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Uttar Pradesh & Uttarakhand

जिन लोगों को लगता है कि एक थप्पड़ मारने पर SC/ST Act लग जाता है!

By- Umashankar  Yadav अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को जबरन अखाद्य या घृणाजनक (मल मूत्र इत्यादि) पदार्थ खिलाना या पिलाना। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को शारीरिक चोट पहुंचाना या उनके घर के आस-पास या परिवार में उन्हें अपमानित करने या क्षुब्ध करने की नीयत से कूड़ा-करकट, मल या मृत पशु का शव फेंक देना। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य के शरीर से बलपूर्वक कपड़ा उतारना या उसे नंगा करके या उसके चेहरें पर पेंट पोत कर सार्वजनिक रूप में घुमाना या इसी प्रकार का कोई ऐसा कार्य…

बहुजनों के लिए हमेशा खलनायक के रुप में याद किए जाएंगे अटल बिहारी वाजपेयी

By-Siddartha Ramu 1- अटल बिहारी बाजपेयी 1 अप्रैल 2004 के बाद भर्ती होने वाले सरकारी कर्मचारियों की पेंशन खत्म कर दी थी। सांसदों- विधायकों की पेंशन छोड़कर अन्य सभी सरकारी कर्मचारियों की पेंशन उन्होंने खत्म कर दी थी 2- अटल बिहारी बाजपेयी ने 1999 में देश के सरकारी और सार्वजिनक सार्वजनिक संस्थाओं को देशी-विदेशी पूंजीपंतियों को बेचने के लिए विनिवेश मंत्रालय बनाया। 3-अटल बिहारी वाजपेयी ही गुजरात में मुसलानों के नरसंहार के समय प्रधानमंत्री थे। उन्होंने राजधर्म निभाना चाहिए कह कर पल्ला झाड़ लिया और मुसलमानों का कत्लेआम देखते रहे। 4-…

जानें, अटलबिहारी वाजपेयी का असली कैरेक्टर

मृत्यु अटल है। अटलबिहारी वाजपेयी का निधन 93 वर्ष की उम्र में हुआ। करीब 12 वर्षों तक वे बीमार रहे। इस लिहाज से उनका निधन शोक के योग्य नहीं बल्कि यह मौका है उनके बारे में जानने-समझने का। अटलबिहारी वाजपेयी का कैरेक्टर अनेक मामलों में खास है। लेकिन बहुजनों के लिए नहीं। बहुजन दृष्टिकोण से बात करें तो उनके जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं रहा जिसे याद कर बहुजन समाज शोक व्यक्त करे। बहुजन चिंतक और लेखक प्रेमकुमार मणि की यह टिप्पणी सटीक है। अपने पाठकों के बीच हम इसे साभार प्रकाशित कर रहे हैं - मनीषा बांगर, संपादक ब्राह्मण अटलबिहारी वाजपेयी…

अम्बेडकर अंतर्राष्ट्रीय मिशन (AIM) के संस्थापक राजू कांबले सर का वैंकुवर कनाडा में निधन

नई दिल्ली। हम-आप जैसी बेहद सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले राजू काम्बले जी ने "शिक्षित हो, संघर्ष करो, संगठित हो" के नारे को आत्मसात कर बहुत संघर्ष कर प्रोफेशनल और सोशल लाइफ में बुलंदियों को छुआ। वे आजीवन बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने के साथ-साथ अलग-अलग देशों में फैले दलितों को यूनिट के लिए उन्होंने आजीवन प्रयास किया। बहुत ऊंचाईयों पर पहुँचने पर भी वे कभी अपने समाज से नहीं कटे बल्कि समाज के लिए समर्पित रहे और ग्राउंड पर जाकर दलित एक्टिविज़्म के लिए कार्य किया। उन्होंने भारत के हर एक…

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में डॉ. आंबेडकर की क्या राय…

आजादी से 1 वर्ष पहले 1946 में डॉ. आंबेडकर ने लिखा कि “ हिंदुओं और मुसलामनों की लालसा स्वाधीनता की आकांक्षा नहीं हैं. यह सत्ता संघर्ष है,जिसे स्वतंत्रता बताया जा रहा है.. कांग्रेस मध्यवर्गीय हिंदुओं की संस्था है, जिसकों हिदू पूंजीपतियों की समर्थन प्राप्त है, जिसका लक्ष्य भारतीयों की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि ब्रिटेन के नियंत्रण से मुक्त होना और सत्ता प्राप्त कर लेना है, जो इस समय अंग्रेजों की मुट्ठी में हैं.” ( डॉ, आंबेडकर, संपूर्ण वाग्यमय, खंड-17, पृ.3 ). मुसलमान... मध्यवर्गीय हिंदुओं के वर्चस्व से मुक्ति के लिए अलग…

Why IIT students were unhappy when PM Narendra Modi was invited as Chief Guest of Convocation?

