#MeToo अभियान की सवर्ण महिलाओं को डॉ रामकृष्ण के इन प्रासंगिक सवालों का जवाब देना होगा!

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भारतीय समाज में महिलाओं को कमजोर समझे जाने की मानसिकता के चलते आज भी पुरुषवादी सोच उन पर हावी है और उसी सोच के चलते महिलाओं के साथ शोषण बदस्तूर जारी है। लेकिन महिलाओं के उत्पीड़न का यह दौर कोई नया नहीं है, इसका बहुत लंबा इतिहास रहा है। यह उस मनुवादी और ब्राह्मणवादी व्यवस्था का नतीजा है जिसका महिलाओं ने भी कभी खुलकर विरोध नहीं किया है। आज जब मीटू कैंपेन के जरिए महिलाएं खुद को सशक्त और मजबूत महसूस कर रहीं है तो हमें कवयित्रि महादेवी वर्मा द्वारा लिखी एक कविता याद आती है…जिसमें वो लिखती हैं….

 

मै हैरान हूं यह सोचकर

किसी महिला ने उंगली नहीं उठाई,

तुलसीदास पर जिसने कहा:-

“ढोल,गवार, शूद्र, पशु, नारी

सब है तड़न के अधिकारी।

 

मै हैरान हूं यह सोचकर

किसी औरत ने नहीं

जलाई मनुस्मृति

जिसने पहनाई

उन्हें गुलामी की बेड़ियां।

 

मै हैरान हूं, यह सोचकर

किसी औरत ने धिक्कारा नहीं

उस “राम” को

जिसने गर्भवती पत्नी को

अग्नि परीक्षा के बाद भी

निकाल दिया घर से बाहर

धक्के मारकर

 

मै हैरान हूं यह सोचकर

किसी औरत ने

नहीं किया नंगा, उस कृष्ण को

चुराता था जो नहाती हुई

बालाओं के वस्त्र

योगेश्वर कहलाकर भी

जो मनाता था रंगरलियां

सरे आम!

 

किसी औरत ने लानत नहीं भेजी

उन सबको, जिन्होंने

औरत  को समझकर “वस्तु”

लगा दिया, जुए के दांव पर

होता रहा जहां “नपुंसक”

योद्धाओं के बीच

समूची औरत  जात का चीर_हरन!

 

में हैरान हूं ये सोचकर

किसी महिला ने नहीं किया

संयोगिता_अंबालिका के

अपहरण का विरोध

आज तक!

 

और मैं हैरान हूं ये सोचकर,

क्यों इतना होने के बाद भी,

उन्हें अपना श्रद्धेय मानकर

पूजती है मेरी मां, बहन, बेटियां

उन्हें देवता भगवान मानकर

आखिर क्यों?

 

मै हैरान हूं

उनकी चुप्पी देखकर

इसे उनकी सहनशीलता कहूं या

अंध श्रद्धा या फिर

मानसिक गुलामी की  परिकाष्ठा!

 

-डॉ रामकृष्ण

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