Browsing Category

Opinions

सावित्री बाई फुले और फ़ातमा शेख ने कैसे महिला शिक्षा के लिए लड़ाई लड़ी, पढ़िए शानदार लेख

By: Zulaikha Jabeen अठारहवीं सदी के पेशवाई युग में ब्राह्मणों के दबाव में जोतिबा फुले के वालिद ने जब अपने शादीशुदा बेटे को घर से निकाल दिया तो सावित्री बाई भी अपने ख़ाविंद के हमराह घर से बाहर निकल आईं। जोतिबा के बचपन के दोस्त गंजपेठ (पुणे) के उस्मान शेख़ ने फुले दंपत्ति को अपने घर में न सिर्फ़ पनाह दी. बल्कि "आत्मनिर्भर गृहस्थी" बसाने की ज़रूरत का हर सामान भी मुहैया कराया. उनका हर तरह से ख़याल रखते हुए उस्मान शेख़ जोतिबा को उनके "मिशन" को आगे बढ़ाने का मशवरा भी देते रहे। लोगों को शिक्षित करने के जोतिबा फुले के ख़ाब को ताबीर…

माता सावित्री बाई फुले जिनके संघर्ष ने खोले महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार

केवल एक ही शत्रु है अपना, मिलकर निकाल देंगे उसे बाहर, उसके सिवा कोई शत्रु नहीं, बताती हूँ उस शत्रु का नाम, सुनो ठीक से उस शत्रु का नाम, वो तो है अविद्यारूपी 'अज्ञान' देश की प्रथम महिला शिक्षिका माता सावित्री बाई फुले की उपरोक्त लाइन यह बताने के लिए काफी हैं कि महिला शिक्षा के क्षेत्र में उनका कैसा योगदान रहा! भारत में सदियों से पुरुषों द्वारा महिलाओं को गुलाम बनाकर उनका शोषण होता रहा है। हमारे धार्मिक ग्रथों में भी महिलाओं की स्थिति को अत्यंत ही दयनीय रुप दर्शाया गया है। तुलसीदासजी ने तो यहां तक लिखा है कि ढोल, गंवार, शुद्र,…

तो ईवीएम पवित्र सिद्ध हो गई???

चुनाव परिणाम ऐसे ही आने थे क्योंकि यही कांग्रेस और बीजेपी एक ही माला आरएसएस के मोती हैं। आज आरएसएस के द्वारा देश में जितना उन्माद-हिंसा और तबाही फैली है वह सब कांग्रेस के बूते ही आई है। ईवीएम को कांग्रेस ही लेकर आई। और कांग्रेस ने कभी भी ईवीएम को लेकर विरोध नहीं किया। क्योंकि बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही ईवीएम से फायदा है। कांग्रेस के जीतने से ईवीएम की पवित्रता को सिद्ध माना जायेगा। फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में यही ईवीएम के भरोसे ब्राह्मणवादियों की सरकार बनेगी। बीच-बीच में छोटी-छोटी जीत-हार करानी पड़ती है क्योंकि इससे…

उर्जित पटेल!!! क्या भारतीय अर्थव्यवस्था के हालात इतने ज्यादा बिगड़ गए हैं???

नई दिल्ली। भारत के केंद्रीय बैंक आरबीआई के गवर्नर इस्तीफ़ा दे देता है, वजह सरकार चाहे जो भी बता रही हो पर ये इस्तीफा भयंकर तबाही का इशारा है। इस इशारे के पीछे कई सारे पुश फैक्टर हैं। नोटबन्दी और नए नोटों में किए गए घोटालों को पचा लेने वाले उर्जित पटेल ऐसे चले क्यों गए? क्या सबकुछ ठीक चल रहा है? उर्जित पटेल ने अर्थव्यवस्था की बर्बादी की हद तक मोदी का साथ दिया है। पर अब हालात इतने खराब हो गए हैं कि उर्जित पटेल भी खुद को बचाने लायक नहीं बचे हैं। आज केवल लंबे समय से मोदी सरकार और आरबीआई चीफ के बीच की तकरार का पटापेक्ष हुआ है।…

इंस्पेक्टर सुबोध कुमार के क़ातिलों को “भीड़” का नाम मत दीजिए, प्लीज़!

