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Culture

फुले और तिलक के बीच कड़ा संघर्ष क्यों…?

By- सिद्धार्थ रामु माली जाति के जोतीराव फुले (11 अप्रैल 1827,मृत्यु - 28 नवम्बर 1890) और चितपावन ब्राहमण बाल गंगाधर तिलक(23 जुलाई 1856 - 1 अगस्त 1920) के बीच तीखा संघर्ष क्यों होता रहा ? दोनों के बीच संघर्ष के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे मुद्दा नंबर 1- तिलक का मानना था कि जाति पर भारतीय समाज की बुनियाद टिकी है, जाति की समाप्ति का अर्थ है, भारतीय समाज की बुनियाद को तोड़ देना, साथ ही राष्ट्र और राष्ट्रीयता को तोड़ना है। इसके बरक्स फुले जाति को असमानता की बुनियाद मानते थे और इसे समाप्त करने का संघर्ष कर रहे थे। तिलक ने फुले को…

Captivating the Simple-Hearted; At Book launch, Manisha Bangar put stress to strengthen the Anti Brahmanical movements

“This particular book, it’s about two main forces,” said Bangar. “There have been two main streams of consciousness always alive in the Indian subcontinent. One is the Brahmanical, traditionalist, exclusionist stream of consciousness — another is a Shramanic, egalitarian, thought-provoking, and inclusionist stream, countering the caste system, varna system, scriptures, idolatry, and the medium of worship being through the Brahman.”

नेशनल इंडिया न्यूज की एग्‍जीक्‍यूटिव डायरेक्‍टर डॉ. मनीषा बांगर कनाडा के वैशाखी प्रोग्राम में वक्ता के तौर पर हुई आंमत्रित

By: Ankur Sethi ब्रैम्पटन। नेशनल इंडिया न्यूज की एग्‍जीक्‍यूटिव डायरेक्‍टर मनीषा बांगर को ओंटारियो गुरूद्वारा सिक्ख कमेटी द्वारा 7 मई को वैशाखी नगर प्रोग्राम में वक्ता के तौर पर ब्रैम्पटन शहर में आमंत्रित किया गया है। सिक्ख समुदाय विदेश में भी वैशाखी पर्व को धूमधाम से मनाता है जिसमें भारत से कई अतिथियों को आमंत्रित किया जाता है। सिक्ख धर्म एक ऐसा धर्म है जो शांति, भाईचारे और वंचित लोगो को ऊपर उठाने में विश्वास रखता है। ब्रैम्पटन शहर में नेशनल इंडिया न्यूज की एग्‍जीक्‍यूटिव डायरेक्‍टर मनीषा बांगर वैशाखी नगर कीर्तन के रूप में…

जातिव्यवस्था पर चोट करने वाले ज्योतिबा फुले जीवनभर ब्राह्मणवाद से लड़ते रहे

ज्योतिबा फुले ने ब्राह्मणवाद को दुतकारते हुए बिना किसी ब्राम्हण-पंडित पुरोहित के विवाह-संस्कार शुरू कराया और बाद में इसे मुंबई हाईकोर्ट से मान्यता भी दिलाई. उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले भी एक समाजसेविका थीं. उन्हें भारत की पहली महिला अध्यापिका और नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता कहा जाता है. अपनी पत्नी के साथ मिल कर स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1848 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था।

From S(e)oul to the land of sambar

By Mirah Zamin Chennai:  Boxed between two buildings, hidden behind the façade of billboards and banners in the dark corridors of Kaveri complex, Osaka food’s situated in Nungambakkam sells some of the most traditional food ingredients for Korean cuisines. Shekar the manager of the shop says ‘Shin Ramyum’, is the favourite noodle brand amongst the Koreans. Chennai has four more such outlets that import Korean food items such as sticky rice, tuna fish, dried seaweeds, silkworms and rice paper for sushi. The oldest is one…

Re-visiting nostalgia over coffee

The first sight that any visitor lays eyes upon is the wooden framed photo of Jawahar Lal Nehru hanging right in front of the entrance. The coffee house here is like any other coffee house operated by the Workers Cooperative society with an only difference that it still has life unlike the one back in my hometown (Lucknow) which has lost its charms with the springing culture of branded foreign chains.

शहीद दिवस: भगत सिंह और राष्ट्रवाद…पढ़िए झकझोर देने वाला विमर्श

By: Keerti Kumar विमर्श। 23 साल की उम्र में आज युवा किसी मूवी का रिव्यू पूछता है या क्रिकेट का स्कोर!! ज्यादा पढ़ाकु होगा तो किसी धर्म स्थान में अपने उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए मिल जाएगा! लेकिन इस उम्र में संशयात्मक विवेक बुद्धिवादी वैचारिक क्षमता शायद ही कहीं देखी जा सकती है। भगत सिंह कुछ दंभी पाखंडी राष्ट्रवादीयों द्वारा सिर्फ फांसी के लिए ही याद किये जाते है। भगत सिंह का फांसी पर चढ़ने का निर्णय वाकई में क्रांतिकारी था। कम उम्र में राष्ट्र के लिए प्राण न्योछावर कर देना बहुत बड़ी बात है। लेकिन इससे भी अधिक क्रांतिकारी…