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जानें, अटलबिहारी वाजपेयी का असली कैरेक्टर

मृत्यु अटल है। अटलबिहारी वाजपेयी का निधन 93 वर्ष की उम्र में हुआ। करीब 12 वर्षों तक वे बीमार रहे। इस लिहाज से उनका निधन शोक के योग्य नहीं बल्कि यह मौका है उनके बारे में जानने-समझने का। अटलबिहारी वाजपेयी का कैरेक्टर अनेक मामलों में खास है। लेकिन बहुजनों के लिए नहीं। बहुजन दृष्टिकोण से बात करें तो उनके जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं रहा जिसे याद कर बहुजन समाज शोक व्यक्त करे। बहुजन चिंतक और लेखक प्रेमकुमार मणि की यह टिप्पणी सटीक है। अपने पाठकों के बीच हम इसे साभार प्रकाशित कर रहे हैं - मनीषा बांगर, संपादक ब्राह्मण अटलबिहारी वाजपेयी…

संविधान से अधिक महत्वपूर्ण उमर खालिद या कुछ और?

विमर्श। भारतीय मीडिया अपने सामाजिक ताने-बाने के साथ काम करती है। उसके लिए कौन सी बात महत्वपूर्ण है या फिर किस बात को कितना महत्व देना है, यह सब खबर से अधिक खबर की सामाजिक पृष्ठभूमि मायने रखती है। उसके शब्द और शब्दों की परिभाषा भी इसी हिसाब से बदलती रहती है। यह कोई नई बात नहीं है। यह होता रहा है। लेकिन आश्चर्य तो तब होता है जब स्वयं को प्रगतिशील कहने वाले मीडिया संस्थानें भी ऐसे मौकों पर मुंह छिपाकर चुप बैठ जाती हैं। संभवत: उनकी कोशिश यह होती है कि वे अपनी प्रगतिशीलता का प्रदर्शन निर्बाध रूप से करते रहें और वह भी जो परोक्ष…

क्या वाकई में भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है..?

किसी भी बात को अपने तर्क-विवेक और संशय आधारित वैचारिकता से बिना परखे अनुकरण करना हानिकारक हो सकता है। भारत में आजकल राष्ट्रवाद का झंडा लिए घूम रहे तथाकथित राष्ट्रवादी तरह तरह के नारों से राष्ट्रवाद का प्रचार कर रहे है। हर भारतीय को वे शक की नज़रों से देख रहे है। उनके राष्ट्रवाद की परिभाषा के मुताबिक़ अगर आप राष्ट्र के सवंविधानिक मूल्यों का आदर करते है लेकिन तथाकथित 'भारत माता' के नारे नहीं लगाते, या पड़ोसी मुल्क को गालियाँ नहीं देते है, तो आप उनकी नज़रों में राष्ट्रवादी नहीं बल्कि देशद्रोही माने जाएँगे! देश के हर…

लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज

क्या आपने कभी सोचा है कि देश के स्वंत्रता दिवस यानि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री दिल्ली लाल क़िला पर ही क्यों राष्ट्रिय ध्वज फहराते हैं ? किसी अन्य ऐतिहासिक ईमारत या कोई बड़ी आधुनिक शासकीय बिल्डिंग या अपने कार्यालय पर ही क्यों नहीं ? 15 अगस्त पर लाल क़िले पर राष्ट्रिय ध्वज फहराए जाने के पीछे जन भावनायें, लाल क़िला का देश की सार्वभौमिकता और सम्प्रभुता का प्रतीक होना, ऐतिहासिक घटनाक्रम और सामाजिक मान्यताएँ हैं। किसी भौगोलिक क्षेत्र या जन समूह पर सत्ता या प्रभुत्व के सम्पूर्ण नियंत्रण पर अनन्य अधिकार को सम्प्रभुता (Sovereignty) कहा…

‘हाजी इकबाल पर अनुचित गैंगस्टर एक्ट सहारनपुर के विकास और शोषित-बहुजनों पर हमला है’

By: Khalid Anis Ansari विमर्श। बसपा के पूर्व एमएलसी और नेता हाजी इकबाल, उनके भाई एमएलसी महमूद अली और दो बेटों को उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने 23 जुलाई को गैंगस्टर एक्ट के तहत निरुद्ध कर दिया एवं पुत्र जावेद अली को गिरफ्तार कर लिया. क्षेत्र के सभी लोग जानते हैं कि हाजी इकबाल कोई बाहुबली नेता नहीं हैं और हत्या, अपहरण या डकैती जैसे अपराध से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। खनन के विवादों को लेकर वह ज़रूर चर्चा में रहे हैं मगर इसके साथ-साथ अपने खिलाफ हुए केसों को मजबूती के साथ वह कोर्ट में चुनौती दे रहे हैं. जहां सहारनपुर…

एक और बहुजन बेटी ने रोशन किया नाम….

