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Opinions

काला’ मस्टवॉच फिल्म है- मगर किसके लिए?

रिव्यू। एक तरफ NDTV इंग्लिश के फिल्म समीक्षक राजा सेन काला फिल्म को बकवास कहते हुए 1.5 रेटिंग देते है। वहीं दूसरी तरफ एनडीटीवी हिंदी के फिल्म समीक्षक नरेंद्र सैनी फिल्म को 3.5 की अच्छी रेटिंग देते है। इस दोनों रेटिंग के बीच याद आया कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में काला मुख्य धारा की पहली फ़िल्म है, जिसमें जय भीम के नारो की गूंज सुनाई देती हैं। गौरतलब यह भी है कि यहां बहुजन प्रतीकों की भाषा (Language of Symbols) का भरपूर उपयोग है। जो काम रजनीकांतके डायलाग नहीं करते वह काम पोस्टर, प्रतिमाएं, तस्वीरें, किताबें एवं विहार करते है।…

फिल्म रिव्यू: समाज की जातिय व्यवस्था पर कुठाराघात है फिल्म ‘काला’

By: Sanjay Sharman Jothe  फ़िल्म "काला" में पा रंजीत की कल्पनाशीलता अद्भुत है, वे जिन बारीक रास्तों से बहुजन भारत के नैरेटिव को उभार रहे हैं वह भारत मे 'इस पैमाने' पर पहली बार हो रहा है। फ़िल्म "काला" वास्तव में एक मील का पत्थर है। इसके संवादों, प्रतीकों, इशारों, मूर्तियों और चित्रों इत्यादि से बहुजन भारत की उपस्थिति और ताकत का बेबाक चित्रण हुआ है। बहुजनों की ग़रीबी, शहरीकरण की समस्याओं और बहुजन मुस्लिम एकता का जो चित्रण इसमें मिलता है वह महत्वपूर्ण है। फ़िल्म में टर्निंग पॉइंट जे रूप में "बहुजन नॉन-कोऑपरेशन मूवमेंट" की सफलता का…

जानिए 25 साल की उम्र में कैसे महानायक बने बिरसा मुंडा, पढ़िए दिल को छू जाने वाला लेख!

कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे, हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे.. कोह से नीचे उतर कर कंकरी चुनते थे... इश्क़ में जो आबजू थे जंग में सैलाब थे...!!!! -हसन नईम मुक़द्दस = पवित्र, अस्बाब = काऱण, कोह = पर्वत, आबजू = नदी , धारा आज धरती के आबा जननायक बिरसा मुंडा की शहादत का दिन (9 June 1900) है। सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1765 को झारखंड प्रदेश में राँची के उलीहातू गाँव में हुआ था। और इनकी तस्वीर में इनके परंपरागत पहनावे से पता भी नहीं चलता कि वे चाईबासा इंग्लिश…

‘एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट के मामले में कोई अध्यादेश नहीं लाएगी सरकार’

By: Deepali Taday नई दिल्ली। भारत में ब्राह्मणवाद अपनी सोशल इंजीनियरिंग और ओपरेशन के बूते ही बेहद मजबूती से जमा हुआ है। सोशल इंजीनियरिंग की इस व्यवस्था को संसद, प्रशासन, पुलिस, कोर्ट, मीडिया, उद्योग, स्कूल-यूनिवर्सिटी नाम के सात स्तम्भों पर कब्ज़ा करके ब्राह्मणवाद संचालित किया जा रहा है। चूँकि फिलहाल अब सत्ता सीधे मनुपुत्रों के हाथों में तो ये जमीनी स्तर पर सामाजिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र के माध्यम से संवैधानिक व्यवस्था दोनों को कंट्रोल करते हुए एससी/एसटी, पसमांदा मुस्लिमों और ओबीसी वर्गों के खिलाफ़ प्रयोग कर रहें हैंl ऐसा…

प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम नहीं, जानिए क्या है साजिश?

