उच्च शिक्षा: सवर्णों के पक्ष में केंद्र सरकार नहीं लायेगी अध्यादेश

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-संतोष यादव

केंद्र सरकार विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर सवर्णों के पक्ष में अब खुल्लम खुल्ला उतर गई है। यही वजह है की वाह अध्यादेश लाने से इंकार कर रही है जिसके लागू होने से इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा विश्वविद्यालयों में विश्वविद्यालय के बजाय विभाग को इकाई मानकर आरक्षण का रोस्टर बनाने संबंधी आदेश पर पूर्ण विराम लग जाता। अध्यादेश का लाभ बहुजन समाज  के अभ्यर्थियों को मिलता जैसा कि 5 मार्च 2018 के पहले था। लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के आधार पर यूजीसी द्वारा अधिसूचना जारी किए जाने के बाद इस पर ग्रहण लग गया था। इसके बाद देश के सभी हिस्सों में आरक्षित वर्ग के बुद्धिजीवियों ने सवाल खड़ा किया तब केंद्र सरकार की नींद खुली और उसने इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दायर कर दी। एक पुनर्विचार याचिका यूजीसी द्वारा भी दायर की गई। साथ ही उसने 20 अप्रैल 2018 को एक दूसरा अधिसूचना जारी कर विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया कि वे पूर्व के मुताबिक यानी विभाग के बजाय विश्वविद्यालय को इकाई मान कर शिक्षकों की नियुक्ति कर सकते हैं।

लेकिन अनेक विश्वविद्यालयों ने यूजीसी के निर्देश को दरकिनार कर दिया। मसलन केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा द्वारा यूजीसी के निर्देश के बावजूद विभाग बार नियुक्तियों के लिए विज्ञापन निकाले गए। ऐसा पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट एक फैसले के बाद किया गया। विश्वविद्यालय द्वारा कुल 28 पदों के लिए नियुक्ति की गई और सब के सब सामान्य श्रेणी के थे। झारखंड में भी इसी तरह 1118 पदों के लिए विज्ञापन निकाले गए। हालांकि राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने बहाली की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है।

पहले यह उम्मीद जताई जा रही थी की केंद्र सरकार एक अध्यादेश लाकर दलितों आदिवासियों और पिछड़ों के पक्ष में फैसला लेगी। इसके लिए वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार नहीं करेगी। यहां तक कि अध्यादेश के प्रारूप को मंत्रालय से प्राथमिक तौर पर स्वीकृति भी दे दी गई थी। लेकिन अब केंद्र सरकार इससे बचना चाह रही है। बीते बुधवार को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने साफ कहा की सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करेगी। उन्होंने अध्यादेश लाने की संभावना से पूरी तरह इनकार किया।

बहरहाल केंद्र सरकार के रवैये में यह बदलाव कई संकेत देते हैं। पहला तो यह कि सरकार सवर्णों को नाराज नहीं करना चाहती है। देश के 5 राज्यों में चुनाव सामने है, इसलिए भी उसने उच्च शिक्षा में आरक्षित वर्गों की हिस्सेदारी सवर्णों को देकर उन्हें खुश करना चाहती है जो एससी-एसटी एक्ट संशोधन कानून बनाए जाने से नाराज हैं और देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

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