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Delhi-NCR

“भारतीय संविधान 69वें साल में” कहां तक पहुंचा बाबासाहेब का कारवां?

"भारतीय संविधान 69वें साल में" अधिकारों के मायने उस तबक़े के लिए क्यों ना महत्वपूर्ण हों, जो जाति के कारण सदियों से हर तरह से वंचन का शिकार रहा है। आज जहाँ भी, जिस तरह भी, जिस रूप में भी, जिस हालात में भी हम पहुंच सकें हैं वो संविधान के रास्ते ही संभव हो सका है। संविधान से ही जानवर से भी बदत्तर समझे जाने वाले लोग आज इंसान माने जाते हैं। सच्चे लोकतंत्र, स्वतन्त्रता, समानता और सामजिक न्याय की स्थापना का रास्ता संविधान से ही खुलता है। इन 69 सालों में सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि बहुजन समाज में चेतना और वैचारिक प्रतिबद्धता बहुत तेज़ी…

मोदी सरकार किसानों की समस्याओं को लेकर क्यों नहीं बुलाती विशेष सत्र, पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का लेख

By: Urmilesh Singh विमर्श। मेरा रिपोर्टर-मन नहीं माना! दो दिन से तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी, फिर भी पहुंच गया संसद मार्ग! किसानों से मिलने! पहले की कई किसान रैलियां हमने देखी हैं। कभी किसी दल के किसान-संगठन रैली निकालते थे या किसानों का कोई क्षेत्रीय संगठन हुक्का-पानी लेकर दिल्ली पर 'धावा' बोलता था! पर इस किसान मार्च में पूरे भारत के किसान थे! पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, हर जगह के किसान अपने रंग-बिरंगे झंडों के साथ वहां मौजूद थे! इनमें पुरुष, युवा, अधेड़, बुजुर्ग, हर उम्र की किसान-महिला और उनके कुछ परिजन भी साथ में थे!…

क्या है ब्राह्मणवादी पितृसत्ता, क्यों हो रहा है इस पोस्टर का विरोध, पढिए!

पितृसत्ता वो सामाजिक व्यवस्था है जिसके तहत जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा क़ायम रहता है. फिर चाहे वो ख़ानदान का नाम उनके नाम पर चलना हो या सार्वजनिक जीवन में उनका वर्चस्व. वैसे तो पितृसत्ता तक़रीबन पूरी दुनिया पर हावी है लेकिन ब्राह्मणवादी पितृसत्ता भारतीय समाज की देन है.. ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को समझने के लिए हमें भारत के इतिहास में झांकना होगा. वैदिक काल के बाद जब हिंदू धर्म में कट्टरता आई तो महिलाओं और शूद्रों (तथाकथित नीची जातियों) का दर्जा गिरा दिया गया.महिलाओं और शूद्रों से लगभग एक जैसा बर्ताव…

ठग्स ऑफ भारतवर्ष पर कोई क्यों नहीं बोलता?

“रामोसी” भाषा बोलने वाले "ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान" पर बनी फिल्म आमिर खान ला रहे हैं. लेकिन क्या आपको “संस्कृत” भाषा बोलने वाले "ठग्स ऑफ़ भारतवर्ष" के बारे में कुछ पता है? नहीं ना? उन ठगों पर हिन्दुस्तान में न कोई फिल्म बन सकती है न कोई ढंग का उपन्यास आ सकता है। लेकिन उन ठगों के बारे में क्रान्तिसूर्य ज्योतिबा फूले ने विस्तार से लिखा है. उनकी किताब गुलामगिरी ठीक से पढ़िए। रामोसी भाषा बोलने वाले ठग मुसाफिरों में घुल मिल जाते थे और उनके माल असबाब और ताकत का पूरा हिसाब लगाकर दूसरी टीम को सतर्क कर देते थे। दूसरी टीम इन्हें व्यापारियों…

2019 में भाजपा का हारना तय है!

2019 में भाजपा का हारना तय है. जनता भाजपा के फरेब से परिचित हो चुकी है. भाजपा को भी पता है कि लोग अब पहले की तरह बेवकूफ बनने वाले नहीं हैं. इसीलिए वह विकास का मुद्दा छोड़कर अपने मूल हथियार यानी साम्प्रदायिक राजनीति का प्रयोग करने के लिए माहौल बनाने लगी है. इसके लिए लगभग सभी न्यूज चैनल , ट्विटर , व्हाट्सएप और फेसबुक का प्रयोग शुरू हो चुका है. फेक न्यूज और प्लांटेड न्यूज से जनता को साम्प्रदायिक होने के लिए उकसाया जा रहा है. लेकिन इसका भी कोई खास असर होता नहीं दिख रहा है. प्रो-बीजेपी तमाम न्यूज चैनल्स और शोसल मीडिया ग्रुप्स/पेज…

क्या धार्मिकआस्था कि वजह से बढ़ रहा दिल्ली का प्रदूषण?

