जानिए 25 साल की उम्र में कैसे महानायक बने बिरसा मुंडा, पढ़िए दिल को छू जाने वाला लेख!

अल्प जीवन काल में प्रभावी जीवन जीने के लिए विवेकानंदजी को तो याद किया जाता है पर अल्प जीवन काल में एक महान जीवन जीने का श्रेय बिरसा मुंडा को नहीं दिया जा रहा?

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कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थे,

हर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे..

कोह से नीचे उतर कर कंकरी चुनते थे…

इश्क़ में जो आबजू थे जंग में सैलाब थे…!!!!

 

-हसन नईम

मुक़द्दस = पवित्र, अस्बाब = काऱण, कोह = पर्वत, आबजू = नदी , धारा

 

आज धरती के आबा जननायक बिरसा मुंडा की शहादत का दिन (9 June 1900) है। सुगना मुंडा और करमी हातू के पुत्र बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1765 को झारखंड प्रदेश में राँची के उलीहातू गाँव में हुआ था। और इनकी तस्वीर में इनके परंपरागत पहनावे से पता भी नहीं चलता कि वे चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढे होंगे। बिरसा मुंडा का मन हमेशा अपने समाज की ब्रिटिश शासकों एवं शेठजी भटजी द्वारा की गयी बुरी दशा पर सोचता रहता था। वे ऐसे महानायक हैं, जिन्होंने शक्तिशाली दिकू अर्थात विदेशी अर्थात ब्रिटिश साम्राज्य और शेठजी भटजी जो जमींदार जागीरदार थे उनके अमानवीय शोषण के खिलाफ मुक्ति पाने के लिये उलगुलान किया; विद्रोह का नेतृत्व किया।

मूलनिवासी मुंडाओं ने सन 1895-1900 में बिरसा के नेतृत्व में मुंडारी खूंटकटी (रियासत) के अधिकार को समाप्त करने के विरुद्ध उलगुलान किया। सही मायने में देखा जाये तो बिरसा मुंडा उस समय के राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों से जन्मे महानायक थे। उनके प्रखर नेतृत्व का उभरना शेठजी भटजी द्वारा स्थापित असमानता की व्यवस्था के खिलाफ तत्कालीन समय की मांग थी। बिरसा मुंडा ने तीन महत्वपूर्ण लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उलगुलान किया।

 

प्रथम- वे जल, जमीन और जंगल जैसे संसाधनों की रक्षा करना चाहते थे।

दूसरा- नारी की यश-प्रतिष्ठा की रक्षा और सुरक्षा करना चाहते थे।

तीसरा- मूलनिवासी धर्म और संस्कृति की मर्यादा को बना कर रखना चाहते थे।

 

उनके पूर्व जितने भी विद्रोह हुए सब जमीन की रक्षा के लिए ही हुए. जबकि बिरसा मुंडा ने इन तीनों मुद्दों के लिए अपनी शहादत दी। इसीलिए ही तत्कालीन मुंडा और मूलनिवासी समाज में बिरसा मुंडा का आगमन एक राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक सुधारवादी नेता के रूप में हुआ था। इसीलिए ही आज वे लोगों के बीच ‘भगवान बिरसा’ और ‘धरती अब्बा’ (पृथ्वी पिता) के रूप में स्थापित हैं।

कहा जाता है कि वे ईसाई व वैष्णव दोनों धर्मो में दीक्षित हुए थे। लेकिन वे दोनों के भेदभाव पूर्ण एवं शोषणकारी तरीको से अवगत होने के बाद अपने ही शरना पंथ के स्थापना की और मूलनिवासी ‘सिंगबोंगा’ अर्थात एक परमात्मा अर्थात प्रकृति की पूजा करते रहे। बिरसा मुंडा के उलगुलान का सपना “अबुआ हाते रे अबुआ राईज” स्थापित करना था।

उन्होंने आंदोलनकारियों का आह्वान किया था दिकू राईज टुन्टू जना-अबुआ राईज एटे जना (दिकू राज खत्म हो गया-हम लोगों का राज शुरू हुआ)।

उनके उलगुलान के उद्घोष के चलते 24 अगस्त 1895 को चलकद से उनको गिरफ्तार किया गया। 19 नवंबर 1895 को भारतीय दंड विधान की धारा 505 के तहत दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनायी गयी। 30 नवंबर 1897 को रिहा किया गया। दूसरी तरफ तत्कालीन सरकार ने स्थानीय जमींदार व साहूकारों (शेठजी भटजी) के साथ मिलकर आदिवासियों का शोषण अमानवीय रूप से करना शुरू कर दिया था।

