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Culture

सावित्री बाई फुले और फ़ातमा शेख ने कैसे महिला शिक्षा के लिए लड़ाई लड़ी, पढ़िए शानदार लेख

By: Zulaikha Jabeen अठारहवीं सदी के पेशवाई युग में ब्राह्मणों के दबाव में जोतिबा फुले के वालिद ने जब अपने शादीशुदा बेटे को घर से निकाल दिया तो सावित्री बाई भी अपने ख़ाविंद के हमराह घर से बाहर निकल आईं। जोतिबा के बचपन के दोस्त गंजपेठ (पुणे) के उस्मान शेख़ ने फुले दंपत्ति को अपने घर में न सिर्फ़ पनाह दी. बल्कि "आत्मनिर्भर गृहस्थी" बसाने की ज़रूरत का हर सामान भी मुहैया कराया. उनका हर तरह से ख़याल रखते हुए उस्मान शेख़ जोतिबा को उनके "मिशन" को आगे बढ़ाने का मशवरा भी देते रहे। लोगों को शिक्षित करने के जोतिबा फुले के ख़ाब को ताबीर…

आरएसएस की शाखा में खड़े प्रोफेसर विवेक कुमार के फोटो का क्या है असली सच पढ़िये…

By~ अशोक दास, सोशल एक्टीविस्ट   बीते 48 घंटों से सोशल मीडिया पर एक बार फिर जवाहर लाल नेहरू युनिवर्सिटी के प्रोफेसर विवेक कुमार की एक फोटो घूम रही है। इस फोटो में विवेक कुमार आरएसएस के मंच से अपनी बात रख रहे हैं। इसके आधार पर दुष्प्रचार किया जा रहा है। कि प्रोफेसर विवेक कुमार आरएसएस के एजेंट हैं। यह तस्वीर पहली बार सामने नहीं आई है। बीते साल पहले भी कुछ लोगों ने उस तस्वीर को फेसबुक पर शेयर कर प्रोफेसर विवेक कुमार के बारे में दुष्प्रचार करने की कोशिश की थी।अमूमन मैं किसी मसले पर जल्दी कोई कमेंट करने से बचता हूं। लेकिन चूंकि…

गुरु नानक ने छोटी सी उम्र से ही जातिवाद के खिलाफ लड़ाई शुरु कर दी थी।

नई दिल्ली। गुरु नानक जी ने बहुत छोटी आयु में यह समझ लिया था कि जातिप्रथा एक शोषणकारी व्यवस्था है। उस समय में जातिभेद चरम पर थाl ऐसे समय में गुरुनानक देव ने ऊँच-नीच को बढ़ावा देने वाली जातिभेद की दीवार को सिरे से ख़ारिज किया थाl उन्होंने न केवल अस्पृश्यता का विरोध किया बल्कि पंडे-पुजारियों की भी आलोचना कीl उस समय ब्राह्मणवाद को लताड़ने का साहस कबीर, रविदास, गुरुनानक जैसे क्रांतिकारी ही कर पा रहे थेl गुरुनानक जी ने जातिवाद का घोर विरोध सिर्फ वैचारिक रूप से नहीं किया बल्कि अपने निजी जीवन में भी इस विरोध को जिया l इसी का नतीजा था…

2019 में भाजपा का हारना तय है!

2019 में भाजपा का हारना तय है. जनता भाजपा के फरेब से परिचित हो चुकी है. भाजपा को भी पता है कि लोग अब पहले की तरह बेवकूफ बनने वाले नहीं हैं. इसीलिए वह विकास का मुद्दा छोड़कर अपने मूल हथियार यानी साम्प्रदायिक राजनीति का प्रयोग करने के लिए माहौल बनाने लगी है. इसके लिए लगभग सभी न्यूज चैनल , ट्विटर , व्हाट्सएप और फेसबुक का प्रयोग शुरू हो चुका है. फेक न्यूज और प्लांटेड न्यूज से जनता को साम्प्रदायिक होने के लिए उकसाया जा रहा है. लेकिन इसका भी कोई खास असर होता नहीं दिख रहा है. प्रो-बीजेपी तमाम न्यूज चैनल्स और शोसल मीडिया ग्रुप्स/पेज…

क्या सम्राट अकबर को ब्राह्मणों ने विष्णु अवतार घोषित किया था ?

मुग़ल सम्राट अकबर को लेकर आज तगड़ा भ्रम फैला है | पुराने इतिहासकारों ने उसे धार्मिक रूप से सहिष्णु व सबको साथ लेकर चलने वाला महान बादशाह लिखा है | यह सच है कि यदि अकबर धार्मिक रूप से सहिष्णु नहीं होता तो राजपूतों राजाओं के साथ उसकी संधियाँ नहीं निभती | पर आजकल  भारत में धार्मिक तौर पर एक नया ट्रेंड चला है, दूसरे के धर्म, जाति को कठघरे में खड़ा कर उसका चरित्रहनन करने का | अकबर भी इस नए ट्रेंड का पूरा शिकार है | पहले विदेशी व वामपंथी इतिहासकारों ने उसे भारतियों का मनोबल तोड़ने के लिए जरुरत से ज्यादा महिमामंडित किया तो आज राजनैतिक,…

जिन लोगों को लगता है कि एक थप्पड़ मारने पर SC/ST Act लग जाता है!

