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क्रांति का प्रतीक चे ग्वेरा: खूबसूरत दुनिया के लिए जिंदगी और मौत से मोहब्बत करने वाला क्रांतिकारी

(जन्म 14 जून 1928- शहादत 9 अक्टूबर 1967) क्रांतिकारियों की गैलेक्सी के एक चमकते सितारे का नाम अर्नेस्टो चे ग्वेरा है। एक ऐसा नाम जिसे सुनते ही नसें तन जाती हैं। दिलो-दिमाग उत्तेजना से भर जाता है। हर तरह के अन्याय के खिलाफ लड़ने और न्यायपूर्ण दुनिया बनाने के ख्वाब तैरने लगते हैं। उम्र छोटी हो, लेकिन खूबसूरत हो, यह कल्पना हिलोरे मारने लगती है। कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन यह सच है सिर्फ और सिर्फ 39 साल में शहीद हो जाने वाला एक नौजवान इतना कुछ कर गया जिसे करने के लिए सैकड़ों वर्षों की उम्र नाकाफी लगती है। वह फिदेल कास्त्रो के…

स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में क्या सोचते थे? फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर

स्त्री-पुरुष के बीच कैसे रिश्ते हों? इस संदर्भ में भारत में दो अवधारणाएं रही हैं- ब्राह्मणवादी-मनुवादी अवधारणा और दलित-बहुजन अवधारणा। ब्राह्मणवादी-मनुवादी अवधारणा यह मानती है कि स्त्री पूर्णतया पुूरुष के अधीन है। यह ब्राह्मणवादी-मनुवादी विचारधारा तमाम शास्त्रों, पुराणों, रामायण, महाभारत, गीता और वेदों व उनसे जुड़ी कथाओं, उप-कथाओं, अंतर्कथाओं और मिथकों तक फैली हुई है। इन सभी का एक स्वर में कहना है कि स्त्री को स्वतंत्र नहीं होना चाहिए। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य-स्मृति जैसे धर्म-ग्रंथों ने बार-बार यही दोहराया है कि ‘स्त्री…

ब्राह्मणवादी-मनुवादी संस्कृति के बुनियादी लक्षण क्या हैं?

भारत में उत्तर से लेकर (एक हद  तक) दक्षिण तक और पूरब ले लेकर पश्चिम तक आर.एस.एस. (संघ), भाजपा एवं अन्य आनुषांगिक संगठनों और कार्पोरेट घरानों की विजय और उनका वर्चस्व केवल एक राजनीतिक और आर्थिक परिघटना नहीं है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा गहरे व्यापक स्तर पर यह एक सांस्कृतिक परिघटना भी है, जिसने उस मनःस्थिति और चेतना का निर्माण किया, जिसके चलते   सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर देश के  हिंदूकरण (ब्राह्मणीकरण)  और विकास के नाम पर कार्पोरेटाइजेशन (पूंजी की लूट को खुली छूट) का मार्ग प्रशस्त हुआ। आखिर ब्राह्मणवादी-मनुवादी संस्कृति या…

जय श्रीराम के नारे का मुकाबला फुले, पेरियार और आंबेडकर की विचारधारा से ही किया जा सकता है।

भाजपा के राजनीतिक विस्तार में जय श्रीराम के नारे की सबसे निर्णायक भूमिका रही है। लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक के लिए शुरू की गई रथयात्रा का मुख्य नारा जय श्रीराम था। बाबरी मस्जिद का विध्वंस भी जय श्रीराम के नारे के साथ किया गया था। मंडल की राजनीति को पराजित करने के लिए यह नारा व्यापक पैमाने पर उछाला गया। गुजरात नरसंहार का भी मूल नारा जय श्रीराम था। जय श्रीराम के नारे, विचार और एजेंडे की भाजपा को 2 सांसदों की पार्टी से 300 से अधिक सांसदों की पार्टी बनाने में अहम भूमिका रही है। जिसने वर्ण-जाति आधारित हिंदू राष्ट्र…

डॉ मनीषा बांगर को डॉ पायल तडवी की दुखद घटना सुनकर अपने मेडिकल पढ़ाई के वक्त का ये वाकया याद आया।

डॉ. पायल तडवी अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी जान किसने ली, अब यह हम सभी जानते हैं। यह भी कि किस तरह द्विज जातियों की तीन महिलाएं जो कि स्वयं भी मेडिकल की छात्राएं हैं, के द्वारा जातिगत और विद्वेषपूर्ण आचरण के कारण डॉ पायल तडवी ने खुदकुशी कर ली। हालांकि पुलिस ने इन तीनों महिलाओं के खिलाफ एक्शन लिया है, लेकिन भारतीय न्यायिक व्यवस्था में कानूनी प्रावधानों को देखते हुए इन तीनों को सजा मिलेगी, यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता है। मैं स्वयं चिकित्सक हूं और मैंने स्वयं उस पीड़ा को महसूस किया है जो डॉ. पायल तडवी को सहनी पड़ी होगी। बात…

