घोर ओबीसी विरोधी थे अटल बिहारी वाजपेयी

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By- Santosh Yadav

भारत एक मिथक प्रधान देश है। यही वजह है कि यहां 33 करोड़ देवी-देवता हैं। आये दिन इस संख्या में वृद्धि ही हो रही है। अटल बिहारी वाजपेयी को भी एक मिथक बनाने की कोशिशें की जा रही हैं। बताया जा रहा है कि किस तरह उन्होंने देश को महान बनाया। उन्हें महिमामंडित करने वालों में संघी और सवर्ण तो शामिल हैं ही, दलित और पिछड़े वर्ग के सत्तालोलूप नेतागण भी हैं। जबकि वे भी इस बात को मानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ओबीसी और अन्य वंचित तबकों के घुर विरोधी रहे।

संघी उन्हें जिन कार्यों के लिए महान बता रहे हैं उनमें एक अहम कार्य पोखरण परमाणु परीक्षण है। इसके अलावा कारगिल युद्ध की जीत का सेहरा भी उनके ही माथे पर मढ़ रहे हैं। इतना ही नहीं वे चतुर्भुज कारिडोर परियोजना को आधुनिक भारत के विकास की राह में मील का पत्थर मानते हैं।

जबकि इतिहास साक्षी है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने इस देश के ओबीसी, दलितों और आदिवासियों के साथ कैसा व्यवहार किया है। एक उदाहरण 1977 में सत्तासीन हुई मोरारजी देसाई की सरकार हश्र है। जनसंघ ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था और सरकार गिर गयी। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के कद्दावर नेता थे। क्या हुआ था उस समय? पक्षपातपूर्ण तरीके से इतिहास लिखने वाले ब्राह्मण जो आज अटल बिहारी वाजपेयी के मरने पर ढर्र-ढर्र आंसू बहा रहे हैं, उन्हें इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि क्या यह सच नहीं है कि मोरारजी देसाई सरकार द्वारा ओबीसी को आरक्षण देने को लेकर गठित मंडल आयोग के कारण ही जनसंघ ने सरकार से समर्थन वापस लिया था? क्या यह सच नहीं है कि इस बात को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को खुली चुनौती दी थी?

मंडल आयोग की अनुशंसाओं को जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने लागू किया तब वे अटल बिहारी वाजपेयी ही थे जिन्होंने सवर्णों को यह कहते हुए उकसाया था कि सरकार राज बदलना चाहती है। वह सवर्णों को पिछड़ों का दास बनाना चाहती है। उस समय जनसंघ की राजनीतिक हैसियत इतनी नहीं थी कि वह सरकार बनाने या बिगाड़ने में कोई बड़ी भूमिका का निर्वहन कर सके। लेकिन बिहार में जनसंघ यानी भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से बनी लालू प्रसाद की सरकार से समर्थन वापस लेने का आधार भी यही था कि उन्होंने ओबीसी को आरक्षण दिये जाने की पहल का स्वागत किया था।

ओबीसी समाज को उसका वाजिब हकदार मिले, अटल बिहारी वाजपेयी जबतक राजनीतिक रूप से जिंदा रहे, बाधक बने रहे। जब एचडी देवगौड़ा सरकार ने जातिगत जनगणना की बात छेड़ी तब सबसे मुखर विरोध अटल बिहारी वाजपेयी ने ही किया था। कौन भूल सकता है वह पल जब संसद में उन्होंने इसकी खुलेआम आलोचना की थी।

अटल बिहारी वाजपेयी व्यक्तिगत जीवन में क्या थे और क्या नहीं थे, ये बातें मायने नहीं रखती हैं। ओबीसी समाज के लिए तो यह महत्वपूर्ण है कि उनके लिए उन्होंने क्या किया जो उन्हें याद रखे। सरकारी नौकरियों में जबतब सवर्णों का वर्चस्व था उन्हें सेवानिवृत्ति के उपरांत मिलने वाले पेंशन से कोई नाराजगी नहीं थी। लेकिन जब मंडल कमीशन के कारण आरक्षण मिलने से ओबीसी समाज की हिस्सेदारी बढ़ी तब उन्होंने पेंशन स्कीम को ही खत्म कर दिया। ऐसा ही कुकर्म उन्होंने विनिवेश नीति बनाकर किया। देश नौरत्नों पर सवर्णों का वर्चस्व प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बना रहे, इसके लिए कौड़ियों के भाव भारत सरकार के लाभकारी उपक्रमों को बेच दिया गया।

बहरहाल, अटल बिहारी वाजपेयी का जाने का मलाल बहुजन समाज को नहीं है। आने वाली पीढ़ी हमेशा याद रखेगी कि एक ब्राह्मण प्रधानमंत्री ने शाइनिंग इंडिया के नाम पर देश को कितना मूर्ख बनाया था और ओबीसी के अधिकारों पर आजीवन कुंडली मारकर बैठा रहा।

– संतोष यादव

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