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ڈاکومنٹری - فروری 8, 2020

سنت جمعرات روداس کا تحریک بکتی تحریک نہیں, بہوجن سماج کے لئے براهم-واد سے نجات کا تحریک تھا

کی طرف سے- कलावती शंकर ~

سنت جمعرات روداس کا تحریک بکتی تحریک نہیں, بلکہ، یہ مقامی بہوجن سماج کے لیے برہمن ازم سے آزادی کی تحریک تھی، جو ہندی ادب میں بھکتی تحریک سے جڑی ہوئی ہے۔, وہ دراصل برہمنیت ہے۔,وہ دراصل برہمنیت ہے۔, وہ دراصل برہمنیت ہے۔, संत कवीर दास जी, गुरुनानक, संत चोखामेला, गुरु नारायना, गुरु जी जैसे क्रांतिकारी संतो और गुरुओ ने अपने अपने-अपने से तरीके से अपने-अपने समय मे चलाया था। असल में वह तथागत बुद्ध के ही आन्दोलन का प्रतिरूप था, जिसे भक्ति आन्दोलन की ज्ञानाश्रयी शाखा बोल कर हिन्दुइस्म के साथ जोड़ दिया गया है जबकि इनके विचार हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था, कर्म कांड, बहुदेव वाद, छूआछूत, मूर्ति पुजा, तीर्थ-व्रत, साकार ईश्वर इत्यादि के बिरुद्ध है और इन संतो और गुरुओ का उद्देश्य ब्राहमण-वाद के विरुद्ध विद्रोह कर ब्राहमण-वाद की मानासिक, रूप से गुलाम बनाई गयी मूलनिवासी जनता को मुक्ति दिलाने का था। कई विद्वानो का मानना है आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने संत कबीर और रविदास का मूल्यांकन ठीक से नही किया और इनके स्थान पर तुलसी दास को महिमामंडित किया।

आज भी सन्त रविदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सदव्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण सन्त रविदास को अपने समय के समाज में अत्याधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। संत कवि रविदास उन महान सन्तों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही हैं जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है।
गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी रविदास उच्च-कोटि के संत थे। उन्होंने समता और सदाचार, मन शुद्धि पर बहुत बल दिया। सत्य को शुद्ध रूप में प्रस्तुत करना ही उनका ध्येय था। उनका सत्यपूर्ण ज्ञान में विश्वास था। परम तत्त्व सत्य है, जो अनिवर्चनीय है । संत कबीर ने उन्हे “संतनि में रविदास संत” कहकर उनका महत्त्व स्वीकार किया है।
संत रविदास ने संत कबीर के साथ मिलकर ब्राहमण-वाद को खुली चुनौती दी और मूलनिवासी समाज को उत्तर प्रदेश से लेकर राजस्थान और पंजाब तक अपने वाणी जागृत कर से ब्राह्मण वाद से मुक्ति दिलाई।

संत रविदास का ब्राहमण-वाद के साथ विरोधाभास:-

  1. बहुदेव वनाम एक देव:-
    संत रविदास का विश्वास एक निराकार शक्ति मे था। ब्राह्मण धर्म या वैदिक धर्म बहूदेववाद मे विश्वास करता है, इस लिए वहाँ पर 33 करोड़ देवी और देवताओ का जिक्र है। इसके ठीक विपरीत संत रविदास ने कहा कि सबका एक ही मालिक है और वह भी निराकार है।
    जो खुदा पश्चिम बसै, तो पूरब बसत है राम।
    रविदास सेवों जिह ठाकुर कू, तिह का ठाव न नाम॥
    रविदास न पूजई देहरा, न मस्जिद जाय।
    जह तह ईश का बास है, तह नह सीस नवाय॥
    मुसलमान सो दोस्ती, हिन्दुअन सो कर प्रीत।
    रैदास जोति सभी राम की सभी हैं अपने मीत।।
    रविदास हमारे राम जी, दशरथ करि सुत नांहि।
    राम हमऊ मांहि रमि रह्यो, बिसव कुटंबह माहि॥
  2. साकार वनाम निराकार:-
    अपने 36 करोड़ देवी और देवताओ के माध्यम वैदिक धर्म बहू देव वाद मे विश्वास करता है। और इन सभी देवताओ की मूलनिवासी बहुजन समाज से पुजा कराता है और इसके नाम पर मूलनिवासियों से दान दक्षिणा लेता है और उनको आर्थिक रूप से कमजोर करता है। इन सारे देवी देवता की मूर्तियाँ बनी है और सबके पास मार काट करने वाला कोई न कोई हथियार है जिसके कारण मूलनिवासियों मे इन देवताओ का भय पैदा कर उनको मानसिक रूप से गुलाम बनाता है। संत रविदास ने 33 करोड़ देवी और देवताओ को नकार कर एक शक्ति वह भी निराकार रूप का समर्थन किया और मूर्ति पुजा, पत्थर पुजा, कर्म कांड, तीर्थ व्रत का घोर विरोध किया। तीर्थ, गंगा स्नान करने के स्थान पर अपना मन शुद्ध करने और अपना कर्म करने और ज्ञान बढ़ाने पर ज़ोर दिया। उन्होने अपने अनुयायियों को बताया कि…
    मन चंगा, तो कठौती मे गंगा।
    मन ही पूजा, मन ही धूप।
    मन ही सेउ, सहज सरुप॥
    देता रहे हजार बरस मुल्ला चाहे अजान।
    रविदास खुदा नहीं मिल सके, जो लो मन शैतान॥
  3. पाखंड वाद, कर्मकांड बनाम मन की शुद्धता :
    संत रविदास ने ब्राह्मण वाद के ठीक विपरीत तीर्थ, ब्रत, दर्शन, गंगा स्नान, कर्मकांड, पाखंड करने के स्थान पर मन शुद्ध करने और अपना कर्म करने पर ज़ोर दिया। उन्होने अपने अनुयायियों को तीर्थ, ब्रत, कर्मकांड, पाखंड से दूर रह कर सत्य की खोज और सत्य को ही मानने की सलाह दिया।
    का मथुरा का द्वारका, का काशी हरिद्वार।
    रविदास खोजा दिल आपना, तऊ मिला दिलदार॥
    माथै तिलक, हाथ जप माला, जग ठगने को स्वांग रचाया।
    मारग छोड़ कुमारग डहकै, सांची प्रीत बिनु राम न पाया॥
    संत रविदास तथागत बुद्ध की तरह ही इंद्रियो को वश मे रखने की बात करते है।
    जो बस राखे इंद्रियाँ, सुख दुख समझि समान।
    सोऊ असरति पद पाइगो, कहि रैदास वारवान। ।

