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अब जनसंख्या नियंत्रण पर बिल लाने की तैयारी? पीएम मोदी के आह्वान के 4 महीने बाद रोडमैप बनाने में जुटा नीति आयोग

केंद्र सरकार अब देश में जनसंख्या स्थिरीकरण पर नया कानून ला सकती है। इसके लिए रोडमैप बनाने की प्रक्रिया तेज हो गई है। इस दिशा में कदम उठाते हुए नीति आयोग ने आज (20 दिसंबर) को ‘जनसंख्या स्थिरीकरण की दृष्टि को साकार करना: किसी को पीछे नहीं छोड़ना’ विषय पर राष्ट्रीय विचार-विमर्श का आयोजन किया है। आयोग की यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान के चार महीने बाद शुरू हुई है। आयोग के मुताबिक, विचार-विमर्श के निष्कर्षों और सिफारिशों के आधार पर इस दिशा में वर्किंग पेपर तैयार किया जाएगा ताकि सरकार जनसंख्या स्थिरीकरण की तरफ ठोस कदम

महानायक बिरसा मुंडा कैसे बने भगवान!

आज बिरसा मुंडा की जयंती है और पूरा आदिवासी समाज जयंती मना रहा है. वही ट्वीटर पर भी धरती आबा-बिरसामुंडा ट्रेंडिंग पर चल रहा है. बिरसा मुंडा औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ आदिवासी जनता के निर्णायक संघर्ष के प्रतीक माने जाते हैं. हालंकि कम लोग जानते है कि बिरसा मुंड़ा कौन है. तो आपको बता दें कि जिस वक्त राजनीति की मुख्यधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस अंग्रेजों की छत्रछाया में सीमित आंतरिक स्वशासन या होम रूल की मांग कर रही थी. उससे कई दशक पूर्व बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों से मुक्ति के खिलाफ निर्णायक संघर्ष का ऐलान किया और पूरी

गुरु नानक देव और धार्मिक-सामाजिक क्रांति

गुरु नानक इस देश में एक नयी ही धार्मिक-सामाजिक क्रान्ति और जागरण के प्रस्तोता हैं। पूरे मध्यकालीन संत साहित्य में जिन श्रेष्ठताओं का दर्शन बिखरे हुए रूप में होता है उन सबको नानक एकसाथ एक मंच पर ले आते हैं। उनकी परम्परा में बना गुरु ग्रन्थ साहिब इतना इन्क्लूसिव और ज़िंदा ग्रन्थ है कि उसकी मिसाल किसी अन्य धर्म या सम्प्रदाय में नहीं है। आज नानक जयन्ती पर नानक को परम्परावादी प्रशंसा या अहोभाव की मुद्रा से परे जाकर एक समाज क्रान्ति के मसीहा के रूप में देखने का दिन है। हमारे अधिकाँश संत और महापुरुष - जो सम्प्रदायों की चादरों

गुरु नानक देव जी ने संगठित समाज की नींव रख कैसे धर्म-जाति के बंधन को तोड़ा

सिख धर्म के संस्थापक और सिखों के पहले गुरू गुरुनानक देव की आज 550वीं जयंती है जिसे देशभर में सिख समुदाय के लोग प्रकाश पर्व के तौर पर मनाते है. सिख समुदाय इस दिन को खास मानकर गुरुद्वारा जाते है और सरोवर में स्नान करते है. इसके अलावा हर गुरुद्वारे को सजाया जाता है, कार्यक्रम होता है और लंगर भी लगाए जाते है. प्रकाश पर्व के दिन सुबह से ही गुरुद्वारों में धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो देर रात तक चलता है.यह पर्व समाज के हर व्यक्ति को साथ रहने, खाने और मेहनत की कमाई करने का संदेश देता है. वही इस जंयती के

रविदास मंदिर को लेकर जारी हुआ नया फरमान जानिए क्या है वो?

BY_सद्दाम करिमी दिल्ली के तुगलकाबाद इलाके में मंगलवार 10 सितंबर को लोगों ने रविदास मंदिर स्थल पर जाकर पूजा अर्चना करने की कोशिश की है। हालांकि, पुलिस ने उन्हें पहले वहां पहुंचने से रोक दिया था। बता दें कि इस मंदिर को करीब एक महीने पहले उच्चतम न्यायालय के आदेश पर ध्वस्त कर दिया गया था। पुलिस के मुताबिक करीब 100 लोग गुरु रविदास मार्ग पर जमा हुए और मंदिर की तरफ मार्च किया लेकिन रोके जाने के बाद उन्होंने सड़क पर ही अनुष्ठान किया। संयुक्त पुलिस आयुक्त दक्षिणी क्षेत्र देवेश श्रीवास्तव ने कहा, हमने पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की थी।…

क्यों संत रैदास को संघ एवं हिंदू दल और भाजपा अपना नायक नहीं मानते ?