पायल तड़वी और उसके खूबसूरत सपनों की दास्तान

महाराष्ट्र समता और न्याय का सपना देखने वाले फुले, शाहू जी और डॉ. आंबेडकर की जन्मभूमि-कर्मभूमि है, लेकिन यह वर्ण-जाति व्यवस्था और इससे पैदा होने वाले अन्यायों के समर्थक रामदास, तिलक, सावरकर और गोडसे जैसे चितपावन ब्राह्मणों की जन्मभूमि- कर्मभूमि भी है। यह क्रूर पेशवा ब्राह्मणों की भूमि भी है, जिन्होंने अतिशूद्रों को गले में हड़िया और कमर में झाडू बाधकर चलने के लिए बाध्य कर दिया। जो महारों, मांगों और चमारों का सिर काटकर गेंद बनाकर खेलते थे। इन्हीं चितपावन ब्राह्मणों की परंपरा ने एक आदिवासी लड़की और उसके खूबसूरत सपनों की हत्या कर…

क्यों जहरीले तीर की तरह सर्वणों के दिलों में चुभते हैं, डॉ. आंबेडकर!

By- सिद्धार्थ सहारनपुर से सटे गांव बादशाहपुर पिंजोरा में आंबेडकर की मूर्ति तोड़ दी गई है। बहुजनों में गहरा आक्रोश है। गांव में पीएसी तैनात कर दी गई। इस देश में सबसे ज्यादा यदि किसी व्यक्ति से सवर्ण नफरत करते हैं तो वह आंबेडकर हैं और सबसे ज्यादा किसी की मूर्ति तोड़ी जाती हैं, तो वह भी आंबेडकर की। आखिर सवर्णों को डॉ. आंबेडकर जहरीले तीर की तरह चुभते क्यों हैं? इसके निम्न कारण हैं- ● पहला सवर्णों का यह मानना है कि डॉ. आंबेडकर की आरक्षण की व्यवस्था के चलते उनके बेटों -बेटियों के करीब 50 प्रतिशत नौकरियों का हिस्सा एससी-एसटी…

बाबा साहेब को पढ़कर मिली प्रेरणा, और बन गईं पूजा आह्लयाण मिसेज हरियाणा

हांसी, हिसार: कोई पहाड़ कोई पर्वत अब आड़े आ सकता नहीं, घरेलू हिंसा हो या शोषण, अब रास्ता रोक सकता नहीं...यह कहना है बहुजन समाज से आने वाली पूजा आह्लयाण का जिन्होंने पुरुषवादी सोच से लड़ते हुए एक महीने के अंदर सौंदर्य के क्षेत्र में दूसरी बड़ी सफलता अर्जित की है। हरियाणा के हांसी शहर के उत्तम नगर की रहने वाली पूजा आह्लयाण ने मिसेज हरियाणा प्लेटिनम का ताज अपने नाम किया है। गुरुग्राम में आयोजित हुई इस प्रतियोगिता में 250 सुंदरियों को ज्ञान व सुंदरता में पछाड़ते हुए पूजा ने मिसेज हरियाणा का क्राउन जीता। पूजा ने बताया कि इस…

जस्टिस फॉर डॉ पायल: रोहित वेमुला के बाद एक और संस्थानिक हत्या!

By: Susheel Kumar पायल!! आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था, हां मैं समझ सकता हूं कि जब किसी इंसान के सामने हालात बद से बद्तर कर दिए जाएं तो फिर जीना मुश्किल हो जाता है पर आप तो ऐसे समाज से आती हैं जिसका इतिहास ही बेहद कठिन और संघर्ष भरा रहा है, तो फिर इस जातिवादी समाज में आपको भी लड़ना चाहिए था, इतनी जल्दी हार नहीं माननी चाहिए थी, आपकी लड़ाई ज्यादा बड़ी थी क्योंकि आप एक तरफ जातिवादी मानसिकता से लड़ रहीं थी तो वहीं दूसरी ओर पुरषवादी सोच को चुनौती दे रहीं थी!! जातिवाद की गंदगी भरे दिमाग में सड़ी हुई सोच की वजह से किसी को जब मौत गले…

भारत मे गरीबों के हित में सामाजिक और राजनीतिक बदलाव क्यों नहीं होते??

- संजय श्रमण ~ क्या ये सवाल आपको पीड़ित करता है? अगर करता है तो आपको समाज और राजनीति में इसके कारण नहीं खोजने चाहिए। जिस मुद्दे को आप समझना चाहते हैं उसे उसी के विश्लेषण से नहीं समझा जा सकता बल्कि उस मुद्दे को जन्म देने वाली परिस्थितियों और कारकों के विश्लेषण से समझा जा सकता है। अगर आप गरीबी को समझना चाहते हैं तो आपकी उन कारकों को समझना होगा जो गरीबी को पैदा करके बनाये रखते हैं। इसी तरह अगर आप भारत मे असमानता, जातीय हिंसा, शोषण और जहालत को समझना चाहते हैं तो इसे इस देश की संस्कृति और धर्म के विश्लेषण से समझिए। इस संस्कृति और…