गुरु नानक ने छोटी सी उम्र से ही जातिवाद के खिलाफ लड़ाई शुरु कर दी थी।

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नई दिल्ली। गुरु नानक जी ने बहुत छोटी आयु में यह समझ लिया था कि जातिप्रथा एक शोषणकारी व्यवस्था है। उस समय में जातिभेद चरम पर थाl ऐसे समय में गुरुनानक देव ने ऊँच-नीच को बढ़ावा देने वाली जातिभेद की दीवार को सिरे से ख़ारिज किया थाl उन्होंने न केवल अस्पृश्यता का विरोध किया बल्कि पंडे-पुजारियों की भी आलोचना कीl उस समय ब्राह्मणवाद को लताड़ने का साहस कबीर, रविदास, गुरुनानक जैसे क्रांतिकारी ही कर पा रहे थेl गुरुनानक जी ने जातिवाद का घोर विरोध सिर्फ वैचारिक रूप से नहीं किया बल्कि अपने निजी जीवन में भी इस विरोध को जिया l इसी का नतीजा था कि तमाम विरोध के बाद भी उन्होंने एक एससी वर्ग के व्यक्ति भाई लालो को अपना परम सहयोगी और मित्र चुना थाl सिख धर्म में लंगर प्रथा जातिवाद खत्म करने के लिए ही शुरू की गई थी। ताकि सिख धर्म के सभी अनुयाइयों में बराबरी का एहसास हो और समानता की भावना मजबूत हो।

उनके दोहों में भी जातिभेद के विरोध की चेतना, मानवता, समानाता, आपसी भाईचारा और मानवप्रेम ही कलमबद्ध हुए हैं। गुरु नानक के दोहों से हम उनकी समस्त मानव जाति को एक समान समझने की दृष्टि को समझ सकते हैं। उन्होंने कहा है-
“अव्वल अल्लाह नूर उपाया/कुदरत ते सब बंदे, एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले को मंदे।”
गुरु नानक जी ने समस्त मानव जाति को एक ही कुदरत की संतान बताया और कहा कि एक ही पिता की संतान होने के बाद भला कोई ऊंच और कोई नीच कैसे हो सकता है।

वे कहते हैं –
‘नीच अंदर नीच जात, नानक तिन के संग, साथ वढ्डयां, सेऊ क्या रीसै।’ यानी समाज में नीच जाति में भी जो सबसे ज्यादा नीच है,नानक उसके साथ खड़े हैं, बड़े लोगों के साथ मेरा क्या काम। गुरुनानक ने न केवल जातिप्रथा का विरोध किया बल्कि वे समाज में प्रचलित सड़ी-गली मान्यताओं और कुरीतियों के भी घोर विरोधी रहेl

सिख गुरु गोबिन्द सिंह ने जातिवाद को खत्म करने के लिए अपने अनुयायियों को आदेश दिया था कि हर सिख पुरुष अपने नाम के आखिर में ‘सिंह’ लिखेगा तथा सिख महिलाएं ‘कौर’ लिखा करेंगीl लेकिन सिख धर्म को मानने वाले भी अपने गुरुओं की शिक्षाओं को भूल बैठे और ऊँच-नीच की भावना से बच नहीं सके। उन्होंने भी धीरे-धीरे ब्राह्मणवाद को अपना लियाl अब सिख अपने नाम के पीछे सेखों, खत्री, झंड , ढिल्लो, मेहता, भल्ला आदि सरनेम लगाकर खुद को तथाकथित ऊंच जाति की पृष्ठभूमि वाला, क्षत्रिय, जट आदि दिखने की अंधी होड़ में शामिल हो गए हैं। जो सच्चे सिख अनुयायी हैं वो आज भी जातिवाद को नहीं मानते।

-दिपाली तायड़े, सोशल एक्टीविस्ट

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