जन्मदिन विशोष: भारत के तीसरे राष्ट्रपति भारतरत्न डॉ़ ज़ाकिर हुसैन का मनाया गया 123वां जन्मदिन

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आज भारत के तीसरे राष्ट्रपति व महान शिक्षाविद भारतरत्न डॉ़ ज़ाकिर हुसैन (8 फरवरी 1897 – 3 मई 69) का जन्मदिन है। वे जामिया मिलिया इस्लामिया के उपकुलपति, अलीगढ़ मुस्लिम वि. वि. के कुलपति, बिहार के राज्यपाल, देश के उपराष्ट्रपति और फिर राष्ट्रपति बने। वे सीबीएसई, यूजीसी व यूनेस्को से भी गहरे जुड़े रहे एवं विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के गठन में उनकी महती भूमिका थी। 1935 में काशी विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए उन्होंने कहा था:

अगर काशी विद्यापीठ के स्नातक होने के नाते तुम अपना जीवन देश की सेवा में लगाना चाहते हो, तो मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है। तुम जिस देश में यहाँ से निकलकर जा रहे हो, वह बड़ा अभागा देश है। वह गुलामों का देश है, क्रूर परम्पराओं का देश है, अविवेकी पुजारियों का देश है, भाई-भाई में नफरत का देश है, बीमारियों का देश है, सस्ती मौत का देश है, ग़रीबी और अंधेरे का देश है, भूख और मुसीबत का देश है, यानी बड़ा कम्बख्त देश है ! लेकिन क्या कीजिए ? तुम्हारा और हमारा देश है ! इसी में जीना है, और इसी में मरना है। इसलिए यह देश तुम्हारी हिम्मत के इम्तिहान, तुम्हारी शक्तियों के प्रयोग और तुम्हारे प्रेम के परख की ज़गह है।

मैं समझता हूँ कि हमें बिगाड़ना इतना नहीं है, जितना कि बनाना है। हमारे देश को हमारी गर्दनों से उबलते ख़ून के धारे की ज़रूरत नहीं है, बल्कि हमारे माथे का बारहमासी बहने वाला दरिया दरकार है। ज़रूरत है काम की – ख़ामोश और सच्चे काम की ! हमारा भविष्य किसान की टूटी झोंपड़ी, कारीगर की धुएं से काली छत और देहाती मदरसे व पाठशालाओं के फूँस के छप्पर तले बन और बिगड़ सकता है।

राजनीतिक झगड़ों, कॉन्फ्रेंसों और कॉंग्रेसों में कल और परसों के क़िस्सों का फैसला हो सकता है। लेकिन जिन जगहों का नाम मैंने लिया है, उनमें सदियों तक के लिए हमारी क़िस्मत का फैसला होगा, और इन जगहों का काम धीरज चाहता है और संयम। इसमें थकान भी ज़्यादा है और कदर भी कम होती है, ज़ल्दी नतीजा भी नहीं निकलता। हाँ, कोई देर तक धीरज रख सके तो ज़रूर फल मीठा मिलता है।

आपस की घृणा और भ्रांति भी इस काम में कुछ अच्छे साथी साबित न होंगे, क्योंकि तुम्हारी राष्ट्रीयता के भवन की बुनियादें प्रेम और विश्वास की चट्टानों ही पर ही दृढ़ रह सकेंगी।

सारांश यह है कि तुम्हारे सामने अपने जौहर दिखाने का अद्भुत अवसर है। मगर इस अवसर का उपयोग करने के लिए बहुत बड़े नैतिक बल की आवश्यकता है। जैसे मैमार होंगे वैसी ही इमारत होगी।… बस, अब, विदा ! तुम्हें तुम्हारी शिक्षा की उपाधि मुबारक हो ! तुमसे बहुत-सी आशाएँ हैं, आशा है, निराश न करोगे !

जयंत जिज्ञासू

छात्र नेता, जेएनयू

यह लेख जेएनयू आरजेडी छात्र नेता जयंत जिज्ञासू के फेसबुक वॅाल से लिया गया है

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