जस्टिस फॉर डॉ पायल: रोहित वेमुला के बाद एक और संस्थानिक हत्या!

आपकी लड़ाई ज्यादा बड़ी थी क्योंकि आप एक तरफ जातिवादी मानसिकता से लड़ रहीं थी तो वहीं दूसरी ओर पुरषवादी सोच को चुनौती दे रहीं थी!!

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By: Susheel Kumar
पायल!! आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था, हां मैं समझ सकता हूं कि जब किसी इंसान के सामने हालात बद से बद्तर कर दिए जाएं तो फिर जीना मुश्किल हो जाता है पर आप तो ऐसे समाज से आती हैं जिसका इतिहास ही बेहद कठिन और संघर्ष भरा रहा है, तो फिर इस जातिवादी समाज में आपको भी लड़ना चाहिए था, इतनी जल्दी हार नहीं माननी चाहिए थी, आपकी लड़ाई ज्यादा बड़ी थी क्योंकि आप एक तरफ जातिवादी मानसिकता से लड़ रहीं थी तो वहीं दूसरी ओर पुरषवादी सोच को चुनौती दे रहीं थी!!

जातिवाद की गंदगी भरे दिमाग में सड़ी हुई सोच की वजह से किसी को जब मौत गले लगाने पर मजबूर कर दिया जाता है तो यह घटना कंलक है उनके मुंह पर जो खुद को सभ्य समाज होने का दावा करते हैं। 24 मई को एक बार फिर रोहित वेमुला कांड की तस्वीर जहन में आ गई जब मुंबई में अपने तीन सीनियर के जातिवादी तानों से परेशान होकर डॉ पायल तड़वी ने मौत को गले लगा लिया। पायल मुंबई के बीवाईएल नायर हॉस्पिटल से एमडी कर रही थी, आदिवासी समाज से आने वाली पायल महाराष्ट्र के जलगांव की रहने वाली थी। बताया जा रहा है कि तीन डॉक्टर डॉ हेमा आहूजा, डॉ भक्ति मेहर और डॉ अंकिता खंडिलवाल अस्पताल के सैकंड ईयर की पीजी छात्रा पायल पर जातिसूचक फब्तियां कसते थे, जिसके चलते 26 साल की महिला डॉक्टर ने मौत को गले लगा लिया। जानकारी के मुताबिक डॉ. पायल की इन तीनों सीनियर्स ने Whatsapp ग्रूप में पायल पर जातिवाद टिप्पणी करते हुए कहा था कि तुम आदिवासी लोग जगंली होते हो, तुमको अक्कल नही होती.. तू आरक्षण के कारण यहाँ आई है, तेरी औकात है क्या हम से बराबरी करने की..! तू किसी भी मरीज को हाथ मत लगाया कर वो अपवित्र हो जाएँगे, तू क्या ईलाज करेगी तुम्हारे बस का कुछ नहीं है, तू आदिवासी नीच जाती की लड़की मरीज़ों को भी अपविञ कर देगी..!” अब आप सोचिए इस तरह की सामूहिक सार्वजनिक प्रताड़ना किसी को भी झकझोर सकती है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि डॉ. पायल की आत्महत्या सिर्फ़ आत्महत्या नहीं है बल्कि यह संस्थानिक मर्डर हैं।

जानकारी के मुताबिक डॉ. पायल ने अपने तीनों सीनियर्स डॉक्टर के खिलाफ पहले अस्पताल प्रबंधन से शिकायत भी की थी, लेकिन प्रबंधन की ओर से उचित कार्रवाई न होने पर वो काफी निराश थी। पहले तो पुलिस ने इसे जातिवादी केस मानने से ही इंकार कर दिया था। बाद में जब पायल के परिजनों ने भी उसकी डेड बॉडी लेने से मना कर दिया था। तब दबाव में आकर पुलिस ने केस दर्ज किया। पुलिस ने इस मामले में धारा 306, रैगिंग एक्ट 1999 और एससी-एसटी एक्ट समेत अन्य धाराओं में तीन सीनियर डॉक्टर के खिलाफ केस दर्ज किया। सोचिए कितना आसान होता है किसी पर फब्तियां कसना खासकर जातिगत व्यंग्य करना किसी की जान ले लेता है। यह नए भारत का नया जातिवाद है। बदलते स्वरूप में आपके सामने मौजूद है। सोच वही है बस तरीका नया है। डॉ रोहित वेमुला को भुला दिया था अब पायल उसी जातिवाद की भेंट चढ़ गई। इस देश के कथित सवर्ण मानसिकता वाले लोग इतने बेशर्म किस्म के है कि उन्हें न संवेदना प्रकट होती है और न वे इससे विचलित होते हैं। उन्हें किसी बहुजन, शोषित के मरने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता है। न इस देश की मैनस्ट्रीम मीडिया के लिए यह कोई गंभीर मुद्दा होता है।

आर पी विशाल, बहुजन चिंतक अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं कि आपको समझना होगा कि जातिवाद आपको हर जगह फेस करना होगा। द्रोणाचार्य अब जंगल मे नहीं यूनिवर्सिटी में मिलते हैं अब वो आपका अंगूठा नहीं काटते हैं वो आपके नम्बर काटते हैं, आपकी सीट काटते हैं, आपके करियर को काट देते हैं। अंग्रेज यूँ ही नहीं कहते थे कि भारतीयों में न्यायिक चरित्र नहीं होता है उसके पीछे जातिवाद ही तो वजह थी। आज भी आप देखिए वही मानसिकता हर जगह भरी पड़ी है बस तरीके बदल गए हैं जिसे आप कभी समझ ही नहीं सकेंगे। आप इसलिए नहीं समझ सकते क्योंकि आपको ऐसे लोगों की पहचानने की क्षमता नहीं है। पर डॉ पायल आपको यह कदम नहीं उठाना चाहिए । अब लड़ना होगा लड़कर मरोगे तो इतिहास याद रखेगा। ऐसे मरोगे तो केवल समाज की संवेदना के सिवाय कुछ नहीं मिलेगा। खैर सोचिए यह कैसा बीमारों का देश है, जो ढंग से अभी मनुष्य भी नहीं बन पाए हैं और खुद को ‘उच्च’ समझते हैं. अब देखना यह होगा कि इस केस में पुलिस प्रशासन और सरकार क्या कर्रवाई करती है, डॉ पायल को इंसाफ मिल पाता है या नहीं?

-सुशील कुमार
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