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मैं आपसे पूछता हूं धर्म परिवर्तन करके अपना नाम स्थाई रूप से क्यों नहीं बदल लेते-डॉ बीआर अंबेडकर

धर्म परिवर्तन कोई बच्चों का खेल नहीं है। यह ‘मनुष्य के जीवन को सफल कैसे बनाया जाए’ इस सरोकार से जुड़ा प्रश्न है...इसको समझे बिना आप धर्म परिवर्तन के संबंध में मेरी घोषणा के वास्तविक निहितार्थ का अहसास कर पाने में समर्थ नहीं होंगे। छुआछूत की स्पष्ट समझ और वास्तविक जीवन में इसके अमल का अहसास कराने के लिए मैं आप लोगों के खिलाफ किये जाने वाले अन्याय और अत्याचारों की दास्तान का स्मरण कराना चाहता हूं। सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने का हक जताने पर या सार्वजनिक कुंओं से पानी भरने का अधिकार जताने पर या घोड़ी पर दूल्हे को…

#MeToo में बहुजन औरतें क्यों नहीं ????

22 सितंबर 1992 को राजस्थान के जयपुर से लगभग 50 किलोमीटर दूर भटेरी गांव में सवर्णों ने एक बहुजन महिला भँवरी देवी प्रजापति के साथ सामूहिक बलात्कार किया सिर्फ इसलिए क्योंकि 'साथिन' पद पर पदस्थ सरकारी कर्मचारी की ड्यूटी निभाते हुए भँवरी ने एक नौ महीने की बच्ची की शादी रोकी थी। सवर्ण वर्ग उनसे बेहद नाराज़ था कि एक कुम्हारिन की हिम्मत कैसी हुई हमारी परंपरा और संस्कृति में टांग अड़ाने की।इसका बदला भँवरी देवी के पति को मारपीट करके बांधकर उसके ही सामने ही खेत में 5 सवर्णों ने बारी-बारी से बलात्कार करके लिया। भँवरी ने जब अपनी आप बीती…

आख़िर क्या है पसमांदा मूवमेंट…जानिए!

By: Deepaly Tayday #पसमांदा, जो कि एक फारसी शब्द है, का अर्थ होता है ‘वह जो पीछे छूट गया’। बिहार में 1998 में अली अनवर के नेतृत्व में ‘ऑल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज़’ के गठन और उनकी लिखी किताब ‘मसावात की जंग (2001)’ के चलते यह शब्द काफी लोकप्रिय हुआ। इसके पहले डॉ. एजाज़ अली के नेतृत्व में ‘ऑल इंडिया बैकवर्ड मुस्लिम मोर्चा’ दलित मुसलमान शब्द चर्चा में ला चुका था. अली अनवर की किताब ने बिहार के पसमांदा मुसलमानों की दयनीय स्थिति के बारे में ज़ोरदार बहस को पैदा किया और पसमांदा राजनीति की ज़मीन तैयार की। बेशक मुस्लिम समाज में…

#MeToo अभियान की सवर्ण महिलाओं को डॉ रामकृष्ण के इन प्रासंगिक सवालों का जवाब देना होगा!

भारतीय समाज में महिलाओं को कमजोर समझे जाने की मानसिकता के चलते आज भी पुरुषवादी सोच उन पर हावी है और उसी सोच के चलते महिलाओं के साथ शोषण बदस्तूर जारी है। लेकिन महिलाओं के उत्पीड़न का यह दौर कोई नया नहीं है, इसका बहुत लंबा इतिहास रहा है। यह उस मनुवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था का नतीजा है जिसका महिलाओं ने भी कभी खुलकर विरोध नहीं किया है। आज जब मीटू कैंपेन के जरिए महिलाएं खुद को सशक्त और मजबूत महसूस कर रहीं है तो हमें कवयित्रि महादेवी वर्मा द्वारा लिखी एक कविता याद आती है...जिसमें वो लिखती हैं.... मै हैरान हूं यह सोचकर…

विजय दशमी का असली नाम “अशोक विजयदशमी” है। जानिए सम्राट अशोक का छुपाया गया इतिहास!

भारतीय लोगों के मस्तिष्क से सम्राट अशोक को बड़ी ही चतुराई और चालाकी से ब्राह्मणों ने भुला दिया है। बौद्ध धर्म अर्थात ‘समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय’ की शासन पद्धती अर्थात मानवकल्याण की समाज में व्यवस्था नष्ट करने के लए ब्राह्मणों को अशोक की यादें नष्ट करना बेहद जरुरी था। इस उद्देश्य पूर्ति के लिए उन्होंने अशोक से संबंधित दिनों को काल्पनिक राम के उत्सवों में तब्दील कर दिया। अशोक ने जिस दिन धम्मदीक्षा ली उस विजयादशमी को राम के दशहरा में बदल दिया और सम्राट अशोक के जन्म दिन को ब्राह्मणों ने  रामजन्म दिन के रुप में परिवर्तित…

