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घोर ओबीसी विरोधी थे अटल बिहारी वाजपेयी

By- Santosh Yadav भारत एक मिथक प्रधान देश है। यही वजह है कि यहां 33 करोड़ देवी-देवता हैं। आये दिन इस संख्या में वृद्धि ही हो रही है। अटल बिहारी वाजपेयी को भी एक मिथक बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। बताया जा रहा है कि किस तरह उन्होंने देश को महान बनाया। उन्हें महिमामंडित करने वालों में संघी और सवर्ण तो शामिल हैं ही, दलित और पिछड़े वर्ग के सत्तालोलूप नेतागण भी हैं। जबकि वे भी इस बात को मानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ओबीसी और अन्य वंचित तबकों के घुर विरोधी रहे। संघी उन्हें जिन कार्यों के लिए महान बता रहे हैं उनमें एक अहम कार्य…

Bamcef International Network President Jayant Rangari pays tributes to the sterling persona of Raju Kamble

Dear Mulnivasi Elders, Brothers, Sisters & Young Ones Jai Bhim !!! Jai Mulnivasi !!! Namo Buddhay !!! Jai Bharat !!! It’s a time of deep sorrow and grief that we all are in, due to the untimely demise of BAMCEF KAMBLE Saheb (Mn. Raju Kamble Sir) Please accept my & from everyone at BAMCEF INTERNATIONAL NETWORK sincere heartfelt condolences to Mn. Raju Kamble Sir’s Family Members and All Phuley - Ambedkarite Samaj in India and across the World. Mn. Raju Kamble Sir was a, Simple, Honest, Benevolent, Committed, Strong,…

Raju Kamble: An ideal follower of Babasaheb Ambedkar

By-Mangesh Dahiwale New dehli: As the news is pouring in, Raju Kamble breathed his last at 2.10 am in Vancouver, Canada. His death is a great loss to the Ambedkarite movement. When the international reach of Ambedkarites was limited only to a few immigrants from Punjab to the western hemisphere, it was Raju Bhau, as we fondly called him, who spanned the North America, Europe, Middle East, and South East Asia to build what is now known as Ambedkar International Mission (AIM). His grasp of the philosophy of Babasaheb Ambedkar…

अम्बेडकर अंतर्राष्ट्रीय मिशन (AIM) के संस्थापक राजू कांबले सर का वैंकुवर कनाडा में निधन

नई दिल्ली। हम-आप जैसी बेहद सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले राजू काम्बले जी ने "शिक्षित हो, संघर्ष करो, संगठित हो" के नारे को आत्मसात कर बहुत संघर्ष कर प्रोफेशनल और सोशल लाइफ में बुलंदियों को छुआ। वे आजीवन बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने के साथ-साथ अलग-अलग देशों में फैले दलितों को यूनिट के लिए उन्होंने आजीवन प्रयास किया। बहुत ऊंचाईयों पर पहुँचने पर भी वे कभी अपने समाज से नहीं कटे बल्कि समाज के लिए समर्पित रहे और ग्राउंड पर जाकर दलित एक्टिविज़्म के लिए कार्य किया। उन्होंने भारत के हर एक…

टिस्स मुंबई : आयोग ने कहा, ST वर्ग के प्रति उदार बने टाटा, छोड़े कंजूसी

By: Santosh Yadav राष्ट्रीय अनुसूचित जऩजाति आयोग ने मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस को साफ-साफ शब्दों में निर्देश दिया है की वह आदिवासी छात्रों के प्रति उदारता बरते और उनसे छात्रावास शुल्क के अलावा आहार शुल्क ना वसूले। इसके लिए आयोग ने संस्थान को अपने अन्य संसाधनों से राशि का प्रबंध करने को कहा है। बताते चलें की संस्थान की ओर से इसी वर्ष अनुसूचित जनजाति के छात्रों को भी हॉस्टल की फीस तथा डाइनिंग फीस देने को कहा गया था। पूर्व में अनुसूचित जनजाति के छात्रों को इस से मुक्त रखा गया था। संस्थान के नए फरमान से छात्र…