By- Umashankar  Yadav अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जबरन अखाद्य या घृणाजनक (मल मूत्र इत्यादि) पदार्थ खिलाना या पिलाना। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को शारीरिक चोट पहुंचाना या उनके घर के आस-पास या परिवार में उन्हें अपमानित करने या क्षुब्ध करने की नीयत से कूड़ा-करकट, मल या मृत पशु का शव फेंक देना। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के शरीर से बलपूर्वक कपड़ा उतारना या उसे नंगा करके या उसके चेहरें पर पेंट पोत कर सार्वजनिक रूप में घुमाना या इसी प्रकार का कोई ऐसा कार्य…

राष्ट्रध्वज ‘तिरंगा’ नहीं ‘चौरंगा’ है, पढ़कर समझिए?

नई दिल्ली। असलियत में भारत का राष्ट्रीय ध्वज 4 रंगों का होता है, न कि 3 का। यह तीन (केसरिया, सफेद और गहरे हरे) रंग की क्षैतिज पट्टियों के बीच नीले रंग के एक चक्र, जिसमें 24 तीलियाँ या आरे होते हैं, द्वारा सुशोभित है। नीले रंग के चक्र को सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ से लिया गया है। इस राष्ट्रीय ध्वज को 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक में अपनाया गया था। उपर्युक्त विवरण से निसंदेह स्पष्ट है कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज में चार रंग विद्यमान हैं केसरिया, सफेद, नीला और हरा। लेकिन फिर भी 71 साल से इसे जानबूझकर तिरंगा ही…

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में डॉ. आंबेडकर की क्या राय…

आजादी से 1 वर्ष पहले 1946 में डॉ. आंबेडकर ने लिखा कि “ हिंदुओं और मुसलामनों की लालसा स्वाधीनता की आकांक्षा नहीं हैं. यह सत्ता संघर्ष है,जिसे स्वतंत्रता बताया जा रहा है.. कांग्रेस मध्यवर्गीय हिंदुओं की संस्था है, जिसकों हिदू पूंजीपतियों की समर्थन प्राप्त है, जिसका लक्ष्य भारतीयों की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि ब्रिटेन के नियंत्रण से मुक्त होना और सत्ता प्राप्त कर लेना है, जो इस समय अंग्रेजों की मुट्ठी में हैं.” ( डॉ, आंबेडकर, संपूर्ण वाग्यमय, खंड-17, पृ.3 ). मुसलमान... मध्यवर्गीय हिंदुओं के वर्चस्व से मुक्ति के लिए अलग…

विश्व मूलनिवासी दिवस: हमारी विरासत, संस्कृति, पहचान और अधिकारों का दिवस।

By- DR. Manisha Bangar आज  9 August अर्थात विश्व मूलनिवासी दिन है आज यह दिन विरासत और संस्कृति को याद करने का दिन है। सदियों से खोई हुई पहचान को उजागर करने का  दिन है | अधिकार दिवस भी है | यह हमारी आन-बान और शान का दिन है | हमारे गर्व और गौरव का दिन है | हमारे लिये हर्षोल्लास का दिन  है | खूब नाचो खूब गाओं जश्न मनाओ | मैं भी तो पिछले कुछ दिनों से शासक जातियों से,  शेठजी-भट्टजी से विदेशी आर्यों से सवाल करते हुए, बार बारगुनगुना रहीं हूँ एक गीत... “तुम इतना क्यूँ घबरा रहे हो क्या डर है जिसको छुपा रहे हो” क्योंकि पूरी दुनिया जब…

उपेक्षित नायक: करशनदास मुलजी…

By: Kirti Kumar विमर्श। जब वैष्णव समाज की बात आती है तो हमारी ज़ुबान पर एक ही नाम आ जाता है, मोहनदास करमचंद गांधी! और गांधी जी का नाम आते ही हमारे मन के रेडियो में गांधी जी की वो प्रिय धुन बजने लगती है, 'वैष्णव जन तो तेने रे कहिए..' लेकिन हक़ीक़त यह है कि वैष्णव जन की वेदना को करशनदास मुलजी नामक एक वैष्णव जन ने गांधीजी के जन्म से काफ़ी पहले समझा और उसे दूर भी किया। करशनदास मुलजी...यह वो नाम है, जिसने भारत के समाजिक परिवर्तन और समाज सुधार के दौर में काफ़ी सुर्ख़ियाँ बटोरी। लेकिन फिर गुमनामी के अंधेरो में खो गया या फिर उनकी…