उपेक्षित नायक: करशनदास मुलजी…

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By: Kirti Kumar

विमर्श। जब वैष्णव समाज की बात आती है तो हमारी ज़ुबान पर एक ही नाम आ जाता है, मोहनदास करमचंद गांधी! और गांधी जी का नाम आते ही हमारे मन के रेडियो में गांधी जी की वो प्रिय धुन बजने लगती है, ‘वैष्णव जन तो तेने रे कहिए..’ लेकिन हक़ीक़त यह है कि वैष्णव जन की वेदना को करशनदास मुलजी नामक एक वैष्णव जन ने गांधीजी के जन्म से काफ़ी पहले समझा और उसे दूर भी किया। करशनदास मुलजी…यह वो नाम है, जिसने भारत के समाजिक परिवर्तन और समाज सुधार के दौर में काफ़ी सुर्ख़ियाँ बटोरी। लेकिन फिर गुमनामी के अंधेरो में खो गया या फिर उनकी अनदेखी कर उन्हें भुला दिया गया। करशनदास मुलजी भारत के समाजिक परिवर्तन और नवजागृति के इतिहास में उपेक्षित रहे। यहां तक कि महात्मा बनाए गए, ख़ुद गांधी जी द्वारा भी वैष्णव समाज के इस सपूत की घोर उपेक्षा की गई है।

 

करशनदास मुलजी का जन्म 25 जुलाई 1832 में मुंबई के एक गुजराती वैष्णव परिवार में हुआ था। माध्यमिक स्कूल तक शिक्षा प्राप्त करने वाले करशनदास को एक स्कूल में शिक्षक की नौकरी मिल गयी थी। करशनदास मुलजी शुरू से ही अपने क्रांतिकारी विचारों से ब्राह्मणवादी रूढ़िवादी परंपराओं में सेंध लगाने लगे थे.. विधवा पुनर्विवाह पर उनके विचारों के कारण उनको ज्ञाती से बाहर कर दिया गया था। सन 1855 में उन्होंने ‘सत्य प्रकाश’ नामक अख़बार शुरू किया और उसी के सहारे ब्राह्मणवाद पर हमले तेज़ किए। उन्होंने पुष्टिमार्ग़िय वैष्णव सम्प्रदाय के वल्लभाचार्यों के कुकर्मों के बारे में ‘सत्य प्रकाश’ में लिखना शुरू किया। वैष्णव सम्प्रदाय के वल्लभाचार्यों द्वारा किए जा रहे व्यभिचार और शोषण पर उन्होंने जमकर हमला बोला।

 

करशनदास मुलजी द्वारा किए गए तीखे हमले वैष्णव वल्लभाचार्य सह नहीं पाए और करशनदास को फिर से ज्ञाती से बाहर कर दिया गया। 21 अक्तूबर 1860 में करशनदास मुलजी ने अपने अख़बार, ‘सत्य प्रकाश’ में एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था, ‘हिंदुओ का मूल धर्म और वर्तमान के पाखंडी मत’ जिसके द्वारा उन्होंने वैष्णव सम्प्रदाय के वल्लभाचार्य पर व्यभिचार के भी आरोप लगाए। जिसके ख़िलाफ़ सूरत के गादीपति जदूनाथ महाराज 1860 में मुंबई गए और करशनदास मुलजी को नास्तिक क़रार दिया। साथ ही जदूनाथ महाराज ने मुंबई सुप्रीम कोर्ट में करशनदास मुलजी के ख़िलाफ़ 50,000 रुपए का मानहानि का दावा भी किया। यह केस इतिहास में ‘महाराज लायबल केस’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। जब ये केस शुरू हुआ तो महाराज ने वैष्णव समाज के लोगो पर गवाही न देने के लिए दबाव डाला। और धमकी दी कि अगर कोई उनके ख़िलाफ़ गवाही देगा तो उसे ज्ञाती से बाहर कर दिया जाएगा। इसके ख़िलाफ़ करशनदास मुलजी ने महाराज के ख़िलाफ़ गवाहों को धमकाने और न्याय में रुकावट डालने का मुक़दमा दर्ज करवाया जो ‘भाटिया कन्स्पिरसी केस (1861)’ से जाना गया। ब्रिटिश न्यायधिश सर अर्नोल्ड जोशेफ ने 12 दिसम्बर 1861 के दिन फ़ैसला सुनाया जिसमें उन्होंने महाराज को गवाहों पर दबाव डालने के जुर्म में दोषी क़रार दिया।

