मनुस्मृति दहन दिवस: बहुजनों की ब्राह्मणों के खिलाफ महासंघर्ष की कहानी

बाबा साहेब ने आज ही दिन एक-एक पन्ना करके मनुस्मृति की किताब को फूंक दिया था

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नई दिल्ली। 25 दिसंबर 1927 यानी की आज ही के दिन बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने हमारे समाज में ऊंच- नीच, जात-पात की खाई पैदा करने वाला ब्राह्मणों द्वारा बनाया गया शास्त्र मनुस्मृति का दहन किया था। अपने समाज के लाखों लोगों के साथ बाबा साहेब ने इस काम को अंजाम दिया था। और हिंदू धर्म में जातिभेद को न मानने की शपथ दिलाई थी।

बाबा साहेब ने महाड़ तालाब के महासंघर्ष के अवसर पर खुलेतौर पर मनुसमृति जलाई थी। ब्राह्मणों के खिलाफ बहुजनों की यह सबसे बड़ी लड़ाई कही जाती है. इसलिए इसे गर्व से याद किया जाता है। बताया जाता है कि बाबा साहेब के मनुस्मृति जलाने के कार्यक्रम को नाकाम करने के लिए सवर्णों ने यह तय किया था कि उन्हें इसके लिए कोई भी जगाह न मिले लेकिन एक फत्ते खां नाम के मुसलमान ने इस कार्य के लिए अपनी निजी जमीन उपलब्ध कराई थी। उन्होंने यह भी रोक लगा थी दी कि आंदोलनकारियों को स्थानीय स्तर पर खाने पीने और जरुरत की दूसरी कोई भी चीज न मिल सके। जिसकी वजह स सभी वस्तुएं बाहर से ही लानी पड़ी थी।

आंदोलन में भाग लेने वाले स्वंय सेवको को इस अवसर पर पांच बातों की शपथ दिलाई गई थी।

1.मैं जन्म चतुवर्ण में विश्वास नहीं रखता हूं

2. मैं जातिभेद में विश्वास नहीं रखता हूं

3. मेरा विश्वास है कि जातिभेद हिंदू धर्म पर कलंक है और मैं इसे खत्म करने की कोशिश करुंगा,

4. यह मानकर कि कोई भी ऊंचा नीचा नहीं है मैं कम से कम हिंदूओं में खान पान में कोई प्रतिबंध नहीं मानूंगा

5. मेरा विश्वास है कि बहुजनों का मंदिर, तलाब और दूसरी सुविधाओं में समान अधिकार है।

बताया जाता है कि बाबा साहेब इस कार्यक्रम में दासगाओं बंदरगाह से पद्मावती बोट से आये थे क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं बस उन्हें ले जाने से इनकार न कर दें। पिछले दो दिन से ही इस कार्यक्रम की तैयारियां चल रही थीं। 6 आदमी इसे तैयार करने में लगे हुए थे। एक गड्डा जो 6 इंच गहरा और डेढ़ फुट वर्गाकार खोदा गया था जिस में चन्दन की लकड़ी रखी गई थी। इसके चार किनारों पर चार पोल गाड़े गए थे जिन पर तीन बैनगर टांगे थे। जिन पर लिखा था…

1.मनुस्मृति दहन स्थल

2. छुआ-छूत का नाश हो

3. ब्राह्णवाद को दफन करो।

25 दिसंबर 1927 को 9 बजे इस पर मनुस्मृति को एक एक पन्ना फाड़ कर डॉ अंबेडकर, सहस्त्रबुद्धे और दूसरे 6 बहुजन साधुओं ने जलाया था। और तबसे आज तक बहुजन समाज के लोग इस दिन को याद करके मनुस्मृति का दहन करते हैं।

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