By: Deepali Tayday नई दिल्ली। दरअसल अब तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण पर बंबई, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अलग-अलग निर्णय दिए हैं। जब ये मामले हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचे तो सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों ने अलग-अलग मामलों में अलग-अलग तरह के निर्णय दिए। इस तरह प्रमोशन में आरक्षण पर कोई एक पुख़्ता फैसला नहीं हो सका है। यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने कल एससी-एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण को मौखिक सहमति दे दी।…

बहुजन पत्रकार नवल किशोर को जान से मारने की धमकी, और सब खामोश

BY: RATNESH YADAV कई पत्रकारों की हत्या इसलिये हो गई क्योंकि वो शिक्षा माफियाओं, बालू खनन माफियाओं, सामंती माफियाओं, और उद्योगपतियों के गुंडों के खिलाफ आवाज उठाते रहे। कई ऐसे भी पत्रकारों की हत्या हो गई जो लोग समाज में जातिय हिंसा और जातिय शोषण के खिलाफ वंचितो के हक़/अधिकार की बात उठाते रहे। और कुछ ऐसे पत्रकारों की हत्या कर दी गई जो समाज में फैले अंधविश्वास पर लगातार चोट करते रहे और अंधविश्वास के नाम पर पाखंडियों को जेल में भेजवाते रहे। इन सभी पत्रकारों को एक दो बार धमकी मिलती थी उसके बाद सीधे हत्या कर दी गई। ऐसे ही आज कल…

जब रवीश कुमार के लिए आवाज़ उठाई जा सकती है तो बहुजन पत्रकार नवल किशोर की जान के लिए क्यों नहीं?

BY: DEEPALI TAYDAY नई दिल्ली। बहुजन मुद्दों की अग्रणी पत्रिका और न्यूज़ पोर्टल "फॉरवर्ड प्रेस" के संपादक नवल किशोर को रणवीर सेना समर्थकों की तरफ से लगातार जान से मारने और उनके घर की महिलाओं से रेप करने की धमकियां मिल रही है। कारण हैं ब्रह्मेश्वर मुखिया। 1 जून, 2018 को भोजपुर जिला के खोपिरा में रणवीर सेना प्रमुख रहे ब्रह्मेश्वर मुखिया की प्रतिमा स्थापना का आयोजन था। बिहार में बहुजनों और मुस्लिमों का कत्लेआम करने वाले की मूर्ति लगाए जाने का नवल किशोर कुमार ने 27 मई, 2018 को अपनी फेसबुक पोस्ट में विरोध किया था। तब से रणवीर सेना…

“कैराना चुनाव नतीज़े – सीख और समझ”

-DEEPALI TAYDAY विमर्श। कैराना के नतीज़े देखकर ईवीएम बैन की माँग कमज़ोर मत होने देना। क्योंकि सरकार चुनाव आयोग की मदद से ईवीएम की पवित्रता दिखाने के लिए बीच-बीच में ऐसी छुट-पुट जीतें करवाती रहेंगी। ताकि लोग ईवीएम पर सवाल नहीं ऊठाएं और ऊठाएं तो भी कैराना जैसी जीतें दिखाकर आपका मुँह बन्द कराया जा सके। गौरतलब है कि कैराना में पहली बार ईवीएम को लू लग गई थी, आगे बुखार, टीबी, कैंसर कुछ और भी हो सकता है। वो तो कैराना के लोगों की सतर्कता के कारण लू ठीक हो गई वरना यहां भी बीजेपी ही जीतती। दूसरी इम्पोर्टेन्ट बात दलित-बहुजन एकता ही 2019…

बीएन मंडल: समाजवादी सियासत का यशस्वी चेहरा

बकौल जेम्स फ्रीमैन क्लार्क, “A politician thinks of the next election. A statesman, of the next generation”. अर्थात्, एक राजनीतिज्ञ अगले चुनाव के बारे में सोचता है, पर एक दूरदर्शी राजनेता अगली पीढ़ी के बारे में। भूपेन्द्र नारायण मंडल ऐसी ही समृद्ध सोच के एक विवेकवान राजनेता का नाम है। जाति नहीं जमात की राजनीति के पुरोधा, बिहार में सोशलिस्टों की पहली पीढ़ी के विधायक (1957), 1962 में बिहार के सहरसा से चुनकर लोकसभा पहुंचने वाले प्रखर सांसद व सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष (1959) रहे बी. एन. मंडल (1 फरवरी 1904-29 मई 1975)…

‘बहुजनों को सत्ताधारी वर्ग के खिलाफ आर्थिक और धार्मिक आंदोलन छेड़ने की जरुरत है’ पढ़िए शानदार विमर्श

मंदिरों, कर्मकांडों से लेकर न्यायपालिका तक एक वर्ण का वर्चस्व है, वहीं गली नुक्कड़ की किराने की दुकान से लेकर अनाज मंडियों और उद्योगों, बैंको में दूसरे वर्ण का वर्चस्व है। ये वर्चस्व राजनीति बदलने से नहीं टूटेगा।