By- संजय श्रमण जोथे, दिल्ली मे प्रदूषण की समस्या की जिम्मेदारी न तो पूरी तरह से कानून व्यवस्था से जुडी है न औद्योगीकरण से न पूंजीवाद से और न ही शहरीकरण से। आप माने या न मानें ये इस देश के धर्म और संस्कृति से पैदा हुई समस्या है। किसान खेत में खूंटी जला रहा है क्योंकि यह सस्ता पड़ता है भले ही उसे अगली फसल में ज्यादा उर्वरक और कीटनाशक डालकर पूरी फ़ूड चेन को प्रदूषित करना पड़े, लेकिन वो ऐसा करेगा क्योंकि पढा लिखा वर्ग उससे बात ही नहीं करता किसानों और पेशेवरों सहित नागरिक समाज में संवाद नहीं होता। धार्मिक लोग पटाखे जला रहे हैं…

#MeToo अभियान की सवर्ण महिलाओं को डॉ रामकृष्ण के इन प्रासंगिक सवालों का जवाब देना होगा!

भारतीय समाज में महिलाओं को कमजोर समझे जाने की मानसिकता के चलते आज भी पुरुषवादी सोच उन पर हावी है और उसी सोच के चलते महिलाओं के साथ शोषण बदस्तूर जारी है। लेकिन महिलाओं के उत्पीड़न का यह दौर कोई नया नहीं है, इसका बहुत लंबा इतिहास रहा है। यह उस मनुवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था का नतीजा है जिसका महिलाओं ने भी कभी खुलकर विरोध नहीं किया है। आज जब मीटू कैंपेन के जरिए महिलाएं खुद को सशक्त और मजबूत महसूस कर रहीं है तो हमें कवयित्रि महादेवी वर्मा द्वारा लिखी एक कविता याद आती है...जिसमें वो लिखती हैं.... मै हैरान हूं यह सोचकर…

विजय दशमी का असली नाम “अशोक विजयदशमी” है। जानिए सम्राट अशोक का छुपाया गया इतिहास!

भारतीय लोगों के मस्तिष्क से सम्राट अशोक को बड़ी ही चतुराई और चालाकी से ब्राह्मणों ने भुला दिया है। बौद्ध धर्म अर्थात ‘समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय’ की शासन पद्धती अर्थात मानवकल्याण की समाज में व्यवस्था नष्ट करने के लए ब्राह्मणों को अशोक की यादें नष्ट करना बेहद जरुरी था। इस उद्देश्य पूर्ति के लिए उन्होंने अशोक से संबंधित दिनों को काल्पनिक राम के उत्सवों में तब्दील कर दिया। अशोक ने जिस दिन धम्मदीक्षा ली उस विजयादशमी को राम के दशहरा में बदल दिया और सम्राट अशोक के जन्म दिन को ब्राह्मणों ने  रामजन्म दिन के रुप में परिवर्तित…

#Me Too की आढ़ में भारत का अब कौनसा आर्थिक संकट छुपाया जा रहा है?

एक और बडा क़र्ज़दार विदेश भाग गया और सरकार बेख़बर रही? 31 साल तक आईएलएफ़एस कंपनी गुजरात का कर्ताधर्ता रहा रवि पार्थसारथी 92 हजार करोड़ के कर्ज डुबाने, डेढ़ लाख करोड़ के और बैंक कर्ज संकट में डालने और पूरी अर्थव्यवस्था में संकट पैदा करने के पश्चात देश छोडकर चला गया। वह भागा जुलाई 2018 में और लुकआउट नोटिस जारी हुई 1 अक्टूबर को। सरकार देश के सबसे बडे सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को कह रही है कि उसकी भरपाई करे। कहना नहीं आदेशित कर रही है! जो कुछ मुनाफ़े मे सरकारी कंपनियॉं चल रही है वे सब दबाब में है कि डूबती इन कंपनियों को बचाओ…

तो इस वजह से गनर महिपाल, जज की पत्नि और बेटे को गोली मारने पर हुआ था मजबूर!

By: SanJay Yadav एक दुखद घटना में दो दिन पहले गुड़गाँव में हरियाणा पुलिस के एक जवान महिपाल ने अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश की पत्नी और बेटे को गोली मार दी। बड़े जजों का समझ में आता है लेकिन ये जुडिशरी के सबसे निचले अधिकारियों को सुरक्षाकर्मी की क्या आवश्यकता है? महीपाल के केस में बताइये, हैड कॉन्सटेबल से गनमैन और ड्राइवर दोनों का काम लिया जा रहा था! कुछ अधिकारी, किसान पुत्र जवानों से जो ओहदें में सिपाही, हवलदार रहते है उनसे घरेलू नौकर और पारिवारिक बन्धुआ मज़दूर की तरह काम लेते है। आठों पहर उन्हें नौकरी से बर्खास्त करने…