किसानों का संदेश- अब आत्महत्या नहीं रण होगा, संघर्ष महाभीषण होगा!

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By: Siddhartha Ramu

इस बूढ़े किसान की लाठी ने सत्ता की लाठी को टक्कर दी है। इस लाठी की टकराहट की आवाज़ देश के किसानों को संदेश दे रही है, की टकराने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। देश के हुक्मरानों ने किसानों को तबाह कर उन्हें शहरों की झुग्गी-झोपनियों में भेजने और अमीरों की चाकरी में लगाने का निर्णय ले लिया है। किसानों की जमीनों पर कारपोरेट की निगाहें हैं। बीज, खाद, पानी और कीटनाशक के मालिक तो कारपोरेट काफ़ी हद तक पहले ही बन चुके हैं। खेती के पैदावर के देशी-विदेशी बाज़ार पर पहले ही कारपोरेट अपना नियंत्रण कर चुके हैं। अब सरकारे पूंजीपतियों को नहीं नियंत्रित करती, पूंजीपति सरकारें चलाते हैं। कौन नहीं जानता कि मोदी की सरकार अंबानी-अडानी चलाते हैं।
पिछले 50 महीनों में करीब 4 लाख करोड़ के कर्जों की माफ़ी सरकार ने कारपोरेट घरानों की है, लेकिन किसानों का कुल कर्ज ही करीब 70 हज़ार करोड़ है, उसे माफ करने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है।
बैंकों को पूंजीपतियों ने दिवालिया बना दिया। सरकार ने जनता के टैक्स के पैसे से बैंको को किसी तरह बचा रही है।

पिछले 50 महीनों में कृषि और किसानों को मोदी सरकार ने कैसे तबाह किया कुछ आँकड़े-

1-2010-11 से 2013-14 के बीच (UPA) कृषि क्षेत्र की विकास दर 5.2 प्रतिशत थी,जो मोदी के इन 4 वर्षों में गिरकर 2.5 प्रतिशत यानी आधी से भी कम हो गई।

2-किसानों की वार्षिक वास्तविक आय में बृद्धि की दर 3.6 प्रतिशत से गिरकर 2.5 प्रतिशत हो गई।

3- अधिकांश मुख्य फसलों पर लाभ में 1 तिहाई की गिरवाट आई।

4- कृषि निर्यात 42 विलियन डॉलर ( 2013-14) से गिरकर 2017-18 में 38 विलियन डॉलर रह गया।

5- लेकिन कृषि का आयात 16 विलियन डॉलर (2013-14) से बढ़कर 24 विलियन डॉलर (2017-18) हो गया।

जिस कृषि पर देश की करीब 63 प्रतिशत यानी 75 करोड़ से ऊपर लोग निर्भर हैं, उसे मोदी ने 48 महीनों में क़रीब तबाही के कगार पर ला दिया। 75 करोड़ लोगों को अच्छे दिनों का सपना दिखाकर, और बदत्तर दिन दिखा दिया।

( ये आंकङे भारत सरकार की संस्थाओं ने ही उलब्ध कराये हैं)

कारपोरेट झूठ की मशीनरी(मीडिया) और संघ द्वारा फैलाया जा रहे धार्मिक नफ़रत की ज़हर से इन तथ्यों को झुठलाया जा रहा है, और खुशहाल भारत का विज्ञापन किया जा रहा है।

By: Siddhartha Ramu

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