ख़ेराजे अक़ीदत शहीद सुबोध कुमार जी को इंस्पेक्टर सुबोध कुमार के क़ातिलों को "भीड़" का नाम मत दीजिए प्लीज़....वर्ना कई और सुबोध कुमार, कई और ज़ियाउल हक़ जैसे जम्हूरियत के रक्षक मौत के घाट उतारे जाते रहेंगे, और संविधान के क़ातिल भीड़ की "आड़" में छुपकर बचते रहेंगे। याद रखिए, दादरी में शहीद किए गए अख़लाक़ साहब के फ़्रिज में रखे गोश्त को जांच के लिए लैब तक पहुंचाने वाले उस केस के IO सुबोध कुमार ही थे. लैब की "पहली" रिपोर्ट में कहा गया था कि गोश्त गाय का "नहीं" था. उस वक़्त के युवा समाजवादी सीएम ने अपने जनेऊ की रक्षा के लिए केस…

गुरु नानक ने छोटी सी उम्र से ही जातिवाद के खिलाफ लड़ाई शुरु कर दी थी।

नई दिल्ली। गुरु नानक जी ने बहुत छोटी आयु में यह समझ लिया था कि जातिप्रथा एक शोषणकारी व्यवस्था है। उस समय में जातिभेद चरम पर थाl ऐसे समय में गुरुनानक देव ने ऊँच-नीच को बढ़ावा देने वाली जातिभेद की दीवार को सिरे से ख़ारिज किया थाl उन्होंने न केवल अस्पृश्यता का विरोध किया बल्कि पंडे-पुजारियों की भी आलोचना कीl उस समय ब्राह्मणवाद को लताड़ने का साहस कबीर, रविदास, गुरुनानक जैसे क्रांतिकारी ही कर पा रहे थेl गुरुनानक जी ने जातिवाद का घोर विरोध सिर्फ वैचारिक रूप से नहीं किया बल्कि अपने निजी जीवन में भी इस विरोध को जिया l इसी का नतीजा था…

“भारतीय संविधान 69वें साल में” कहां तक पहुंचा बाबासाहेब का कारवां?

"भारतीय संविधान 69वें साल में" अधिकारों के मायने उस तबक़े के लिए क्यों ना महत्वपूर्ण हों, जो जाति के कारण सदियों से हर तरह से वंचन का शिकार रहा है। आज जहाँ भी, जिस तरह भी, जिस रूप में भी, जिस हालात में भी हम पहुंच सकें हैं वो संविधान के रास्ते ही संभव हो सका है। संविधान से ही जानवर से भी बदत्तर समझे जाने वाले लोग आज इंसान माने जाते हैं। सच्चे लोकतंत्र, स्वतन्त्रता, समानता और सामजिक न्याय की स्थापना का रास्ता संविधान से ही खुलता है। इन 69 सालों में सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि बहुजन समाज में चेतना और वैचारिक प्रतिबद्धता बहुत तेज़ी…

महान वीरांगना झलकारी बाई के इतिहास को भी जाति के कारण छूत लग गई, पढ़िए दिपाली तायड़े का लेख

एससी-एसटी हो ?...तो जाति के कारण इतिहास को भी छूत लगती है।" इसलिए इतिहास लक्ष्मीबाई को महान वीरांगना मर्दानी कह-कह कर अघाता नहीं है और कोरी जाति की बहुजन वीरांगना झलकारी बाई के नाम पर मौन धारण कर लेता है,...क्योंकि नाम लेने से भी छूत लग जाती है। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की महान वीरांगना "झलकारी बाई" का जन्म 22 नवम्बर 1830 को हुआ था। तत्कालीन समय में झलकारी बाई को औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर तो नहीं मिला किन्तु वीरता और साहस का गुण उनमें बालपन से ही दिखाई देता था। किशोरावस्था में झलकारी की शादी झांसी के…

मोदी सरकार किसानों की समस्याओं को लेकर क्यों नहीं बुलाती विशेष सत्र, पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का लेख

By: Urmilesh Singh विमर्श। मेरा रिपोर्टर-मन नहीं माना! दो दिन से तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी, फिर भी पहुंच गया संसद मार्ग! किसानों से मिलने! पहले की कई किसान रैलियां हमने देखी हैं। कभी किसी दल के किसान-संगठन रैली निकालते थे या किसानों का कोई क्षेत्रीय संगठन हुक्का-पानी लेकर दिल्ली पर 'धावा' बोलता था! पर इस किसान मार्च में पूरे भारत के किसान थे! पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, हर जगह के किसान अपने रंग-बिरंगे झंडों के साथ वहां मौजूद थे! इनमें पुरुष, युवा, अधेड़, बुजुर्ग, हर उम्र की किसान-महिला और उनके कुछ परिजन भी साथ में थे!…

क्या है ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, क्यों हो रहा है इस पोस्टर का विरोध, पढिए!

पितृसत्ता वो सामाजिक व्यवस्था है जिसके तहत जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा क़ायम रहता है. फिर चाहे वो ख़ानदान का नाम उनके नाम पर चलना हो या सार्वजनिक जीवन में उनका वर्चस्व. वैसे तो पितृसत्ता तक़रीबन पूरी दुनिया पर हावी है लेकिन ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भारतीय समाज की देन है.. ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को समझने के लिए हमें भारत के इतिहास में झांकना होगा. वैदिक काल के बाद जब हिंदू धर्म में कट्टरता आई तो महिलाओं और शूद्रों (तथाकथित नीची जातियों) का दर्जा गिरा दिया गया.महिलाओं और शूद्रों से लगभग एक जैसा बर्ताव…