BBC और मीना कोटवाल: बहुजन महिला पत्रकार के जातिगत प्रताड़ना की कहानी, पार्ट-5

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मैं और बीबीसी-5
Meena Kotwal

डेस्क पर काम करते हुए मुझे नौ महीने हो गए थे. कुछ लोगों का रवैया मेरे प्रति बदलने लगा था. मेरे पीछे से मेरा मज़ाक बनाया जाने लगा, मुझे उल्टा-सीधा कहा जाने लगा. मेरे प्रति कुछ लोगों की बेरुखी साफ़ दिखाई देने लगी थी. मुझे इसका एक कारण ये भी लगा कि डेस्क के लोगों को मेरी ट्रांसलेशन से दिक्कत हो रही थी, इसलिए मेरी बनाई गई कॉपी कई बार चेक तक नहीं की जाती थी, लगाना तो दूर की बात.

औरों के मुक़ाबले मेरी इंग्लिश कमजोर थी, इसलिए मुझ से कुछ ग़लती भी हो जाती थी और समय भी थोड़ा ज्यादा लगता था.

लेकिन एक दिन एक कॉपी मैंने खुद ना करके ऑफिस की ही एक सहयोगी से ट्रांसलेट करवाई. वो अच्छा ट्रांसलेट करती है. उसने बेहतरीन ट्रांसलेट किया भी था. मैं देखना चाहती थी कि क्या उस कॉपी को शिफ्ट एडिटर लगाएंगे या पहले की तरह से डंप कर दिया जाएगा! इस कॉपी को भी शिफ्ट एडिटर ने नहीं देखा. वो कॉपी एक हैंडओवर से दूसरे हैंडओवर घूमती रही. उस स्टोरी के आगे मेरा नाम लिखा था, शायद यही वज़ह थी कि लोग उसे चेक करना तक मुनासिब नहीं समझते थे.

मैं अक्सर देखती थी कि जिस स्टोरी के आगे मेरा नाम लिखा होता था उसे सीरियसली नहीं लिया जाता था. क्या ये मेरा वहम था! इसकी पुष्टि के लिए मैंने एक बार फिर अपनी एक सहकर्मी से ट्रांसलेट की हुई कॉपी चेक करवाई तभी उसे आगे बढ़ाया, लेकिन उस बार भी मुझे निराशा ही हाथ लगी.

कुछ लोग मुझे नापसंद करने लगे, जिस तरह मुझे और मेरी स्टोरी को इग्नोर किया जा रहा था, मैं तनाव में रहने लगी और मेरा वज़न दिन प्रति दिन गिरने लगा, जिस वजह से मुझे बहुत कमजोरी भी हो गई थी. फिर भी मैं जब भी सब से मिलती तो एक मुस्कुराहट के साथ मिलती. मैं उस सम्मान का इंतज़ार कर रही थी, जो शायद मुझे मिलना ही नहीं था. जिन आंखों में मैं अपने लिए घृणा देख रही थी, उनसे सम्मान और अपनत्व की आशा निराशा में बदलने लगी थी.

काम से ज्यादा कुछ लोगों की रूचि किसी के पहनावे, खाने, बच्चे आदि जैसे विषयों में थी. मैं इस बीच कहीं फिट नहीं हो पा रही थी. शायद मेरा काम से काम रखना भी कुछ लोगों को खटक रहा था.

मेरे साथ आए सभी सहयोगियों की शिफ्ट इधर-उधर बदल-बदल कर लगने लगी. एक बार को मैंने सोचा कि शायद मुझे कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया है, इसलिए काम करने की सीमा और शिफ्ट तय किए गए होंगे. लेकिन मेरे कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा कुछ नहीं लिखा था, ना इंटरव्यू या हायरिंग के समय बताया गया था. इसलिए एक बार मैं बीबीसी हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा से भी मिली. मैंने उन्हें सब बताया, “सर… मुझे यहां कुछ अच्छा नहीं लगता. यहां का माहौल थोड़ा अजीब है. मुझे यहां बहुत ही नकारात्मकता महसूस होती है. मुझे लगता है कुछ तो ग़लत हो रहा है मेरे साथ.”

मैंने उनसे शिफ्ट बदलने के लिए भी कहा, जबकि मैंने अक्सर देखा था कि कुछ लोग बड़ी आसानी से अपनी शिफ्ट अपनी सहुलियत के अनुसार बदलवा लेते थे. मैं परेशान होकर जब भी रोटा बनाने वाले सर को शिफ्ट बदलने के लिए कहती, तो वो हमेशा संपादक से बात करने के लिए कहते.

संपादक जी ने भी माना था कि अगर तुम्हें यहां माहौल सही नहीं लग रहा, तो ये बीबीसी की कमी है कि तुम यहां सहज महसूस नहीं कर पा रही हो. साथ ही उन्होंने आश्वस्त किया कि वे सबसे बात करेंगे. शिफ्ट ना बदलने पर उनका कहना था कि तुम्हारी ट्रांसलेशन कमजोर है इसलिए दूसरी शिफ्ट नहीं लगाई जाती. लेकिन रिपोर्टिंग और सोशल तो लगाई जा सकती थी, ये क्यों नहीं लगी इसके लिए मैं बात करूंगा.

कुछ दिन तक सब ठीक रहा, मेरी शिफ्ट भी बदली गई लेकिन वापस वही सब होने लगा.

मुझे महसूस करवाया जाने लगा कि तुम्हें कुछ नहीं आता है.

मुझे लगने लगा जैसे एक इंग्लिश ही आपकी काबिलियत का पैमाना तय करने के लिए बनी है. रिपोर्टिंग की शिफ्ट तो लगाई गई लेकिन स्टोरी पास करवाना भी मेरे लिए किसी जंग से कम नहीं थी. मैं जो भी स्टोरी देती वो या तो रिजेक्ट कर दी जाती, या ये कह दिया जाता कि कुछ और सोचो. ये “कुछ और” मेरी समझ से परे था. जितना मैं कर पाती थी, करती थी. धीरे-धीरे मेरी सारी स्टोरी रिजेक्ट होने लगी. जब-जब स्टोरी रिजेक्ट की जाती, मेरा आत्मविश्वास भी उसके साथ गिरता चला जाता. ऑफिस के लोगों की नज़र में मुझे नाकारा महसूस करवाया जाने लगा था.

To be continued…इससे आगे का वाकया अगले लेख में पढ़े, जो पार्ट-6 करके होगा।

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