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Bihar & Jharkhand

स्कूल की दीवारों पर लिखी अश्लील बातों का विरोध करने पर छात्राओं पर गुंडो का हमला!

बारह-चौदह साल की लड़कियां फब्तियां कसने, स्कूल हॉस्टल की दीवारों पर गालियां और दूसरी वीभत्स अश्लील बातें लिखने का विरोध करती हैं और इसके बदले वह सब करने वाले लड़के और उनके मां-बाप इकट्ठा होकर स्कूल में घुस कर लड़कियों को बर्बरता से मारते-पीटते हैं! पैंतीस लड़कियों को अस्पताल पहुंचने की हालत में ला देने तक..! यह किसी सामंती अपराधी मानस वाले के लिए कोई साधारण घटना हो सकती है! लेकिन क्या इस घटना की त्रासदी यहीं तक सीमित है! भदेसपन के नाम पर गालियों यानी मौखिक बलात्कार का समर्थन या बचाव कौन करता है? लड़कियों पर फब्तियां कसने को…

‘Voice of Peoples’ पुरस्कार से डॉ मनीषा बांगर को किया गया सम्मानित

14 सिंतबर को दिल्ली में एवान-ए-गालिब ऑडिटोरियम में आयोजित एक कार्यक्रम बहुजन नेत्री डॉ मनीषा बांगर को सम्मानित किया गया। यह कार्यक्रम पल-पल न्यूज वेब पोर्टल की तरफ से आयोजित किया गया था, कार्यक्रम में तमाम बुद्धिजीवी, पत्रकार, लेखक और समाजिक कार्यकर्ताओं ने शिरकत की थी। कार्यक्रम में बामसेफ की पूर्व उपाध्यक्ष, समाजिक कार्यकर्ता और बहुजन नेत्री, पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर मनीषा बांगर को ‘Voice of Peoples’ नाम के आवर्ड से सम्मानित किया गया। यह आवर्ड मनीषा बांगर को समाज में उनके काम की सराहना के लिए दिया गया। जिस बेबाक अंदाज में…

बहुजन हो! ज़िंदा रहते सम्मानजनक ज़िंदगी नहीं और मरने के बाद दो गज जमीन के भी लाले हैं…

बिहार के मधेपुरा जिले के केवटगामा गाँव में एक बहुजन भूमिहीन मजदूर हरिनारायण की पत्नी सहोगिया देवी की डायरिया से मौत हो गई। पहले जीते जी अच्छा इलाज न मिल सका और बाद में दो गज जमीन भी नसीब नहीं हुई। हरिनारायण जब पत्नी की अंतिम क्रिया करने की तैयारी में लगा तो गाँव के तथाकथित ऊँची जाति के भूमिहार और राजपूत लोगों ने हरिनारायण को उसकी पत्नी का अंतिम संस्कार ऊंची जात वाले श्मशान घाट में करने देने से मना कर दिया। यही नहीं उस पर दबाव बनाया गया कि गांव की बाहरी ज़मीन पर भी वह अपनी पत्नी की अंतिम क्रिया नहीं कर सकता। हारकर उसे अपनी…

ओबीसी आयोग : संवैधानिक अधिकार के नाम पर मिला झुनझुना

By- संतोष यादव संसद में यह कानून पारित हो चुका है कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को अनुसूचित जाति अायोग और अनुसूचित जनजाति आयोग के जैसे ही संवैधानिक अधिकार मिले। यानि यह एक मुकम्मल आयोग बने जिसके पास दांत और नाखून दोनों हों। केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने भी यही कहा जब वे इस कानून को संसद में पेश कर रहे थे। लेकिन अब कानून का जो स्वरूप सामने आया है वह महज ओबीसी को ठगने के लिए झुनझुना से अधिक कुछ भी नहीं है।   इस बारे में सामाजिक न्याय को लेकर पिछले 7 दशकों से सक्रिय भारत सरकार के पूर्व नौकरशाह पीएस कृष्णन ने सवाल उठाया है।…

भीमा कोरेगांव हिंसा में गिरफ्तारी, और घटना के पीछे की साजिश

भीमाकोरेगांव में हुई हिंसा के आरोप में आज यलगार परिषद और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और उनके परिवारजनों के घर पर छापेमारी हुई जबकि इन दंगों के मुख्य आरोपी संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे सहित हिंदू गुंडा गैंग के लोग खुलेआम घूम रहे हैं। बल्कि चुनाव से पहले किसी दूसरे दंगे की फ़िराक में औरंगाबाद के आसपास गतिविधियां तेज़ की है। मोदी ख़ुद भिड़े को अपना गुरूजी मानता है, तो फड़नवीस सरकार तो भिड़े-एकबोटे के चरण में पड़ी हुई है। जबकि भिमाकोरेगांव में हुई हिंसा भिड़े-एकबोटे द्वारा प्रायोजित थी, इस मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था…