ब्राह्मणवाद पर चोट करते हुये संत रविदास ने कहा कि
जीवन चारि दिवस का मेला रे ।
बांभन झूठा , वेद भी झूठा , झूठा ब्रह्म अकेला रे ।
मंदिर भीतर मूरति बैठी , पूजति बाहर चेला रे ।
लड्डू भोग चढावति जनता , मूरति के ढिंग केला रे ।
पत्थर मूरति कछु न खाती , खाते बांभन चेला रे ।
जनता लूटति बांभन सारे , प्रभु जी देति न धेला रे ।
पुन्य पाप या पुनर्जन्म का , बांभन दीन्हा खेला रे ।
स्वर्ग नरक बैकुंठ पधारो , गुरु शिष्य या चेला रे ।
जितना दान देव गे जैसा , वैसा निकरै तेला रे ।

  1. जाति वाद वनाम जाति विहीन समाज:-
    जहा पर की वैदिक धर्म जिसको की वर्णाश्रम धर्म भी कहा जाता है, ने समाज को चार वर्णो ब्राह्मण, چھتریہ, वैश्य और शूद्र मे श्रेणीवद्ध असमानता के सिद्धान्त पर विभक्त किया है और तथागत बुद्ध तथा सम्राट अशोक के बाद मे उसमे 6000 जातियां बना दी। जिससे की समाज मे उंच-नीच, छुआछूत और जात-पात की गंभीर समस्या खड़ी हो गयी। संत रविदास ने वर्ण व्यवस्था जातिवाद एवं छुआछूत का घोर विरोध किया। वर्ण व्यवस्था का घोर विरोध करते हुये संत रविदास कहते है कि,
    रविदास एक ही बूंद सो सब भयो वित्थार।
    मूरिख है जो करत है, वरन, अवरण विचार॥
    ठीक उसी प्रकार जाति व्यवस्था का भी घोर विरोध करते हुये संत रविदास कहते है कि,
    ذات- जाति में जाति है, ذات میں ذات
    रैदास मनुष ना जुड़ सके, जब तक जाति न जात।।
    जहां तुलसी दास ने जातिवाद का समर्थन करते हुआ कहा है कि..
    ढोल गँवार शूद्र पशु नारी | सकल ताड़ना के अधिकारी ||
    पूजिय विप्र सील गुन हीना, सूद्र न पूजे गुन ज्ञान प्रवीना ॥
    ठीक इसके विपरीत मे संत रविदास ने पहले ही जातिवाद का खंडन करते हुये कह दिया है कि
    रविदास बाहमन मत पूजिए, जऊ होवे गुणहीन ।
    पुजाहि चरण चंडाल के, जऊ होवे गुण प्रवीण॥
    रविदास जन्म के कारनै, होत न काऊ नीच।
    नर कू नीच कर डारि है, ओछे कर्म की कीच॥
    जात पात के फेर मे, उरझि रहे सब लोग।
    मनुष्यता को खात है, रविदास जात का रोग॥
    संत रविदास ने अपने अनुयायियों को भी मुक्ति का संदेश देते हुये कहा था कि किसी की भी पराधीनता/मानसिक गुलामी ठीक नहीं है। उन्हे हर प्रकार की मानसिक, धार्मिक और शारीरिक गुलामी से स्वयं को मुक्त करना चाहिए
    पराधीनता पाप है, जान लेहु रे मीत ।
    रैदास दास पराधीन सो, कौन करे है प्रीत॥
    पराधीन को दीन क्या, पराधीन बेदीन।
    रैदास पराधीन को सब ही समझे हीं॥