*Statement of IIT Bombay Students Against Invitation of Narendra Modi in Convocation” As IIT Bombay students, we are proud that this institution has now stepped in its Diamond Jubilee year and has occupied a prominent place among the other well-known institutes of learning in this world. However, invitation of Mr. Narendra Modi, the prime minister of India, as a guest of honour in the convocation of this year, has raised some concerns among several students which we would like to share with the larger body of students,…

उपेक्षित नायक: करशनदास मुलजी…

By: Kirti Kumar विमर्श। जब वैष्णव समाज की बात आती है तो हमारी ज़ुबान पर एक ही नाम आ जाता है, मोहनदास करमचंद गांधी! और गांधी जी का नाम आते ही हमारे मन के रेडियो में गांधी जी की वो प्रिय धुन बजने लगती है, 'वैष्णव जन तो तेने रे कहिए..' लेकिन हक़ीक़त यह है कि वैष्णव जन की वेदना को करशनदास मुलजी नामक एक वैष्णव जन ने गांधीजी के जन्म से काफ़ी पहले समझा और उसे दूर भी किया। करशनदास मुलजी...यह वो नाम है, जिसने भारत के समाजिक परिवर्तन और समाज सुधार के दौर में काफ़ी सुर्ख़ियाँ बटोरी। लेकिन फिर गुमनामी के अंधेरो में खो गया या फिर उनकी…

‘हाजी इकबाल पर अनुचित गैंगस्टर एक्ट सहारनपुर के विकास और शोषित-बहुजनों पर हमला है’

By: Khalid Anis Ansari विमर्श। बसपा के पूर्व एमएलसी और नेता हाजी इकबाल, उनके भाई एमएलसी महमूद अली और दो बेटों को उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने 23 जुलाई को गैंगस्टर एक्ट के तहत निरुद्ध कर दिया एवं पुत्र जावेद अली को गिरफ्तार कर लिया. क्षेत्र के सभी लोग जानते हैं कि हाजी इकबाल कोई बाहुबली नेता नहीं हैं और हत्या, अपहरण या डकैती जैसे अपराध से उनका दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। खनन के विवादों को लेकर वह ज़रूर चर्चा में रहे हैं मगर इसके साथ-साथ अपने खिलाफ हुए केसों को मजबूती के साथ वह कोर्ट में चुनौती दे रहे हैं. जहां सहारनपुर…

समाजिक क्रांति के प्रहरी, आरक्षण के जनक, श्रमण संस्कृति के महाराजा शाहूजी महाराज

By -डॉ जयंत चंद्रपाल बाबासाहब डॉ अम्बेडकर सही कहते थे की जो कोम अपना इतिहास नहीं जानती वह अपने भविष्य का निर्माण नहीं कर सकती। हम ब्राह्मण संस्कृति के राजा राम के बारे में और रामराज्य के बारे में तो बहुत जानते है मगर श्रमण संस्कृति के महाराजा शाहूजी और उनके लोकाभिमुख शासन के बारे में बहुत ही कम। Let us recognize our heroes किसी भी महापुरुष की पहचान उनके द्वारा किये गए कार्यो से होती है। 26 जून 1874 के दिन शुद्र वर्ण की कुर्मी (पाटीदार) जाति में जन्मे बहुजन एवं श्रमण संस्कृति के छत्रपति शाहू जी महाराज ने जाति व्यवस्था और इस…

फुले और तिलक के बीच कड़ा संघर्ष क्यों…?

By- सिद्धार्थ रामु माली जाति के जोतीराव फुले (11 अप्रैल 1827,मृत्यु - 28 नवम्बर 1890) और चितपावन ब्राहमण बाल गंगाधर तिलक(23 जुलाई 1856 - 1 अगस्त 1920) के बीच तीखा संघर्ष क्यों होता रहा ? दोनों के बीच संघर्ष के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे मुद्दा नंबर 1- तिलक का मानना था कि जाति पर भारतीय समाज की बुनियाद टिकी है, जाति की समाप्ति का अर्थ है, भारतीय समाज की बुनियाद को तोड़ देना, साथ ही राष्ट्र और राष्ट्रीयता को तोड़ना है। इसके बरक्स फुले जाति को असमानता की बुनियाद मानते थे और इसे समाप्त करने का संघर्ष कर रहे थे। तिलक ने फुले को…