उपेक्षित क्रांति के उपेक्षित नायक: तिलका माँझी

By-Kirti Kumar भारत के इतिहास में कई क्रांति हुई है, लेकिन जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त ब्राह्मणवादी इतिहासकारो द्वारा षड्यंत्रपूर्वक इतिहास को दबाया है, या तो तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है. इतिहासकार मुस्लिम और अंग्रेज के खिलाफ हुए युद्धों को ही स्वाधीनता की लड़ाई कहलाते है. जबकि, विदेशी आर्यों के आक्रमण के बाद जातिवाद के तहत अपने मुलभुत मानवीय हक़-अधिकार खो बैठे भारत के मूलनिवासी विदेशी आर्य ब्राह्मणों की जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ 3500 साल से लड़ रहे है. भारत में बौद्ध और जैन विचारधारा का उद्भव भी जातिवाद के खिलाफ क्रांति ही…

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में डॉ. आंबेडकर की क्या राय…

आजादी से 1 वर्ष पहले 1946 में डॉ. आंबेडकर ने लिखा कि “ हिंदुओं और मुसलामनों की लालसा स्वाधीनता की आकांक्षा नहीं हैं. यह सत्ता संघर्ष है,जिसे स्वतंत्रता बताया जा रहा है.. कांग्रेस मध्यवर्गीय हिंदुओं की संस्था है, जिसकों हिदू पूंजीपतियों की समर्थन प्राप्त है, जिसका लक्ष्य भारतीयों की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि ब्रिटेन के नियंत्रण से मुक्त होना और सत्ता प्राप्त कर लेना है, जो इस समय अंग्रेजों की मुट्ठी में हैं.” ( डॉ, आंबेडकर, संपूर्ण वाग्यमय, खंड-17, पृ.3 ). मुसलमान... मध्यवर्गीय हिंदुओं के वर्चस्व से मुक्ति के लिए अलग…

क्या वाकई में भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है..?

किसी भी बात को अपने तर्क-विवेक और संशय आधारित वैचारिकता से बिना परखे अनुकरण करना हानिकारक हो सकता है। भारत में आजकल राष्ट्रवाद का झंडा लिए घूम रहे तथाकथित राष्ट्रवादी तरह तरह के नारों से राष्ट्रवाद का प्रचार कर रहे है। हर भारतीय को वे शक की नज़रों से देख रहे है। उनके राष्ट्रवाद की परिभाषा के मुताबिक़ अगर आप राष्ट्र के सवंविधानिक मूल्यों का आदर करते है लेकिन तथाकथित 'भारत माता' के नारे नहीं लगाते, या पड़ोसी मुल्क को गालियाँ नहीं देते है, तो आप उनकी नज़रों में राष्ट्रवादी नहीं बल्कि देशद्रोही माने जाएँगे! देश के हर…

जन्मदिन विशेष: अगर फूलनदेवी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाता तो आज बलात्कारियों के इतने हौसले बुलंद न होते!

विश्व इतिहास की श्रेष्ठ विद्रोही महिलाओं की सूची में “टाइम मैगजीन” ने फूलन देवी को चौथा स्थान दिया था। लंदन का ‘गार्डियन’ न्यूज़पेपर भारत के प्रधानमंत्री के मरने तक पर स्मृति लेख नहीं छापता, वह फूलन देवी पर बड़ा सा स्मृति लेख छाप चुका है। आज अमेरिका से लेकर ब्रिटेन में फूलन देवी का सम्मान किया जा रहा है। 'टाइम मैगजीन' से लेकर 'गार्डियन' न्यूज़पेपर तक में उनके नाम का डंका बज चुका है। भारत से ऐसा सम्मान पाने वाली फूलन अकेली महिला है। फूलन देवी ने पुरुष और जाति सत्ता से प्रतिशोध का जो तरीका चुना वो हिंसक होते हुए भी ग़लत नहीं लगता…

उपेक्षित नायक: करशनदास मुलजी…

By: Kirti Kumar विमर्श। जब वैष्णव समाज की बात आती है तो हमारी ज़ुबान पर एक ही नाम आ जाता है, मोहनदास करमचंद गांधी! और गांधी जी का नाम आते ही हमारे मन के रेडियो में गांधी जी की वो प्रिय धुन बजने लगती है, 'वैष्णव जन तो तेने रे कहिए..' लेकिन हक़ीक़त यह है कि वैष्णव जन की वेदना को करशनदास मुलजी नामक एक वैष्णव जन ने गांधीजी के जन्म से काफ़ी पहले समझा और उसे दूर भी किया। करशनदास मुलजी...यह वो नाम है, जिसने भारत के समाजिक परिवर्तन और समाज सुधार के दौर में काफ़ी सुर्ख़ियाँ बटोरी। लेकिन फिर गुमनामी के अंधेरो में खो गया या फिर उनकी…