डॉ. कफील की रिहाई के लिए उठी आवाज़

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अब एक डॉक्टर से ‘राष्ट्रीय-सुरक्षा’ को ख़तरा पैदा हो गया है! यह वही डॉ कफील अहमद हैं, जिन्होंने गोरखपुर के बेहाल सरकारी अस्पताल में अपनी तैनाती के दौरान इन्सेफेलाइटिस-ग्रस्त बच्चों की जान बचाने की हरसंभव कोशिश की थी! उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार डॉ कफील से सख्त नाराज़ है। ज़मानत पर वह जेल से रिहा हों, इससे पहले ही उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA)के तहत हिरासत में ले लिया गया! यूपी सहित हिन्दी भाषी राज्यों में निकट-भविष्य में जो भी सत्ता के निरंकुश और अमानवीय हथकंडों का विरोध करता पाया जायेगा, उसके साथ ऐसे ही सलूक का संकेत दिया जा रहा है!

इन दिनों ‘राजद्रोह’ यानी भारतीय दंड संहिता की धारा 124-A का भी अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है! स्वतंत्र भारत के इतिहास में ‘राजद्रोह’ के इतने मामले कभी सामने नहीं आए, जितने आज हैं! ‘राजद्रोह’ की धारा को अंग्रेजी हुकूमत ने स्वाधीनता सेनानियों और तब के स्वतंत्रता-पक्षी भारतीय लेखकों की सक्रियता पर पूर्ण पाबंदी लगाने और उन्हें उत्पीड़ित करने के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) का हिस्सा बनाया था! कैसी विडम्बना है, वही ब्रिटिश-कानून अब मौजूदा ‘मनुवादी हिंदुत्व-वादियों’ की सत्ता के काम आ रहा है! उधर, असम में अखिल गोगोई को भी कुछ महीने पहले राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जेल डाला गया था! उन्हें पहले भी ‘जन-आंदोलन की अगुवाई के जुर्म’ में NSA के तहत गिरफ्तार किया जा चुका है! इन दिनों भी असम सरकार उन्हें अपने लिए और अपनी मूर्खतापूर्ण नीति के कार्यान्वयन के लिए बहुत ख़तरनाक मानती है! इसलिए, उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरनाक क़रार दिया था! हालांकि कोर्ट ने सरकार की दलीलों को खारिज़ किया!अखिल का संगठन असम के कुछ हलकों में CAA-NRC विरोधी जन-आंदोलनों की धुरी बना हुआ है! सरकार को वह इसलिए भी ठीक आदमी नहीं लगते कि CAA-NRC विरोधी आंदोलन का वह किसानों और ग्रामीण युवाओं के बीच विस्तार करते रहे हैं!


इसी तरह, कुछ ही घंटे पहले खबर आई कि पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फैज़ल को भी पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) के तहत बंद कर दिया गया। वह पहले से ही हिरासत में हैं। अब उन पर PSA लगा दिया गया ताकि जल्दी बाहर न आ सकें! शाह फैज़ल सन् 2009 बैच के आईएएस टॉपर हैं! अब ये पढ़ने-लिखने वाले, ‘प्रतिभाशाली किस्म’ के लोग ख़तरनाक तो होते ही हैं! ये लोग मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों में भी नहीं फंसते! ऐसे लोग भला गौ-रक्षा के नाम पर हत्या, असहमत लोगों के साथ मार-पीट, माब-लिंचिंग और दंगा-फसाद जैसे ‘एसाइनमेंट’ में कहां फिट बैठते! फिर ‘राष्ट्र-द्रोही’ तो हुए नहीं! ‘मनुवादी-हिंदू राष्ट्र’ के रास्ते में बाधक!


जम्मू-कश्मीर में 5 अगस्त के बाद से अनेक कश्मीरी नेता और कार्यकर्ता जेलों में हैं। तीन-तीन पूर्व मुख्य मंत्री भी अंदर हैं! स्थानीय लोगों के प्रतिनिधियों (वे अच्छे-बुरे और योग्य-अयोग्य जो भी हों!) को अवाम, समाज और राज्य की सुरक्षा के लिए ख़तरनाक घोषित कर दिया गया है! मजे की बात कि यह सब कुछ खास सोच के लोग तय कर रहे हैं, जिनका जम्मू-कश्मीर या वहां के आम लोगों से कभी कोई आत्मीय नाता नहीं रहा! जिन दो-तीन प्रमुख लोगों के चलते जम्मू-कश्मीर का भारत में सम्मिलन हुआ, उन्हीं में एक थे-शेख मोहम्मद अब्दुल्ला! आज उनके पुत्र और पौत्र भी जम्मू-कश्मीर की अवाम और समाज की सुरक्षा के लिए ख़तरनाक क़रार दिए गए हैं!—- और यह फैसला कौन लोग कर रहे हैं? वही लोग जिन्होंने जेएनयू, जामिया, हैदराबाद युनिवर्सिटी, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टिस), आईआईटी मद्रास, मुंबई सहित न जाने कितने श्रेष्ठ शैक्षणिक परिसरों और उनके छात्रों-शिक्षकों के विरुद्ध ज़हरीला माहौल बनाने की राष्ट्रव्यापी कार्यशाला चला रखा है!
अब आप सोचिए, आप किधर खड़े हैं? बीच में खड़े रहने या बीच का रास्ता खोजने वालों के लिए अब ज्यादा वक्त नहीं है!!

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