ये हैं तमिलनाडु के मदुरई की 23 साल काव्या रवि कुमार। काव्या देश की पहली बहुजन   महिला कॉमर्शियल पायलट है। इन्हें हाल ही में गवर्मेंट फ्लाइंग ट्रैनिंग स्कूल (GFTS) से कॉमर्शियल पायलेट का लाइसेंस औऱ बेस्ट स्टूडेंट अवॉर्ड भी मिला है। 21 साल के इंतज़ार के बाद ये उपलब्धि हासिल हो सकी है। देश में कई महिला कॉमर्शियल पायलट्स हैं। लेकिन सभी सवर्ण वर्ग की हैं और बेहद मजबूत परिवारिक पृष्ठभूमि की भी। जिन्हें ना पैसे की कमी हुई, ना प्रिवेलेज की। बल्कि सो कॉल्ड सुंदरता के पैमाने यानी सुकोमल, गोरे और नैन-नक्श आदि-आदि के पैमाने पर खरे…

“Shabaash” Hima Das !!

By- Dr. Manisha Bangar Your historical record victory is a tight slap on the brahmin-dwijas, their merit logic ,and their caste system :- Centuries of cornering of resources did not help the brahmin-dwija to produce single sportsperson athelete who could have won the race in the history of India. Dear friends !! We have all seen the awesome performance of Hima Das, the 18-year-old girl, who barely 18 months back, ran her first race in district level. Now, this young lass has done the country proud by winning a gold…

कोविंद को धकियाया जाना आपत्ति से ज्यादा सीखने का मुद्दा है…

-Deepali Tayday भारतीय समाज में बहुजनों की कितनी औकात है ये बताती है यह सारी घटनाएं। तुम चाहे तलवे चाट-चाट कर राष्ट्रपति, मंत्री, संत्री, फलाना-ढिमका कुछ भी बन जाओ, लेकिन यहाँ तुम कहलाओगे नीच ही। नीच होने के कारण जो भौकाल एक ब्राह्मण का है तुम्हारा राष्ट्रपति बनके भी नहीं इसलिए एक अदना सा पंडा भारी पड़ा। फिर चाहे वो जगन्नाथपुरी का मंदिर हो, या पुष्कर का.....आगे और मट्टी-पलित करानी हो तो दक्षिण के मंदिरों में जाइये वहाँ और स्पेशल ट्रीटमेंट मिलेगा। कोविंद नहीं भारत के सभी बहुजनों जो कि अभी भी हिंदू धर्म को छाती से चिपटाये बैठे…

समाजिक क्रांति के प्रहरी, आरक्षण के जनक, श्रमण संस्कृति के महाराजा शाहूजी महाराज

By -डॉ जयंत चंद्रपाल बाबासाहब डॉ अम्बेडकर सही कहते थे की जो कोम अपना इतिहास नहीं जानती वह अपने भविष्य का निर्माण नहीं कर सकती। हम ब्राह्मण संस्कृति के राजा राम के बारे में और रामराज्य के बारे में तो बहुत जानते है मगर श्रमण संस्कृति के महाराजा शाहूजी और उनके लोकाभिमुख शासन के बारे में बहुत ही कम। Let us recognize our heroes किसी भी महापुरुष की पहचान उनके द्वारा किये गए कार्यो से होती है। 26 जून 1874 के दिन शुद्र वर्ण की कुर्मी (पाटीदार) जाति में जन्मे बहुजन एवं श्रमण संस्कृति के छत्रपति शाहू जी महाराज ने जाति व्यवस्था और इस…

JNU में पीएचडी स्कॉलर दिलीप यादव ने लिखा VC को खुला पत्र, बताई शोषण की कहानी

नई दिल्ली। जेएनयू  कुलपति के नाम खुला पत्र सेवा में कुलपति महोदय जेएनयू, नयी दिल्ली विषय: विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा संस्थागत उत्पीड़न महोदय मैं दिलीप कुमार यादव सेंटर फॉर इनर-एशियन स्टडीज स्कूल ओफ़ इंटरनेशनल स्टडीज में पीएचडी का विद्यार्थी हूं। मैं अगले 20-25 दिन में अपनी पीएचडी जमा करने वाला हूं। फिर भी आपका प्रशासन मेरा हॉस्टल ट्रान्स्फ़र कर रहा है। ये समय एक शोधार्थी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। और शायद आपका प्रशासन इस बात से अज्ञात है कि हॉस्टल ट्रान्स्फर जैसा उत्पीड़न कितना कष्टदायी हो सकता है। जब मैं खुद 20 दिन में…