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Uttar Pradesh & Uttarakhand

अलवर में गौ तस्करी के शक में की गई हत्याओं की ज़िम्मेदार है एक घिनौनी मानसिकता!

By- आकिल रज़ा यह बात मैं बहुत ही ज़िम्मेदारी के साथ लिख रहा हूं.. कि मॉव_लिंचिंग का जो दर्द हम यहां बैठकर महसूस करते हैं, दरअसल वो उतना नहीं है बल्कि उससे कई गुनाह ज्यादा है, वैसे तो देश के कई राज्यों और शहरों में मॉव लिंचिंग की घटनांए हई हैं, लेकिन उन सबसे ऊपर लिस्ट में नाम आता है मेवात क्षेत्र का, मेवात भारत के उत्तरपश्चिम में हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में स्थित एक ऐतिहासिक व पारंपरिक क्षेत्र है। मोटेतौर पर इसकी सीमा में हरियाणा का मेवात जिला, राजस्थान के अलवर, भरतपुर और धौलपुर जिले और साथ ही उत्तर प्रदेश का कुछ…

किसानों का संदेश- अब आत्महत्या नहीं रण होगा, संघर्ष महाभीषण होगा!

By: Siddhartha Ramu इस बूढ़े किसान की लाठी ने सत्ता की लाठी को टक्कर दी है। इस लाठी की टकराहट की आवाज़ देश के किसानों को संदेश दे रही है, की टकराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। देश के हुक्मरानों ने किसानों को तबाह कर उन्हें शहरों की झुग्गी-झोपनियों में भेजने और अमीरों की चाकरी में लगाने का निर्णय ले लिया है। किसानों की जमीनों पर कारपोरेट की निगाहें हैं। बीज, खाद, पानी और कीटनाशक के मालिक तो कारपोरेट काफ़ी हद तक पहले ही बन चुके हैं। खेती के पैदावर के देशी-विदेशी बाज़ार पर पहले ही कारपोरेट अपना नियंत्रण कर चुके हैं। अब सरकारे…

विवके तिवारी की हत्या के साथ उन 56 भाईयों की हत्या पर एक शोकगीत,जिन्हें यूपी पुलिस ने पिछले 10 महीनों में अपराधी कहकर मार डाला

By: Siddharth Ramu विवेक तिवारी आपकी हत्या पर जरूर दुख और अफसोस किया जान चाहिए, मुझे भी है। आपकी पत्नी कल्पना और आपकी मासूम बच्ची के आंसू किसी को भी रूलाने के लिए पर्याप्त हैं, लेकिन यही उचित समय है जब उन 56 नौजवानों के लिए भी रो लिया जाए, जिन्हें अपराधी कहकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने पिछले 10 महीनों में मार डाला। क्या उनके लिए सिर्फ इसलिए न रोया जाए कि क्योंकि उनके नाम के आगे तिवारी नहीं लगा था, या विश्व कि सबसे नामी गिरामी कंपनी के एप्पल के एरिया मैंनेजर नहीं थे या वे उत्तर प्रदेश की राजनधानी में नहीं रहते थे या उनका चेहरा…

ताऊ देवीलाल: भारतीय सियासत का अनूठा चेहरा

दो बार हरियाणा के मुख्यमंत्री (77-79 & 87-89) और दो बार भारत के उपप्रधानमंत्री (वीपी सिंह और चंद्रशेखर के कार्यकाल में, 89-91) रहे देश के बड़े किसान नेता ताऊ देवीलाल जी (25 सितंबर 1915 - 6 अप्रैल 2001) की आज जयन्ती है। चौधरी देवीलाल की तुनकमिजाजी के बावजूद बिहार उनका सदा ऋणी रहेगा कि उन्होंने 90 के दशक में बिहार को एक ऐसा मुख्यमंत्री दिया जिन्होंने वंचितों को उच्च शिक्षा से जोड़ने के लिए पांच विश्वविद्यालय खोला। वे शरद जी को बहुत मानते थे और पहली बार केंद्र में कैबिनेट मंत्री (कपड़ा मंत्री) बनवाया और लालू प्रसाद के विधायक…

चंद्रशेखर रावण: हर रिहाई का मतलब आजादी नहीं होती

By- Santosh Yadav विमर्श। हंगामा और सियासत तो होनी ही थी। आखिरकार यह चंद्रशेखर रावण की रिहाई का मामला है। वहीं चंद्रशेखर रावण जिन्होंने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जहां ठाकुरों का घोषित और अघोषित दोनों राज कायम है, वहां 'द ग्रेट चमार' का नारा बुलंद किया। जाहिर तौर पर उनके उपर से रासुका हटाने का मामला इतना आसान नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आखिर क्यों भला रातों-रात चंद्रशेखर रावण के उपर से रासुका हटाने का निर्णय लिया? क्या उन्हें कोई सपना आया था जो आधी रात के बाद चंद्रशेखर को रिहा किया गया? क्या योगी सरकार इस बात से…