बीपी मंडल की शतवार्षिकी

By- प्रेमकुमार मणि 25 अगस्त उस विन्ध्येश्वरी प्रसाद मंडल का जन्मदिन है , जिनकी अध्यक्षता वाले आयोग के प्रस्तावित फलसफे को लेकर 1990 के आखिर में भारतीय राजनीति में एक भूचाल आया और उसने राजनीति की दशा -दिशा बदल दी . इस वर्ष का जन्मदिन कुछ खास है . आज उनके जन्म की सौवीं सालगिरह है . इसलिए आज उन्हें याद किया ही जाना चाहिए . लेकिन मैं अपने ही अंदाज़ में उन्हें याद करूँगा . मेरी कोशिश हालिया इतिहास के उस पूरे दौर पर एक विहंगम ही सही, नज़र डालने की होगी जिसने बीपी मंडल और उनकी राजनीति को आगे लाया . हाई स्कूल का छात्र था ,जब वीपी मंडल…

ओबीसी के अंदर क्यों नहीं है छटपटाहट?

By- संतोष यादव इतिहास साक्षी है इस बात का कि अपने हक-अधिकारों के लिए जितना भारत के अनुसूचित जाति के लोग जागरूक रहे हैं, उतना पिछड़ा वर्ग के लोग नहीं रहे। यह जागरूकता तब भी नहीं थी जब देश में अंग्रेज शासक थे। जोतिबा फुले जैसे महान समाज सुधारक से मिली विरासत को भी पिछड़ा वर्ग संभाल नहीं पाया। वहीं बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने द्विजों की सत्ता को नकारते हुए समाज के अंतिम पायदान पर रह रहे लोगों के लिए संघर्ष किया। जबकि उन दिनों ही देश की राजनीति में ओबीसी समाज के कई कद्दावर नेता कांग्रेस की द्विजपरक राजनीति के हाथों की…

बीपी मंडल, फूले शाहू अंबेडकर पेरियार विरासत के बहुजन नायक

By-Manisha Bangar भारत का इतिहास वैसे तो बहुत पुराना है खासकर द्विजों के नजरिए से लेकिन वंचितों के लिए लिहाज से बहुत नया है। खास बात यह कि बदलाव तभी हुए हैं जब शूद्र वर्ग एक साथ हुआ। पहले जोतिबा फुले ने शूद्रों के हक-अधिकार की बात कही। शूद्रों को पढ़ने का अधिकार दिलाया। फिर शाहू जी महाराज ने कोल्हापुर रियासत में शूद्रों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। उनका जोर भी शिक्षा पर था। बाद में बाबा साहब आंबेडकर ने इसी मार्ग पर चलते हुए संविधान में आरक्षण का अधिकार सुनिश्चित किया। हालांकि वह ओबीसी के लिए अलग से कोटा का प्रावधान नहीं कर…

सभी मेनस्ट्रीम मीडिया के संपादकों को मनीषा बांगर का खुला पत्र, बहुजनो के मुद्दों पर चुप्पी साध कर लोकतंत्र को बचाया नहीं जा सकता।

मुमकिन है कि मेरे इसे खुले पत्र के पहले भी आप उस घटना से वाकिफ होंगे जो हाल ही में बिहार के सुदूर मोतिहारी जिले के महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी में घटित हुई। एक बार फिर मैं आपका ध्यान उसी घटना की तरफ आकर्षित करना चाहती हूं। सत्ता के मद में अंधे हो चुके लोगों ने एक भीड़ की शक्ल में संस्थान के असिस्टेंट प्रोफेसर संजय यादव के उपर हमला बोला। वह अपने कमरे में थे और मॉब खींचते हुए सड़क पर ले गयी। वे उनके उपर लात-घूंसे बरसा रहे थे। उनके शरीर के कपड़े फाड़ डाले और यहां तक कि उनके गुप्तांग पर भी प्रहार किया। वे लोग उनकी जान लेने…

जिन लोगों को लगता है कि एक थप्पड़ मारने पर SC/ST Act लग जाता है!

By- Umashankar  Yadav अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जबरन अखाद्य या घृणाजनक (मल मूत्र इत्यादि) पदार्थ खिलाना या पिलाना। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को शारीरिक चोट पहुंचाना या उनके घर के आस-पास या परिवार में उन्हें अपमानित करने या क्षुब्ध करने की नीयत से कूड़ा-करकट, मल या मृत पशु का शव फेंक देना। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के शरीर से बलपूर्वक कपड़ा उतारना या उसे नंगा करके या उसके चेहरें पर पेंट पोत कर सार्वजनिक रूप में घुमाना या इसी प्रकार का कोई ऐसा कार्य…