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Uttar Pradesh & Uttarakhand

सोनभद्र नरसंहार कांड का सच

बनारस से सटे सोनभद्र जनपद में 16 जुलाई 2019 को दबंग भूमाफिया ने अवैध तरीके से आदिवासियों की जमीन हथियाने के लिए खूनी खेल खेला। हथियारबंद 300 लोगों ने निर्दोष वनवासियों पर करीब आधे घंटे तक अंधाधुंध फायरिंग की। इस घटना में 10 वनवासी मौके पर मारे गए और 25 से ज्यादा अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। बड़ी बात यह है की घटना के समय वनवासियों ने सोनभद्र के एसपी व कलेक्टर से लेकर सभी आला अफसरों को फोन किए। सभी के मोबाइल बंद मिले। 100 डायल पुलिस आई, पर तमाशबीन बनी रही। इस पुलिस के सामने ही चार वनवासियों को गोलियों से छलनी किया गया। घोरावल…

सोनभद्र में आदिवासियों की हत्या मैला आँचल की नजर से:

सोनभद्र में आदिवासियों की हत्या पिछड़ी जाति से आने वाले गुर्जरों ने की है। मैला आँचल ब्राह्मणवाद के इस खेल को बखूबी चिह्नित करता है कि कैसे अपने वर्गीय हित में पिछड़ी और दलित जातियों को वर्गशत्रु के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता है। 2005 के नया ज्ञानोदय के इस लेख में इसका जिक्र मैंने किया था। आपस में लड़ने और प्रतिस्पर्धा करने वाली गांव की सभी जातियां संथालो के खिलाफ एकजूट हो जाती हैं। कई संथाल मारे जाते हैं। मैला आँचल में जाति, वर्ग और जेंडर संबंध पर मेरे लेख का एक अंश: वर्गीय संकट के समय कायस्थ, राजपूत मिलकर पंचायत का षड़यंत्र…

स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में क्या सोचते थे? फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर

स्त्री-पुरुष के बीच कैसे रिश्ते हों? इस संदर्भ में भारत में दो अवधारणाएं रही हैं- ब्राह्मणवादी-मनुवादी अवधारणा और दलित-बहुजन अवधारणा। ब्राह्मणवादी-मनुवादी अवधारणा यह मानती है कि स्त्री पूर्णतया पुूरुष के अधीन है। यह ब्राह्मणवादी-मनुवादी विचारधारा तमाम शास्त्रों, पुराणों, रामायण, महाभारत, गीता और वेदों व उनसे जुड़ी कथाओं, उप-कथाओं, अंतर्कथाओं और मिथकों तक फैली हुई है। इन सभी का एक स्वर में कहना है कि स्त्री को स्वतंत्र नहीं होना चाहिए। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य-स्मृति जैसे धर्म-ग्रंथों ने बार-बार यही दोहराया है कि ‘स्त्री…

जस्टिस फॉर डॉ पायल: रोहित वेमुला के बाद एक और संस्थानिक हत्या!

By: Susheel Kumar पायल!! आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था, हां मैं समझ सकता हूं कि जब किसी इंसान के सामने हालात बद से बद्तर कर दिए जाएं तो फिर जीना मुश्किल हो जाता है पर आप तो ऐसे समाज से आती हैं जिसका इतिहास ही बेहद कठिन और संघर्ष भरा रहा है, तो फिर इस जातिवादी समाज में आपको भी लड़ना चाहिए था, इतनी जल्दी हार नहीं माननी चाहिए थी, आपकी लड़ाई ज्यादा बड़ी थी क्योंकि आप एक तरफ जातिवादी मानसिकता से लड़ रहीं थी तो वहीं दूसरी ओर पुरषवादी सोच को चुनौती दे रहीं थी!! जातिवाद की गंदगी भरे दिमाग में सड़ी हुई सोच की वजह से किसी को जब मौत गले…

मोदी का भ्रमजाल और बहुजनों का सवाल

~ नवल किशोर कुमार विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में चुनाव अब समाप्ति की ओर अग्रसर है। सात चरणों में केवल अंतिम चरण का मतदान शेष है। आगामी 19 मई को यह पूरा हो जाएगा। इसके बाद 23 मई को मतों की गिनती होगी और फिर यह तय हो सकेगा कि अगले पांच साल तक इस देश पर किसका राज होगा। लेकिन, इस चुनाव की सबसे खास बात यह रही कि बहुजनों के मुद्दे नरेंद्र मोदी के राष्ट्रवाद के ढोल और बालाकोट में कथित तौर पर किए गए धमाकों की शोर में गायब हो गए। सबसे दुखद यह कि बहुजनों के सवालों को खुद बहुजनों के नेताओं ने कोई तवज्जो नहीं दी। पूरे…

देशभक्ति के नाम पर कहीं मोदी इमरजेंसी तो नहीं थोपना चाहते?

