भारत में #Me Too अभिजात्य वर्ग का गेम है…

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By-Dr Jayant Chandrapal

आम समाज केवल प्रेक्षक है, आपको बता दें कि भारत के बाहरी मामलों (External Affairs) के मंत्री एम. जे. अकबर उर्फ़ मोबासर जावेद अकबर भी अब इस अंतर्राष्ट्रीय अभिजात्य गेम #MeToo में शामिल कर लिए गए है। और इस तरह से वे अपने ही आंतरिक मामलों (Internal Affairs) को सम्हालने में उलझ गए है।

इसके पहले बॉलीवुड के नाना भी किसी को पटाकर एक लफड़े में इस गेम में अपना नामांकन करवा चुके है और अपने ही कद को नाना (गुजराती अर्थ “छोटा”) कर चुके है। और भी सेलिब्रिटीज है जैसे की आलोक नाथ, सुभाष घई, अभिजीत भट्टाचार्य, साजिद खान, कैलाश खेर, पीयुष मिश्रा, तन्मय भट्ट, विकास बहल, रजत कपूर के सारे काले करतूतों का पर्दाफाश हो चुका है। इतना ही नहीं #Me Too कैपेंन ने बॉलिवुड के साथ-साथ राजनीति एवं पत्रकारिता को भी अपने दायरे में ले लिया है इसीलिए राजनेता एवं मिडिया किंग के नाम भी शामिल हो रहे हैं।

इस कड़ी में नया नाम वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ का है जिनपर निष्ठा जैन नाम की एक फिल्ममेकर ने यौन शोषण का आरोप लगाया है। एक समाचार चैनल को मेनका गांधी ने बिलकुल सही कहा है कि, ” ताकतवर पदों पर बैठे पुरूष अक्सर ऐसा करते हैं. यह बात मीडिया, राजनीति और यहां तक कि कंपनियों में वरिष्ठ अधिकारियों पर भी लागू होती है.”

 

यह अभिजात्य गेम क्यों है…? क्योंकि इसमें भारत का अभिजात्य वर्ग शेठजी-भटजी जो शामिल है… जो इस गेम के नाम पर अपने परम धर्म का पालन जो कर रहा है। यह वह वर्ग है जो कि दामिनी के नाम पर मोमबत्तिया तो जला लेता है वहीँ डेल्टा-जीशा के मुद्दों पर चुप्पी भी लगा लेता है। अब समाज में आया यह अभिजात्य गेम क्यों है…?

वैसे भारत के लिए यह कोई नया गेम नहीं है बहुत पुराना है और शास्त्रोक्त भी, यकीन नहीं आता तो स्मृति-श्रुति उठाकर देख लीजिये। इसीलिए अगर इस गेम की कड़ियों को जरा अतीत के साथ जोड़ कर देख लें तो बहुत ही भयानक चित्र उभरकर आएगा और फिर तो। इसकी ज़द में एम. जे. अकबर के साथ ही हज़ारों हरमवालियों के ऐय्याश बादशाह जे. एम. अकबर उर्फ़ जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर उर्फ़ महान अकबर, जिनको गौ ब्राह्मण प्रतिपालक कहते हुए वाराणसी के ब्राह्मणों ने विष्णु अवतार घोषित किया था और ग्यारह हज़ार श्लोक वाला अल्लाहोपनिषद लिखा गया उस मुग़ल सम्राट अकबर को भी शामिल करना पड़ेगा।

पटरानी के साथ दस, बीस, पचास, सौ, हजारों रानियां रखने वाले राजाओं के नाम भी शामिल करने पड़ेंगे। केवल सत्ताधारी ही क्यों? देवदासी प्रथा के नाम पर मंदिरों-मठों में दुराचार कर रहे उन धर्माधिकारी-मठाधीश पंडो के नाम भी शामिल करना चाहिए यह बात अलग है कि यहाँ हैशटैग #MeToo से बदलकर #WeToo और #TheyToo करना पड़ेगा।

 

सत्य के प्रयोगों के नाम पर साथी महिलाओं के साथ नग्न सोने वाले मोहनदास करमचंद गाँधी का नाम भी शामिल करना चाहिए।  जब गाँधी को शामिल कर लिए तो फिर नेहरु, नारायणदत्त, सिंघवी का नाम शामिल करने में क्या हर्ज़ है? लेकिन अफ़सोस कि इस अंतर्राष्ट्रीय अभिजात्य गेम #MeToo में सिर्फ़ अभिजात्य महिला-पुरुष ही शरीक़ हो रहे हैं। अगर मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों को शरीक किया जाय तो भारतीय संस्कृति का ब्युगल ही बज जाएगा। मगर उनको इजाजत नहीं है यह जो अभिजात्य वर्ग है।