By-डॉ सिद्धार्थ रामू~ क्यों संत रैदास को संघ, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा हिंदू एवं अपना नायक नहीं मानते ? रैदास मंंदिर तोड़ने, उसके बाद उसके विरोध मेंं देश-दुनिया के दलित-बहुजनों के सैलाब के उमड़ने और उसके बाद के सारे घटनाक्रम पर संघ-भाजपा और उसके अन्य आनुषांगिक संगठनों की चुप्पी क्या साफ-साफ इस बात की घोषणा नहीं है कि ये लोग रैदास को न तो हिंदू मानते हैं और न ही अपना नायक मानते हैं। कल्पना कीजिए यदि आदि शंकराचार्य, तुलदीदास, सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय का कोई मंदिर…

अमर स्वतंत्रता सेनानी शहीद रामफल मंडल को उनके शहादत दिवस पर नमन

By-प्रशांत निहाल~ सन 1942 में गांधी के आह्वाहन पर अंग्रेज़ों के खिलाफ छेड़े गए भारत छोड़ो आंदोलन का बिहार में काफी प्रभाव था. युवाओं ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और इस आंदोलन को एक क्रन्तिकारी आंदोलन में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ा. जगह-जगह सरकारी दफ्तरों, थानों पर कब्ज़ा किया गया और उन जगहों को आजाद घोषित किया गया. ये घोषित आज़ादी भले ही कुछ दिन टिकी हो पर अपने पिछे एक क्रान्तिकारी विरासत छोड़ गया है और उस वक़्त अंग्रेज़ो को यह बता गया कि हिन्दुस्तान में उनके आखिरी दिन चल रहे हैं. शहीद रामफल मंडल भारत छोड़ो आंदोलन के…

मुख्यधारा की मीडिया को राम से इतनी भक्ति और रैदास से इतनी घृणा क्यों है?

By-डॉ सिद्धार्थ रामू~ मुख्य धारा की मीडिया की नजर में राम मंदिर के लिए दंगा करने वाले और न्यायालयों को ठेंगा पर रखकर बाबरी मस्जिद तोड़ने वाले रामभक्त और कार सेवक होते हैं और रैदास मंदिर के लिए संघर्ष करने वाले दंगाई होते हैं। सबको याद होगा कि किस तरह राम मंदिर को आंदोलन को जनांदोलन बनाने में मुख्य धारा की मीडिया की अहम भूमिका रही है। मीडिया ने राम मंदिर के लिए आडवाणी की रथयात्रा, बजरंगदलियों के उत्पात और मस्जिद तोड़ने वालों को कार सेवक पुकार ऐसा माहौल बनाया जैसे ये लोग राष्ट्र निर्माण का कोई महान कार्य कर रहे हैं।…

रविदास मंदिर का टूटना और मोदी सरकार

~दिलीप मंड़ल एससी-एसटी एक्ट को बेअसर करने का सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला जस्टिस आदर्श गोयल और ललित की बेंच ने दिया था। मोदी सरकार ने रिटायर होते ही जस्टिस गोयल को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के चेयरमैन जैसे शानदार पद पर बैठाकर पुरस्कृत किया। इसका विरोध ख़ुद केंद्रीय मंत्रियों ने किया। लेकिन सरकार मन बना चुकी थी कि एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ फ़ैसला देने वाले जज को इनाम देना है। इसके बाद कोई भी जज एससी-एसटी मामलों में सामाजिक न्याय के पक्ष में फ़ैसला क्यों देगा? दिल्ली के संत रविदास ऐतिहासिक मंदिर मामले में केंद्र सरकार की यही भूमिका है।…

जै भीम के नारे से जै श्रीराम के नारे को पराजित करना जरूरी क्यों है

By-डॉ सिद्धार्थ रामू~ जब तक जै भीम का नारा पूरी तरह से जै श्रीराम के नारे को पराजित नहीं कर देता, तब तक इस देश में वास्तविक अर्थों में स्वतंत्रता, समता, भाईचारा, न्याय और लोकतंत्र की स्थापना नहीं हो सकती है। सार्वजनिक जीवन में दो नारे गूंज रहे हैं। पहला नारा जै श्रीराम का है और दूसरा नारा जै भीम का है। जै श्रीराम का नारा भारत की सत्ता पर द्विजों के कब्जे का नारा बन चुका है। इस नारे के माध्यम से संघ-भाजपा ने हिंदू राष्ट्र की अपनी कल्पना को साकार किया है। यह ब्राह्मणवाद, वर्ण-जाति व्यवस्था और स्त्रियों पर पुरूषों के प्रभुत्व…