 

सन 1862 में जनवरी की 25 तारीख़ को ‘महाराज लायबल केस’ अदालत में शुरू हुआ। इस केस के साथ काफ़ी दिलचस्प बातें जुड़ी है। जब केस शुरू हुआ तो जदूनाथ महाराज ने यह कहकर अदालत में गवाही देने से मना कर दिया कि वे एक सम्प्रदाय के आचार्य है और लाखों की संख्या में उनके अनुयायी है! लेकिन अदालत ने उनकी यह बात का अस्वीकार किया और वल्लभाचार्य जदूनाथ महाराज को कॉर्ट में आना पड़ा। यह केस के प्रति लोगो की उत्सुकता इतनी थी कि केस सुनने के लिए अदालत के बाहर लोगों की भीड़ उमड़ती थी। यह केस के दौरान करशनदास मुलजी पर काफ़ी बार हमले भी हुए। जैसे जैसे केस चला, वैष्णव वल्लभाचार्यो के कुकर्मों का घड़ा भी फूटा और मुंबई के हर अख़बार ने इस केस से जुड़े हर पहलुओं के बारे में छापा कि किस तरह से वल्लभाचार्य द्वारा वैष्णव सम्प्रदाय के लोगो का शोषण किया जाता था। अदालत में यह क़ुबूल हुआ कि वैष्णव सम्प्रदाय के लोग वल्लभाचार्य के पैरों की धूल तक चाट जाते थे, वल्लभाचार्यों की पानी से भीगी हुई धोती को निचोड़कर पानी पीते थे। उनके द्वारा जूठे किए गए फल या उनके चबाए हुए पान और सुपारी तक खा जाते थे। यहाँ तक कि वल्लभाचार्य को सम्भोग के लिए परिवार की स्त्रियाँ तक सौंप देते थे। ये सारी बातें पुख़्ता सबूतों के साथ अदालत में पेश की गई। वैष्णव परिवार की स्त्रियों के साथ वल्लभाचार्य रासलीला खेलते थे और उसे क़रीब से देखने के लिए वैष्णवों से मोटे तौर पर पैसे भी लिए जाते थे!

 

अदालत में यह बात साफ़ हो चुकी थी कि वल्लभाचार्य द्वारा वैष्णवों का शोषण हो रहा था। मुंबई के उस वक़्त के दो मशहूर तबीब डॉ. भाऊ दाजी और डॉ. धीरजराम दलपतराम ने अदालत में अपनी गवाही में बताया की जदूनाथ महाराज सिफ़िलिस नामक रोग से ग्रस्त है। व्यभिचार के अलावा लागा के तौर पर भी वो अनुयायीयों से मोटी रक़म वसूल करते थे। और मंदिरो को अपनी अंगत मिलकत मानते थे। 22 अप्रैल 1862 के दिन इस केस का फ़ैसला सुनाया गया। जिसमें करशनदास मुलजी बाइज़्ज़त बरी किए गए। इस केस में उनको 13,000 रुपयों का ख़र्च हुआ था। अदालत ने जदूनाथ को हुक्म कर करशनदास मुलजी को 11,500 रुपए देने का हुक्म किया। ब्रिटिश भारत में किसी धर्माधिकारी पर मुक़दमा कर उसे सज़ा दिलाने का शायद यह पहला क़िस्सा था।

ख़ैर, करशनदास मुलजी की इस लड़ाई के बाद वैष्णव समुदाय का खोया हुआ आत्म सम्मान वापिस आया या नहीं वो तो नहीं कह सकते! लेकिन करशनदास मुलजी ने अपनी क़लम की ताक़त ज़रूर दिखा दी। आज भारत की समस्याओं से ज़्यादा टीवी चैनल और पत्रकार है, लेकिन क्या इन चैनलों के पत्रकारों में से कोई भी करशनदास मुलजी की तरह लिखने का जज़्बा रखता है..?

 

नोट: करशनदास मुलजी द्वारा ‘सत्य प्रकाश’ में लिखे हुए उनके मूल आर्टिकल का अनुवाद..

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