उनका वर्ग-चरित्र पूरी दुनियां में एक समान ही होता है, उनके शौक, उनकी फ़ैशन, उनकी मानसिकता, उनकी सोच, उनके तौर तरीके एक से ही होते हैं। यदि  “Kiss of love” और “My body, my choice” तथा “Live in” का ट्रेंड यूरोप और अमेरिका से चलता हैं तो मान लीजिये यह ट्रेंड एक फ़ैशन के रूप में भारत के अभिजात्य वर्ग का परम धर्म बन ही जाएगा। इसे ही तो संस्कृतिकरण कहते है। हॉलीवुड से शुरु हुआ यह “#MeToo” वाला ट्रेंड दूसरे तमाम विदेशी फ़ैशनों की तरह अभिजात्य वर्ग के लिए परम धर्म का पालन मात्र है।

इस अभिजात्य गेम के तीन महत्वपूर्ण पात्र है, शिकार, शिकारी और गिद्ध. गिद्धों का झुंड ताक में रहता है बोटी नोंचने के लिए इस गेम में शिकार और शिकारी को तो हर कोई देख लेता है मगर मंडराता हुआ गिद्धों का झुंड शायद ही कोई देख पाता है। यह मंडराता हुआ गिद्धों का झुंड कोई और नहीं बल्कि मीडिया है जो हार्वी वाइंस्टीनो से भरा पड़ा है वह चीखते हुए एंकरों को लेकर इसकी मार्केटिंग करते हुए बोटियां (विज्ञापन) नोचने का काम करता है।

 

गौरतलब है की भारत में सहमति पूर्ण संबंधों, Live in संबंधों, समलैंगिक संबंधों, विवाहेत्तर संबंधों को संवैधानिक मान्यता देने-दिलवाने के बाद MeToo का आना कोई आश्चर्यजनक नहीं है। मगर सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि क्या सिर्फ़ क़ानून बनाकर, शोरगुल मचाकर, #MeToo लिखकर और नारी-शोषण पर भीषण-भाषण झाड़कर नारियों की अस्मिता की रक्षा की जा सकती है…?

सवाल यह भी उठता है कि कहीं अभिजात्य बुद्धिजीवी #MeToo जैसे अभिजात्य खेलों के माध्यम से जन सामान्य को अपने स्वाभाविक मूलभूत मुद्दों से तो नहीं भटका रहा? सवाल यह भी उठता है कि कहीं सत्ताधारी अपनी नाकामियों से लोगों का ध्यान हटाने का काम तो नहीं कर रहे? कहीं #MeToo के नाम पर बिज़नेस तो नहीं हो रहा?

ऐसे कई सवाल उठ रहे है। मुझे नहीं लगता कि इस अभिजात्य गेम चलने के पीछे समाज में सुधार लाने की कोई मंशा है। अभी तो शिकार और शिकारी ही परदे पर नज़र आ रहे है आगे इसमें सौ चूहे गटक चुकी पैसाख़ोर-शोहरतख़ोर शातिर बिल्लियाँ भी खेलने उतरेंगी। इसलिए #MeToo का नया अभिजात्य गेम भी बलूव्हेल गेम की ही तरह ढेरों राजनीतिक व्यक्तित्व और चरित्र की हत्याएं करेगा। बाक़ी मुल्क़ की 99% वास्तविक शोषित-पीड़ित बहुजन महिलाओं को तो शायद ही इस गेम के नाम और रूल्स पता चलें।

इससे तो बेहतर होता कि नारी-शोषण रोकने हेतु सख़्त क़ानून, नारी शिक्षा और जागरूकता के साथ ही देश के युवक-युवतियों को चरित्र-निर्माण की शिक्षा पर भी ज़ोर दिया जाता। उन सारे रीति-रिवाजों जो की धर्म की आड़ में चल रहें है उनको गैर कानूनी घोषित किया जाता। इससे तो बेहतर होता कि महिला आरक्षण को प्रतिनिधित्व के सशक्त सिद्धांत के रूप में कार्यान्वित किया जाता। संविधान प्रदत्त समता, बंधुता स्वतंत्रता एवं न्याय आधारित भारत का राष्ट्रनिर्माण किया जाता।

मैं इस #Me Too कैम्पेन के विरुद्ध नहीं हूं बल्की मैं तो कहता हूँ कि #MeToo की अंतर्राष्ट्रीय ख़्याति देखते हुए अब #SheToo और #HeToo तथा #YouToo जैसे मेक इन इण्डिया हैशटैग भी होने चाहिए, सामूहिक वाले मामलों के लिए #WeToo और #TheyToo जैसे हैशटैग चलने चाहिए। और इन शारीरिक छेड़खानी के लिए ही क्यों? सदियों से जो मानसिक छेड़खानी बहुजन समाज के साथ की जा रही है उसके लिए भी कुछ तो हैशटैग चलने ही चाहिए।

सन्दर्भ सूची संतासुर

#MeToo मूवमेंट मे क्या हम (# WeToo )शामिल है? बहुजन महिलाओं का ब्राह्मण सवर्ण महिलाओं से यह सवाल!

Dr. Manisha Bangar https://www.facebook.com/profile.php?id=100004202117248

अम्बेडकरवादी कुश https://www.facebook.com/profile.php?id=100005999115254

https://hindi.thequint.com/…/indias-me-too-campaign-gets-moment

www.drishtiias.com/hindi/general…/what-is-the-me-too-campaign

https://hindi.filmibeat.com 

 

-Dr Jayant Chandrapal

 

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