भारत में #Me Too अभिजात्य वर्ग का गेम है…

By-Dr Jayant Chandrapal आम समाज केवल प्रेक्षक है, आपको बता दें कि भारत के बाहरी मामलों (External Affairs) के मंत्री एम. जे. अकबर उर्फ़ मोबासर जावेद अकबर भी अब इस अंतर्राष्ट्रीय अभिजात्य गेम #MeToo में शामिल कर लिए गए है। और इस तरह से वे अपने ही आंतरिक मामलों (Internal Affairs) को सम्हालने में उलझ गए है। इसके पहले बॉलीवुड के नाना भी किसी को पटाकर एक लफड़े में इस गेम में अपना नामांकन करवा चुके है और अपने ही कद को नाना (गुजराती अर्थ “छोटा”) कर चुके है। और भी सेलिब्रिटीज है जैसे की आलोक नाथ, सुभाष घई, अभिजीत भट्टाचार्य, साजिद खान,…

#MeToo मूवमेंट मे क्या हम (# WeToo )शामिल है? बहुजन महिलाओं का ब्राह्मण सवर्ण महिलाओं से यह सवाल!

विमर्श। किसी भी सामाजिक और समानता की लड़ाई के केंद्र में अगर बहुजन स्त्री नहीं तो वो लड़ाई जातीय और एलीट है। भारत के सन्दर्भ में देखे तो बहुजन स्त्रियाँ सवर्ण पुरुष, सवर्ण महिला और अपने वर्ग के पुरुष तीनों के द्वारा शोषण झेलती है, तो बहुजन स्त्री को ये पूरा #me_too इसी परिपेक्ष्य में देखना होगा। क्योंकि ये पूरा #me_too आन्दोलन स्त्रियों और उनके कार्य स्थल, घर के अंदर, सार्वजानिक स्थान पर होने वाले यौन शोषण के अनुभव पर है इसलिए सबसे पहले हमें ये समझना होगा शोषक वर्ग खासकर उस वर्ग की स्त्रियों (भारत में सवर्ण) का चरित्र, उनका…

उच्च शिक्षा: सवर्णों के पक्ष में केंद्र सरकार नहीं लायेगी अध्यादेश

-संतोष यादव केंद्र सरकार विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर सवर्णों के पक्ष में अब खुल्लम खुल्ला उतर गई है। यही वजह है की वाह अध्यादेश लाने से इंकार कर रही है जिसके लागू होने से इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा विश्वविद्यालयों में विश्वविद्यालय के बजाय विभाग को इकाई मानकर आरक्षण का रोस्टर बनाने संबंधी आदेश पर पूर्ण विराम लग जाता। अध्यादेश का लाभ बहुजन समाज  के अभ्यर्थियों को मिलता जैसा कि 5 मार्च 2018 के पहले था। लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के आधार पर यूजीसी द्वारा अधिसूचना जारी किए जाने के बाद इस पर ग्रहण लग…

‘मनुवाद की छाती पर बिरसा-फूले-अंबेडकर’ महाराष्ट्र की दो वीरांगनाओं ने इस नारे को जीवंत कर दिया!

मनुवाद की छाती पर बिरसा-फुले-अम्बेडकर..... इस नारे को 8 अक्टूबर को जीवंत कर दिया महाराष्ट्र की अंबेडकरवादी वीरांगनाओं कांता रमेश अहीर और शीला बाई पवार ने। उन्होंने बिना किसी डर के राजस्थान हाईकोर्ट, जयपुर के परिसर में लगी "मानवता पर कलंक मनु" की मूर्ति की मुँह पर सरेआम कालिख़ पोती और वहीं बेख़ौफ खड़े होकर गिरफ्तारी भी दी। मानवता पर कलंक मनु ने भारतीय समाज को पूरी तरह विकृत कर देने वाली संहिता बनाई। उसने गैर-बराबरी, भेदभाव और असमानतामूलक व्यवहार को लिपिबद्ध करते हुए दुनिया की सबसे निकृष्ट किताब मनु स्मृति लिखी जिस कारण महिलाओं…

स्कूल की दीवारों पर लिखी अश्लील बातों का विरोध करने पर छात्राओं पर गुंडो का हमला!

बारह-चौदह साल की लड़कियां फब्तियां कसने, स्कूल हॉस्टल की दीवारों पर गालियां और दूसरी वीभत्स अश्लील बातें लिखने का विरोध करती हैं और इसके बदले वह सब करने वाले लड़के और उनके मां-बाप इकट्ठा होकर स्कूल में घुस कर लड़कियों को बर्बरता से मारते-पीटते हैं! पैंतीस लड़कियों को अस्पताल पहुंचने की हालत में ला देने तक..! यह किसी सामंती अपराधी मानस वाले के लिए कोई साधारण घटना हो सकती है! लेकिन क्या इस घटना की त्रासदी यहीं तक सीमित है! भदेसपन के नाम पर गालियों यानी मौखिक बलात्कार का समर्थन या बचाव कौन करता है? लड़कियों पर फब्तियां कसने को…