ. पायल तडवी को सहनी पड़ी होगी। बात…

पायल तड़वी और उसके खूबसूरत सपनों की दास्तान

महाराष्ट्र समता और न्याय का सपना देखने वाले फुले, शाहू जी और डॉ. आंबेडकर की जन्मभूमि-कर्मभूमि है, लेकिन यह वर्ण-जाति व्यवस्था और इससे पैदा होने वाले अन्यायों के समर्थक रामदास, तिलक, सावरकर और गोडसे जैसे चितपावन ब्राह्मणों की जन्मभूमि- कर्मभूमि भी है। यह क्रूर पेशवा ब्राह्मणों की भूमि भी है, जिन्होंने अतिशूद्रों को गले में हड़िया और कमर में झाडू बाधकर चलने के लिए बाध्य कर दिया। जो महारों, मांगों और चमारों का सिर काटकर गेंद बनाकर खेलते थे। इन्हीं चितपावन ब्राह्मणों की परंपरा ने एक आदिवासी लड़की और उसके खूबसूरत सपनों की हत्या कर…

सरस्वती को आराध्य देवी न मानने के चलते बहुजन प्राचार्य को जेल, क्या है, सरस्वती का सच ?

By- Sidharth  ~ फुले  और आंबेडकर ‘रिडल्स ऑफ हिंदुज्म’ में भी सरस्वती को देवी मानने से इंकार करते हैं और उनके बहुजन विरोधी चरित्र को उजागर करते हैं। क्या शूद्रों-अतिशूद्रों को सरस्वती से मुक्ति पा, सावित्रीबाई फुले को नहीं अपनाना क्या प्राचार्य डॉ. एस.एस. गौतम ने सरस्वती को देवी मानने से इंकार करके कुछ गलत किया। ऐसा करके उन्होंने क्या फुले-पेरियार और डॉ. आंबेडकर के विचारों का ही पालन नहीं किया है? आज के इंडियन एक्सप्रेस की सूचना के अनुसार मध्य प्रदेश के दतिया जिले के राजकीय महाविद्यालय के प्राचार्य को सरस्वती का अपमान करने के…

फुले की ‘गुलामगिरी’ : ब्राह्मणवाद से मुक्ति का पहला घोषणापत्र

1 जून 1873 को जोतिराव फुले (11अप्रैल 1827 - 28 नवम्बर 1890)  की रचना ‘गुलामगिरी’ का प्रकाशन हुआ था। यह किताब मराठी में लिखी गयी। इसकी प्रस्तावना फुले ने अंग्रेजी में  और भूमिका मराठी में लिखी है। इस किताब को लिखने का मूल उद्देश्य बताते हुए फुले ने लिखा है कि ‘इस किताब को लिखने का एकमात्र उद्देश्य सभी उत्पीड़ित लोगों को उनकी गुलामी का अहसास दिलाना, उनको इस योग्य बनाना कि वे अपनी इस हालात के कारणों को पूरी तरह समझ सकें और अपने आप को ब्राह्मणों की गुलामी, उत्पीड़न एवं अन्याय से मुक्त करने के लिए सक्षम बना सकें (गुलामगिरी की…

जाति है कि जाती नहीं…

-चन्द्रभूषण सिंह यादव  ~ उफ यह जाति कितनी क्रूर,मगरूर,बेशऊर है कि इसकी गिरफ्त में आया तथाकथित अभिजात्य व्यक्ति जालिमाना,बहशियाना,जंगलीपना स्वभाव का हो जाता है तो सोकाल्ड अवर्ण मेमने की तरह मिमियाता, थरथराता,कंपकपाता नजर आता है। देश मे रामराज्य परिषद वाले साथियो की सरकार प्रचंड मत से सत्तासीन हो चुकी है।विजय के बाद सोकाल्ड पिछड़े प्रधानमंत्री मोदी जी ने अपने प्रथम सम्बोधन में कहा है कि देश मे अब केवल दो जातियां रहेंगी एक गरीब की और दूसरी गरीबो की मदद करने वालों की।यदि ऐसा है तो मृत डॉ पायल तड़वी किस जाति की मानी जायेगी?डॉ पायल…

क्यों जहरीले तीर की तरह सर्वणों के दिलों में चुभते हैं, डॉ. आंबेडकर!

By- सिद्धार्थ सहारनपुर से सटे गांव बादशाहपुर पिंजोरा में आंबेडकर की मूर्ति तोड़ दी गई है। बहुजनों में गहरा आक्रोश है। गांव में पीएसी तैनात कर दी गई। इस देश में सबसे ज्यादा यदि किसी व्यक्ति से सवर्ण नफरत करते हैं तो वह आंबेडकर हैं और सबसे ज्यादा किसी की मूर्ति तोड़ी जाती हैं, तो वह भी आंबेडकर की। आखिर सवर्णों को डॉ. आंबेडकर जहरीले तीर की तरह चुभते क्यों हैं? इसके निम्न कारण हैं- ● पहला सवर्णों का यह मानना है कि डॉ. आंबेडकर की आरक्षण की व्यवस्था के चलते उनके बेटों -बेटियों के करीब 50 प्रतिशत नौकरियों का हिस्सा एससी-एसटी…

Mourning the loss of Abhiyan Humane ‘the science man’ – Tears Tributes and Resolves of Bahujan Youth

By- Mangesh Dahiwale  ~ Abhiyan’s untimely death on 8th February 2019 left those who knew him shattered and sad. In less than a few years, Abhiyan left his indelible mark on the Ambedkarite movement and gave it a direction uncared for before. While most of us look for ideologies and the past, he looked at the future and not just an immediate future, but deep future where all the people, including his beloved people, will enjoy the best fruits of humanity. His ideology, his philosophy of life, and his action in the world was…

Shahid Azmi: A Man Who Lived and Died For Justice

By- Deshdeep Dhankhar  ~ Nine years ago, on February 11, 2010, advocate Shahid Azmi was shot dead in his office at Taximen’s colony in Kurla, Mumbai. He had gone back to his office that evening after receiving a call from a man who claimed to have a serious case that needed to be discussed with Azmi. Known for his spirit to fight injustice, Shahid Azmi was a Mumbai based human rights lawyer. In his brief career of seven years, Azmi secured the acquittal of 17 Muslim men charged with alleged terrorism.…

वैलेंटांस्डे को कैसे देखते हैं बहुजन बुद्धिजीवी?

Published By- Aqil Raza    ~ क्या हमें वैलेंटाइंस्डे मनाना चाहिए? इस सवाल का जवाब जब हम जानने की कोशिश करते हैं तो बहुजन महनायिका वीरांगना फूलनदेवी की याद आ जाती है,  जिनका नाम विशव इतिहास के श्रेष्ट विद्रोही महिलाओं की सूची में आता है। जिनका इतिहास पूरा विश्व जानता है। बहरहाल इस दिन को लेकर बहुजन बुद्धिजीवियों की क्या राय है। यह जान लेते हैं प्राद्युमन यादव इस दिन के बारे में लिखते हैं, “दो अफवाहें जो आज के दिन चरम पर रहती हैं. पहली ये कि आज के दिन भगत सिंग को फांसी सुनाई गयी थी. सच्चाई ये हैं कि शहीद भगत सिंह जी को 7…