झारखंड चुनाव से बीजेपी डरी?

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पिछले दिनों महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के नतीजे आये,तब राजनैतिक कार्यकर्ताओं को झटका लगा कि जनता आखिर चाहती क्या है . कुछ ही महीने पहले लोकसभा चुनाव में बीजेपी और उसके गठबंधन को बड़ी सफलता मिली थी. इस सफलता से बीजेपी के मंसूबे का बढ़ जाना अस्वाभाविक नहीं था. लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव जनता के अलग ही मूड का परिचय दे रहे हैं. कहा जा सकता है कि बीजेपी के मन में कोई दुचित्तापन है. केंद्र और राज्य केलिए उसकी पसंद अलग -अलग है. 2014 में भी लोकसभा चुनाव के कुछ ही समय बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव में जनता ने बीजेपी को धूल चटा कर अपनी प्रवृत्ति का परिचय दिया था.

लेकिन अब हम उन इलाकों में झांकें जहाँ विधानसभाओं के चुनाव होने वाले हैं. बंगाल में तो 2021 में चुनाव होंगे,लेकिन दिल्ली झारखंड और बिहार में साल भर के अंदर होने हैं. दिल्ली और झारखंड में बीजेपी को वैसी भी सफलता मिल पायेगी.जैसी महाराष्ट्र और हरियाणा में मिली है . उपरोक्त दोनों प्रांतों में उसे अपने बूते का बहुमत नहीं है. वहीं दिल्ली में केजरीवाल हैं और लोग यह मान कर चल रहे हैं कि वह बीजेपी को टक्कर देंगे. इसलिए कि नागरिक जीवन को सँभालने खास कर शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में उनके कार्यों की प्रशंसा उनके विरोधी भी करते हैं.

झारखण्ड में बीजेपी की सरकार है. लेकिन कहा ये जा रहा है कि वहां बीजेपी को मुश्किलें हो सकती है अगर प्रतिपक्ष का राजनैतिक ध्रुवीकरण ठीक ढंग से हुआ. तो बीजेपी मुश्किल में पड़ सकती है,क्योंकि रघुवरदास सरकार विवादित स्थितियों में है. पार्टी के भीतर भी अंतरकलह है. उनका गैर आदिवासी होना भी एक बड़ा मुद्दा है.क्योंकि झारखंड का निर्माण ही आदिवासी संस्कृति और राजनीति को केंद्र में रख कर हुआ था. अभी बिहार के मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने इन दोनों राज्यों में बीजेपी से अलग हो कर चुनाव लड़ने का एलान किया है. इसके गहरे मतलब हैं. झारखंड और दिल्ली में जेडीयू का चुनाव लड़ना भाजपा केलिए कितना नुकसानप्रद होगा यह तो चुनाव बाद पता चलेगा. लेकिन इससे यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि बिहार एनडीए में सब कुछ ठीक- ठाक नहीं है.

हालांकि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक साक्षात्कार में यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में अगला चुनाव वह नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ेंगे. इससे आप पता लगा सकते है कि शाह की मंशा क्या है. दरअसल वह नीतीश को अपने चंगुल से बाहर नहीं करना चाहते. उन्हें फंसा कर रखना भाजपा केलिए लाभप्रद है. पूरी हिंदी पट्टी में नीतीश ही एक ऐसे नेता हैं. जिस पर भाजपा विरोध की राजनीति संघनित हो सकती है. इस संभावना को वह बनने देना नहीं चाहेगी. वह नीतीश को तब लताड़ेगी.जब उनका सत्व खत्म हो चुकेगा. लेकिन चुनाव में अभी काफी टाइम है.कभी भी और कोई भी पलटी मार सकता है. बिहारी राजनीति की अपनी कुछ विशिष्टता है. लोकसभा चुनावों में क्या हुआ.इसका कुछ खास अर्थ नहीं रह जाता. शायद इस हकीकत को अमित शाह अच्छी तरह समझते हैं इसीलिए दूध के जले अमित शाह इस दफा मट्ठा भी फूँक -फूँक कर पी रहे हैं.

वही बीजेपी अपने उग्र राष्ट्रवाद और हिन्दू -केंद्रित राजनीति के बल पर बहुत समय तक वोट हासिल नहीं कर सकती क्योंकि मुल्क की आर्थिक स्थिति ख़राब हैं. इससे राजनीति निरपेक्ष नहीं रह सकती. जनता चुनावी प्रवृत्ति को धीरे -धीरे समझ चुकी है बाकी आने वाले चुनावों के नतीजों में ही पता चलेगा कि दिल्ली,झारखंड और बिहार में किसकी सरकार बनेंगी. 2019 लोकसभा चुनाव के पहले हुए विधानसभा के चुनावों में राजस्थान छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में जनता ने जिस मिजाज का प्रदर्शन किया था.उस से विपरीत उसने लोकसभा चुनाव में किया. इसका एक अर्थ बहुत कुछ स्पष्ट भी है. वह यह कि जनता समझ गयी है कि राजनैतिक दलों के विचारों में कोई खास अंतर नहीं है. इसलिए केंद्र और राज्य में उसे जो अच्छा लगता है. उसे वह अपनाना चाहती है. कोई यह मान ले कि उस पार्टी की पराजय से हमेशा केलिए उसका खात्मा हो गया,तो वह मुगालते में है. कांग्रेस मुक्त भारत की बात करने वालों को हरियाणा और महाराष्ट्र में मिली उसकी थोड़ी -ही सही बढ़त से सबक लेनी चाहिए. कांग्रेस ख़त्म नहीं हो गयी है. वह लौट भी सकती है. यदि वह चाहे.

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