कृष्‍ण और यादवों का ब्राह्मणीकरण

By- चंद्रभूषण सिंह यादव इस देश की पिछड़ी जातियों में शुमार अहीर व यादव कृष्ण को अपना पूर्वज मानते हैं। इस जाति के बीच कृष्ण का नायकत्व ऐसा है कि अहीर और कृष्ण पर्यायवाची बन गए हैं। हिन्दू धर्मग्रंथों में इस यादव नायक का नाम कृष्ण, श्याम, गोपाल आदि आया है, जो यादवों के शारीरिक रंग एवं व्यवसाय से मेल खाने वाला है। बहुसंख्यक यादव सांवले या काले होते हैं, जो कि इस देश के मूल निवासियों अर्थात् अनार्यों का रंग है, के होंगे, तो निश्चय ही इनके महामानव या नायक का नाम कृष्ण या श्याम होगा, जिसका शाब्दिक अर्थ काला, करिया या करियवा होगा।…

ओबीसी आयोग : संवैधानिक अधिकार के नाम पर मिला झुनझुना

By- संतोष यादव संसद में यह कानून पारित हो चुका है कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को अनुसूचित जाति अायोग और अनुसूचित जनजाति आयोग के जैसे ही संवैधानिक अधिकार मिले। यानि यह एक मुकम्मल आयोग बने जिसके पास दांत और नाखून दोनों हों। केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने भी यही कहा जब वे इस कानून को संसद में पेश कर रहे थे। लेकिन अब कानून का जो स्वरूप सामने आया है वह महज ओबीसी को ठगने के लिए झुनझुना से अधिक कुछ भी नहीं है।   इस बारे में सामाजिक न्याय को लेकर पिछले 7 दशकों से सक्रिय भारत सरकार के पूर्व नौकरशाह पीएस कृष्णन ने सवाल उठाया है।…

भीमा कोरेगांव हिंसा में गिरफ्तारी, और घटना के पीछे की साजिश

भीमाकोरेगांव में हुई हिंसा के आरोप में आज यलगार परिषद और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और उनके परिवारजनों के घर पर छापेमारी हुई जबकि इन दंगों के मुख्य आरोपी संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे सहित हिंदू गुंडा गैंग के लोग खुलेआम घूम रहे हैं। बल्कि चुनाव से पहले किसी दूसरे दंगे की फ़िराक में औरंगाबाद के आसपास गतिविधियां तेज़ की है। मोदी ख़ुद भिड़े को अपना गुरूजी मानता है, तो फड़नवीस सरकार तो भिड़े-एकबोटे के चरण में पड़ी हुई है। जबकि भिमाकोरेगांव में हुई हिंसा भिड़े-एकबोटे द्वारा प्रायोजित थी, इस मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था…

बीपी मंडल की शतवार्षिकी

By- प्रेमकुमार मणि 25 अगस्त उस विन्ध्येश्वरी प्रसाद मंडल का जन्मदिन है , जिनकी अध्यक्षता वाले आयोग के प्रस्तावित फलसफे को लेकर 1990 के आखिर में भारतीय राजनीति में एक भूचाल आया और उसने राजनीति की दशा -दिशा बदल दी . इस वर्ष का जन्मदिन कुछ खास है . आज उनके जन्म की सौवीं सालगिरह है . इसलिए आज उन्हें याद किया ही जाना चाहिए . लेकिन मैं अपने ही अंदाज़ में उन्हें याद करूँगा . मेरी कोशिश हालिया इतिहास के उस पूरे दौर पर एक विहंगम ही सही, नज़र डालने की होगी जिसने बीपी मंडल और उनकी राजनीति को आगे लाया . हाई स्कूल का छात्र था ,जब वीपी मंडल…

ओबीसी के अंदर क्यों नहीं है छटपटाहट?

By- संतोष यादव इतिहास साक्षी है इस बात का कि अपने हक-अधिकारों के लिए जितना भारत के अनुसूचित जाति के लोग जागरूक रहे हैं, उतना पिछड़ा वर्ग के लोग नहीं रहे। यह जागरूकता तब भी नहीं थी जब देश में अंग्रेज शासक थे। जोतिबा फुले जैसे महान समाज सुधारक से मिली विरासत को भी पिछड़ा वर्ग संभाल नहीं पाया। वहीं बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने द्विजों की सत्ता को नकारते हुए समाज के अंतिम पायदान पर रह रहे लोगों के लिए संघर्ष किया। जबकि उन दिनों ही देश की राजनीति में ओबीसी समाज के कई कद्दावर नेता कांग्रेस की द्विजपरक राजनीति के हाथों की…