भारतीय न्यूजरूम को कैसे जाति ने आकार दिया!

0
Want create site? With Free visual composer you can do it easy.

1996 में कुछ समय के लिए एक विदेशी संवाददाता ने पत्रकार BN Uniyal से पूछा कि क्या वह किसी दलित पत्रकार को जानते हैं. दोस्तों और सहकर्मियों से बात करने के बाद Uniyal को कोई भी दलित पत्रकार नहीं मिला. 2017 में 10 से अधिक वर्षों तक एक समान खोज के बाद पत्रकार sudipta mondal ने कहा कि वह केवल भारत में 8 दलित पत्रकार खोजने में सक्षम रहे और उनमें से केवल 2 ही उसके लिए जोखिम उठाने के लिए तैयार हुए.

इसके बाद अक्टूबर 2018 और मार्च 2019 के बीच भारतीय मीडिया में हाशिए के कलाकारों के प्रतिनिधित्व के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए शोध संबंधी शोध के लिए ऑक्सफैमट पूरी तरह से आयोजित किए गए. लेकिन यह बहुत चौकाने वाली बात रही कि सूची में हर 4 एंकर में से 3 एंकर ऊपरी जाति के लिए टीवी समाचार पर बहस कर रहे थे. 12 पत्रिकाओं के कवर पेजों में छपे नौ सौ सत्रह लेखों में से एक भी दलित या आदिवासी या ओबीसी के लिए नहीं था और ना ही हमने कास्ट से संबंधित मुद्दों पर अधिक देखा.

वहीं अंग्रेजी अखबारों में 5 से अधिक लेख दलितों या आदिवासियों द्वारा नहीं लिखे गए थे. Reseach से पता चलता है कि भारतीय मीडिया अभी भी उच्च जातियों का वर्चस्व है. बहुजनों का प्रतिनिधित्व ज्यादातर सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता के द्वारा ही किया जाता हैं पत्रकारों के द्वारा नही. लेकिन ओबीसी समान रूप से दर्शाए गए हैं, भले ही उनका अनुमान है कि वे आधी से अधिक आबादी का गठन करते हैं. लेकिन रिपोर्ट का मूल उद्देश्य है कि मीडिया में सामाजिक बहिष्कार पर एक सार्वजनिक बहस को सूचित करना.

बता दें कि जाति एक ऐसा भेदभाव है और प्राचीन प्रणाली है जो जन्म से निर्धारित होती है. यह शुद्धता की धारणाओं पर आधारित है जो हिंदू सिद्धांत में निहित है. साथ ही यह कास्ट सिस्टम हिंदुओं को 4 श्रेणियों में विभाजित करता है जो ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं. जो लोग इन जातियों के समूहों के बाहर आते हैं, उनमें से प्रत्येक को समय-समय पर सामाजिक समारोह के रूप में जाना जाता है, जिन्हें दलित या अनुसूचित जाति के लोग अनुसूचित जाति कहते हैं. लेकिन दुर्भाग्य पूर्ण यह जाति का भेदभाव सिर्फ समाज में ही नही बल्कि न्यूज़रूम में भी देखने को मिलता है.

भारतीय सीमांत समूहों के विशाल हिस्से हैं और यह मीडिया प्लेटफॉर्मों तक पहुंचता है जो सार्वजनिक रूप से आकार लेते हैं. यह हमारे समाचार इको प्रणाली में प्रतिनिधित्व नहीं करने के लिए आवाजों को निरूपित करता है. यह रिपोर्ट स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि एक समान और विकसित समाज के लिए भारतीय नवगठनों में हाशिए पर रहने वाले समूहों के लिए सभी को शामिल किए जाने की सख्त जरूरत है.

यह खबर NewsLaundary निर्मित वीडियों से लिया गया है.

(अब आप नेशनल इंडिया न्यूज़ के साथ फेसबुकट्विटरऔर यू-ट्यूबपर जुड़ सकते हैं.)

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.

शयद आपको भी ये अच्छा लगे लेखक की ओर से अधिक