Published by- Aqil Raza By- Dr. Manisha Bangar भारत द्वारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर आतंकवादियों के कैंपों को तबाह किए जाने का समाचार आज दूसरे दिन भी सुर्खियों में है। भारतीय मीडिया ने इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया है। भाजपा के नेतागण भारतीय वायु सेना के इस हमले को नरेंद्र मोदी की बहादुरी साबित कर रहे हैं। उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने तो यहां तक कह दिया है कि अब पाकिस्तान भविष्य में पुलवामा जैसी घटना को अंजाम देने से पहले सौ बार सोचेगा। सबकुछ ऐसा बताया जा रहा है कि यह हमला वायु सेना ने नहीं,…

सवाल दस लाख आदिवासी परिवारों का नहीं पचास लाख आदिवासियों का है

Published by- Aqil Raza By - डॉ. मनीषा बांगर ~ सुप्रीम कोर्ट ने 13 फरवरी 2019 को अहम फैसला सुनाया है। इस फैसले के मुताबिक केंद्र व 21 राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना है कि दस लाख से अधिक आदिवासी परिवार उस जमीन को छोड़ दें, जहां वे पीढ़ियों से रहते आए हैं। कोर्ट ने यह बात अपने मन से नहीं कही है। उसके सामने 21 राज्यों की सरकारों ने शपथ पत्र दाखिल कर कहा है कि दस लाख से अधिक आदिवासी परिवार यह सबूत नहीं पेश कर सका है कि वह जमीन का मालिक है। पहले तो यह समझें कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर क्या होगा यदि इसे लागू किया गया।…

ज़मीनों से बेदखल किए जाएंगे लाखों आदिवासी!

Published By- Aqil Raza By- सुदीप ठाकुर ~ युद्धोन्माद और राष्ट्रवाद के उफनते दौर में यह खबर शायद सनसनी पैदा न करे। सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक आदेश से 16 राज्यों में दस लाख से भी अधिक आदिवासियों और अन्य वनवासियों को जंगल से बेदखल किया जा सकता है, क्योंकि केंद्र सरकार वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत उनके अधिकारों की रक्षा करने में नाकाम रही है। बिजनेस स्टैंडर्ड (https://goo.gl/qY1Eqm) https://www.youtube.com/watch?v=jqdaxsjL8vo&t=52s केंद्र सरकार ने आदिवासियों को तकरीबन 80 साल बाद मिले इस महत्वपूर्ण अधिकार से संबंधित…

Testimony of AMU controversy by Sharjeel Usmani

Sharjeel Usmani writes~ "I reached the campus at 9.30 am for attending my classes. All was well back then. Few students were organizing a picture exhibition of the all victims of hate crimes in front of History department. First Asifa memorial lecture was scheduled at 11 am in Cultural hall of Maulana Azad Library; Films on Palestinian struggle were to be screened in Kennedy auditorium at 4:30 pm. I got a call from a friend that Republic TV reporters are creating problem in front of Social Science department. I reached there…

…तो इस लिए दी जा रही मायावती के स्मार्क बनाने वाले मामले को प्राथमिकता?

Published By- Aqil Raza By- Aqil Raza ~ तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती द्वारा बनावाए गए पार्कों और स्मार्कों के मामले में, 2009 में डाली गई याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मायावती को पैसा वापस सरकारी कौटे में लौटाने का प्राथमिक विचार किया है। पर सवाल इस बात का है कि लोकसभा के आम चुनावों के करीब आते ही इस मुद्दे पर सुनवाई क्यों हुई है? जब बसपा के वकील ने मामले की अगली सुनाई को चुनावों के बाद डालने की अपील की तो तुरंत CJI रंजन गोगोई ने उसे खारिज कर मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को तय कर दी । लेकिन आखिर ऐसी…