इन परस्थितियों को देख कर बिरसा मुंडा ने फिर से विद्रोह का रास्ता अख्तियार किया। 9 जनवरी 1900 को बिरसा मुंडा के नेतृत्व में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष में खूंटी जिला स्थित डोंबारी बुरू (Hill) आदिवासी शहीदों के खून से लाल हो गया था। निर्भयता से डंटे रहे आन्दोलनकारी सैनिकों की गोलियों से छलनी घायल हो कर एक-एक कर बिरसायइत गिरते गये। 400 से अधिक बिरसायइत मारे गये थे। डोंबारी पहाड़ खून से नहा गया. लाशें बिछ गयी. इतिहास कहता है कि खून से तजना नदी का पानी लाल हो गया था।

इस सामूहिक जनसंहार के बाद भी मुंडा समाज अंग्रेजों के सामने घुटना नहीं टेका। 3 फरवरी 1900 को रात्रि में चाईबासा के घने जंगलों से बिरसा मुंडा को गहरी नींद में सोते हुए गिरफ्तार कर लिया गया। और मेजिस्ट्रेट डब्ल्यू एस कुटुस की अदालत में बिरसा पर झूठा मुकदमा चलाया गया। बैरिस्टर जैकण ने बिरसा मुंडा की वकालत की, लेकिन अंग्रेजो की महान न्याय व्यवस्था में सब व्यर्थ गया। उन्हें रांची बंदीगृह में रखा गया। उनकी मृत्यु बंदीगृह में ही हो गयी। 9 जून 1900 को बिरसा मुंडा की मौत जेल में अंगरेजों की धीमी जहर से हुई।

केवल 25 साल की ही अल्पआयु में वे चल बसे अल्प जीवन काल में प्रभावी जीवन जीने के लिए विवेकानंदजी को तो याद किया जाता है पर अल्प जीवन काल में एक महान जीवन जीने का श्रेय बिरसा मुंडा को नहीं दिया जा रहा है यह एक वास्तविकता है। बिरसा महान योद्धा थे, महान विचारक थे, महान नेता थे, कुशल संगठक थे।

Deborah Ancona (Professor of management and organizational studies at MIT) के मुताबिक 1920 का समय “Super Bureaucracies” का था और उसके बाद 1960 में जब Interpersonal relationships के बारे में सोचना प्रारंभ हुआ तो संगठनो के structrue में बदलाव का भी प्रारंभ हुआ और संगठन में Tall Hierarchy की जगह Flatter Hierarchy की परिकल्पना साद्वश स्वरुप लेने लगी।

आपको ज्ञात हो की बिरसा की संगठन व्यवस्था में Tall Hierarchy नहीं थी। केवल तीन Layer थे. गुरु, पुराणिक, एवं ननक।

आधुनिक संचालन शास्त्र कहता है कि 1960 के बाद Flatter Hierarchy की जरूरत हुई तो बाद में उसे लागू किया गया और आज Google जैसे Organization इसी स्ट्रक्चर पे चल रहे हैं मगर बिरसा तो संगठन शास्त्र की इस आधुनिक कहे जाने वाली परिकल्पना को तो 1895 में ही आकार दे चुके थे अपने संगठन में लागू कर चुके थे।

इसी उदहारण से हमें बिरसा के महान नेतृत्वशक्ति का पता चलता है यह बात अलग है कि इस बात का उचित श्रेय उनको नहीं दिया गया। आज बिरसा मुंडा हमारे बीच सशरीर विद्यमान नहीं है पर आज वे मूलनिवासियो के बीच ‘भगवान बिरसा’ और ‘धरती आब्बा’ (पृथ्वी पिता) के रूप में स्थापित हैं।

 

कुछ ऐसा ही सन्देश देते हुए कि…

 

दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएँगे

कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएँगे

 

ऐ ख़ाक-नशीनो उठ बैठो वो वक़्त क़रीब आ पहुँचा है

जब तख़्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे

 

अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब ज़िंदानों की ख़ैर नहीं

जो दरिया झूम के उट्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएँगे

 

कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत

चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे

 

ऐ ज़ुल्म के मातो लब खोलो चुप रहने वालो चुप कब तक

कुछ हश्र तो उन से उट्ठेगा कुछ दूर तो नाले जाएँगे

 

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

 

जज़ा = Reward

ज़िंदानों = कैदखानों

हश्र = प्रलय

वीर बिरसा, जननायक बिरसा, धरती के आब्बा आपको शत शत नमन।

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