2. विषमतामूलक वनाम समतामूलक समाज:-
संत रविदास ने एक आदर्श कल्याण कारी शहर, बेगमपूरा (बिना गम का शहर) बसाने की कल्पना की थी जहा राज्य की व्यवस्था समाजवादी, آزادی, समता तथा बंधुत्व के सिधान्त पर की हो।
ऐसा चाहूँ राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।
छोटा बड़ा सब सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न॥
रविदास एक ही नूर ते जिमि उपज्यों संसार।
उंच नीच किह विध भये ब्राहमण और चमार॥
संत रविदास हिन्दू और मुस्लिम को भी एक निगाह से देखते है दोनों को बराबर मानते है।
रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।
मुसलमान सो दास्ती हिन्दुअन सो कर प्रीत।
रैदास जोति सभी राम की सभी हैं अपने मीत।।

कर्म को प्रधानता
संत रविदास तथागत बुद्ध की तरह ही कर्म को प्रधानता देते है और बताते है कि अच्छे कर्म से निम्न आदमी भी आगे बढ़ जाता है और बुरे कर्म से बड़ा आदमी भी नीचे गिर जाता है
रविदास सुकरमन कर नसो नींच, ऊंच हो जाय।
काई कुकरम ऊंच भी, तो महा नींच कहलाय॥
इस तरह हम स्वयम यह देख सकते है कि संत रविदास ब्राहमण-वाद कि सभी दमन कारी वृतिओ के विरुद्ध आंदोलन चला कर अपने मूलनिवासी बहुजन समाज को जागृत कर उनको ब्राहमण-वाद से मुक्ति दिलाई। संत रविदास की वाणी तथागत बुद्ध की विचारधारा के अत्यंत समीप है जबकि ब्राहमण-वाद से अत्यंत दूर है।

2संत रविदास ने शिक्षा के महत्व पर ज़ोर दिया
संत रविदास भी शिक्षा के महत्व को भलीभांति समझते थे क्योंकि उन्होंने महसूस किया कि हमारे समाज को शिक्षा से वंचित रखा गया है जिसके कारण उनमें अंधविश्वास व कुरीतियां व्याप्त हो गई है जिसको शिक्षा के बिना दूर नहीं किया जा सकता। इसलिए उन्होंने कहा कि अशिक्षा ने हमारा बड़ा ही नुकसान किया है क्योंकि अशिक्षा के कारण ज्ञानरूपी प्रकाश बुझ गया, जिससे सोचने समझने की क्षमता समाप्त हो गई फलस्वरूप इस देश के बहुसंख्यकों का जीवन बड़ा ही कष्टकारी हो गया। उन्होंने आगे कहा कि वह शिक्षा ग्रहण करो जिसमें सत्यता हो क्योंकि सत्य से ही अच्छे बुरे की पहचान होती है और जीवन भर शिक्षा ग्रहण करो क्योंकि शिक्षा के बिना मानव मृत शरीर के समान है ।
अविद्या अहित कीन,
ताते विवेक दीप मलिन ।
अर्थात अविद्या ने हमारे समाज का बहुत ही अहित किया। अविद्या के कारण हमारे लोगो का विवेक रूपी दीपक मुरझा गया।
ज्ञान काहू के सम्पत नाही,
ज्ञानी भरमत है जग माही ।
अर्थात ज्ञान या शिक्षा किसी की सम्पत्ति नहीं है। शिक्षा प्राप्त करने का सबको अधिकार है।
सत विद्या को पढ़े, सदा प्राप्त करो ज्ञान ।
रैदास कहे बिन विद्या, नर की जान अजान ।
अर्थात वह शिक्षा ग्रहण करो जिसमें सत्यता हो क्योंकि सत्य से ही अच्छे बुरे की पहचान होती है। शिक्षा जीवन भर ग्रहण करो क्योंकि शिक्षा के बिना मानव मृत शरीर के समान है ।
जहां अंधविसवास है, सत परक तहं नाहिं ।
रैदास सत सोई जनि है, जो नुभव होइ मन माहि ।।
अर्थात जहां अंधविश्वास है वहाँ सत्य की परख नहीं हो सकती और सत्य वही है जो अनुभव के आधार पर बोला जाता है

~ कलावती शंकर (एम॰ ए॰, बी॰ एड॰)
पीपल्स पार्टी ऑफ इंडिया डेमोक्रेटिक
اتر پردیش, لکھنؤ

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