विजय दशमी का असली नाम “अशोक विजयदशमी” है। जानिए सम्राट अशोक का छुपाया गया इतिहास!

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भारतीय लोगों के मस्तिष्क से सम्राट अशोक को बड़ी ही चतुराई और चालाकी से ब्राह्मणों ने भुला दिया है। बौद्ध धर्म अर्थात ‘समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय’ की शासन पद्धती अर्थात मानवकल्याण की समाज में व्यवस्था नष्ट करने के लए ब्राह्मणों को अशोक की यादें नष्ट करना बेहद जरुरी था। इस उद्देश्य पूर्ति के लिए उन्होंने अशोक से संबंधित दिनों को काल्पनिक राम के उत्सवों में तब्दील कर दिया। अशोक ने जिस दिन धम्मदीक्षा ली उस विजयादशमी को राम के दशहरा में बदल दिया और सम्राट अशोक के जन्म दिन को ब्राह्मणों ने  रामजन्म दिन के रुप में परिवर्तित कर दिया। ये दोनों दिन केवल भारत ही नहीं तो दुनिया के सारे देशों के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण है. अगर सम्राट अशोक ने बौद्ध ध्म्म की दीक्षा नहीं ली होती तो शायद आज दुनिया में बौद्ध धम्म नहीं दिखाई पडता। और उससे भी आगे दुनिया में “समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय” का अस्तित्व नहीं दिखाई देता, ऐसा कहना कोई अतिश्योक्किती नहीं होगी।

“अशोक विजयदशमी” महान सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध में विजयी होने के दसवें दिन मनाये जाने के कारण इसे अशोक विजयदशमी कहते हैं। इसी दिन सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी। विजय दशमी बौद्धों का पवित्र त्यौहार है। ऐतिहासिक सत्यता है कि महाराजा अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद हिंसा का मार्ग त्याग कर बुद्ध धम्म अपनाने की घोषणा कर दी थी।

बौद्ध बन जाने पर वो बौद्ध स्थलों की यात्राओं पर गए। तथागत भगवान बुद्ध के जीवन को चरितार्थ करने और अपने जीवन को कृतार्थ करने के लिए निमित्त हजारों स्तुपों ,शिलालेखो ,धम्म स्तम्भों का निर्माण कराया। सम्राट अशोक के इस धार्मिक परिवर्तन से खुश होकर देश की जनता ने उन सभी स्मारकों को सजाया-सवारा और उस पर दीपोत्सव किया। यह आयोजन हर्षोलास के साथ 10 दिनों तक चलता रहा, दसवें दिन सम्राट अशोक ने राजपरिवार के साथ पूज्य भंते मोग्गिलिपुत्त तिष्य से धम्म दीक्षा ग्रहण की।

धम्म दीक्षा के बाद सम्राट अशोक ने प्रतिज्ञा ली कि आज के बाद वो शास्त्रों से नही बल्कि शांति और अहिंसा से प्राणी मात्र के दिलों पर विजय प्राप्त करेँगे। इसीलिए सम्पूर्ण बौद्ध जगत इसे अशोक विजय दसमी के रूप में मनाता है। लेकिन कहा जाता है कि ब्राह्मणो ने इसे काल्पनिक राम और रावण कि विजय बताकर बहुजनों के इस महत्त्वपूर्ण त्यौहार पर कब्ज़ा कर लिया है। जहां तक दशहरे की बात है तो इससे जुड़ा तथ्य यह है कि चन्द्रगुप्त मौर्य से लेकर मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक बृहद्रथ मौर्य तक कुल दस सम्राट हुए।

अंतिम सम्राट बृहद्रथ मौर्य की उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने हत्या कर दी और “शुंग वंश” की स्थापना की। पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण था। इस समाज ने इस दिन बहुत बड़ा उत्सव मनाया। उस साल यह अशोक विजयदशमी का ही दिन था। उन्होंने “अशोक” शब्द को हटा दिया और जश्न मनाया। इस जश्न में मौर्य वंश के 10 सम्राटों के अलग-अलग पुतले न बनाकर एक ही पुतला बनाया और उसके 10 सर बना दिए और उसका दहन किया गया।

2500 साल के सम्राट अशोक की विरासत से जोड़ते हुए 14 अक्टूबर1956 को अशोक विजयदशमी के दिन ही बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने 5 लाख लोगों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी।

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