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Culture

विश्व मूलनिवासी दिवस: हमारी विरासत, संस्कृति, पहचान और अधिकारों का दिवस।

By- DR. Manisha Bangar आज  9 August अर्थात विश्व मूलनिवासी दिन है आज यह दिन विरासत और संस्कृति को याद करने का दिन है। सदियों से खोई हुई पहचान को उजागर करने का  दिन है | अधिकार दिवस भी है | यह हमारी आन-बान और शान का दिन है | हमारे गर्व और गौरव का दिन है | हमारे लिये हर्षोल्लास का दिन  है | खूब नाचो खूब गाओं जश्न मनाओ | मैं भी तो पिछले कुछ दिनों से शासक जातियों से,  शेठजी-भट्टजी से विदेशी आर्यों से सवाल करते हुए, बार बारगुनगुना रहीं हूँ एक गीत... “तुम इतना क्यूँ घबरा रहे हो क्या डर है जिसको छुपा रहे हो” क्योंकि पूरी दुनिया जब…

उपेक्षित नायक: करशनदास मुलजी…

By: Kirti Kumar विमर्श। जब वैष्णव समाज की बात आती है तो हमारी ज़ुबान पर एक ही नाम आ जाता है, मोहनदास करमचंद गांधी! और गांधी जी का नाम आते ही हमारे मन के रेडियो में गांधी जी की वो प्रिय धुन बजने लगती है, 'वैष्णव जन तो तेने रे कहिए..' लेकिन हक़ीक़त यह है कि वैष्णव जन की वेदना को करशनदास मुलजी नामक एक वैष्णव जन ने गांधीजी के जन्म से काफ़ी पहले समझा और उसे दूर भी किया। करशनदास मुलजी...यह वो नाम है, जिसने भारत के समाजिक परिवर्तन और समाज सुधार के दौर में काफ़ी सुर्ख़ियाँ बटोरी। लेकिन फिर गुमनामी के अंधेरो में खो गया या फिर उनकी…

एक और बहुजन बेटी ने रोशन किया नाम….

ये हैं तमिलनाडु के मदुरई की 23 साल काव्या रवि कुमार। काव्या देश की पहली बहुजन   महिला कॉमर्शियल पायलट है। इन्हें हाल ही में गवर्मेंट फ्लाइंग ट्रैनिंग स्कूल (GFTS) से कॉमर्शियल पायलेट का लाइसेंस औऱ बेस्ट स्टूडेंट अवॉर्ड भी मिला है। 21 साल के इंतज़ार के बाद ये उपलब्धि हासिल हो सकी है। देश में कई महिला कॉमर्शियल पायलट्स हैं। लेकिन सभी सवर्ण वर्ग की हैं और बेहद मजबूत परिवारिक पृष्ठभूमि की भी। जिन्हें ना पैसे की कमी हुई, ना प्रिवेलेज की। बल्कि सो कॉल्ड सुंदरता के पैमाने यानी सुकोमल, गोरे और नैन-नक्श आदि-आदि के पैमाने पर खरे…

“Shabaash” Hima Das !!

By- Dr. Manisha Bangar Your historical record victory is a tight slap on the brahmin-dwijas, their merit logic ,and their caste system :- Centuries of cornering of resources did not help the brahmin-dwija to produce single sportsperson athelete who could have won the race in the history of India. Dear friends !! We have all seen the awesome performance of Hima Das, the 18-year-old girl, who barely 18 months back, ran her first race in district level. Now, this young lass has done the country proud by winning a gold…

फुले और तिलक के बीच कड़ा संघर्ष क्यों…?

By- सिद्धार्थ रामु माली जाति के जोतीराव फुले (11 अप्रैल 1827,मृत्यु - 28 नवम्बर 1890) और चितपावन ब्राहमण बाल गंगाधर तिलक(23 जुलाई 1856 - 1 अगस्त 1920) के बीच तीखा संघर्ष क्यों होता रहा ? दोनों के बीच संघर्ष के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे मुद्दा नंबर 1- तिलक का मानना था कि जाति पर भारतीय समाज की बुनियाद टिकी है, जाति की समाप्ति का अर्थ है, भारतीय समाज की बुनियाद को तोड़ देना, साथ ही राष्ट्र और राष्ट्रीयता को तोड़ना है। इसके बरक्स फुले जाति को असमानता की बुनियाद मानते थे और इसे समाप्त करने का संघर्ष कर रहे थे। तिलक ने फुले को…

Captivating the Simple-Hearted; At Book launch, Manisha Bangar put stress to strengthen the Anti Brahmanical movements

“This particular book, it’s about two main forces,” said Bangar. “There have been two main streams of consciousness always alive in the Indian subcontinent. One is the Brahmanical, traditionalist, exclusionist stream of consciousness — another is a Shramanic, egalitarian, thought-provoking, and inclusionist stream, countering the caste system, varna system, scriptures, idolatry, and the medium of worship being through the Brahman.”

नेशनल इंडिया न्यूज की एग्‍जीक्‍यूटिव डायरेक्‍टर डॉ. मनीषा बांगर कनाडा के वैशाखी प्रोग्राम में वक्ता के तौर पर हुई आंमत्रित

By: Ankur Sethi ब्रैम्पटन। नेशनल इंडिया न्यूज की एग्‍जीक्‍यूटिव डायरेक्‍टर मनीषा बांगर को ओंटारियो गुरूद्वारा सिक्ख कमेटी द्वारा 7 मई को वैशाखी नगर प्रोग्राम में वक्ता के तौर पर ब्रैम्पटन शहर में आमंत्रित किया गया है। सिक्ख समुदाय विदेश में भी वैशाखी पर्व को धूमधाम से मनाता है जिसमें भारत से कई अतिथियों को आमंत्रित किया जाता है। सिक्ख धर्म एक ऐसा धर्म है जो शांति, भाईचारे और वंचित लोगो को ऊपर उठाने में विश्वास रखता है। ब्रैम्पटन शहर में नेशनल इंडिया न्यूज की एग्‍जीक्‍यूटिव डायरेक्‍टर मनीषा बांगर वैशाखी नगर कीर्तन के रूप में…

जातिव्यवस्था पर चोट करने वाले ज्योतिबा फुले जीवनभर ब्राह्मणवाद से लड़ते रहे

ज्योतिबा फुले ने ब्राह्मणवाद को दुतकारते हुए बिना किसी ब्राम्हण-पंडित पुरोहित के विवाह-संस्कार शुरू कराया और बाद में इसे मुंबई हाईकोर्ट से मान्यता भी दिलाई. उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले भी एक समाजसेविका थीं. उन्हें भारत की पहली महिला अध्यापिका और नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता कहा जाता है. अपनी पत्नी के साथ मिल कर स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1848 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था।