कोविंद को धकियाया जाना आपत्ति से ज्यादा सीखने का मुद्दा है…

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-Deepali Tayday

भारतीय समाज में बहुजनों की कितनी औकात है ये बताती है यह सारी घटनाएं। तुम चाहे तलवे चाट-चाट कर राष्ट्रपति, मंत्री, संत्री, फलाना-ढिमका कुछ भी बन जाओ, लेकिन यहाँ तुम कहलाओगे नीच ही। नीच होने के कारण जो भौकाल एक ब्राह्मण का है तुम्हारा राष्ट्रपति बनके भी नहीं इसलिए एक अदना सा पंडा भारी पड़ा। फिर चाहे वो जगन्नाथपुरी का मंदिर हो, या पुष्कर का…..आगे और मट्टी-पलित करानी हो तो दक्षिण के मंदिरों में जाइये वहाँ और स्पेशल ट्रीटमेंट मिलेगा।

कोविंद नहीं भारत के सभी बहुजनों जो कि अभी भी हिंदू धर्म को छाती से चिपटाये बैठे हैं उनके लिए सबक है ये। उन लोगों को जवाब भी, जो कहते हैं आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए, क्योंकि कोविंद के साथ यह सब आर्थिक आधार पर नहीं जातिगत आधार पर हुआ। ये जवाब है उन लोल सलाम वालों के लिए भी जो अमीरी-गरीबी का चक्कर बता कर वर्ग की बात करते हैं वर्ण की नहीं। और अठावले, उदितराज, रामविलास पासवान, मायावती आदि बहुजन नेताओं के नाम पर छाती पीट-पीट कर हम बहुजनों को गरियाते हैं, उन्हें यह नहीं समझ आता कि कुछ भी बन जायें इनकी बहुजन होने की पहचान और उससे जुड़े विद्वेष से मुक्ति नहीं मिलती इन्हें।

सारे मामले का सबक-

  1. बहुजन हिंदू नहीं हैं। औऱ जो अब भी हिंदू धर्म नहीं छोड़ रहें हैं वो भी समझ लें अपनी औक़ात। वरना हरिजनों तुम्हारी कमर में झाड़ू और गले में हंडी लटकनी तय है। हम बौद्धिस्ट मरे भी तो शान से शहीद होंगे।
  2. पण्डे तुम्हे मंदिरों में आने से नहीं रोके बल्कि तुम मंदिर और ब्राह्मणों दोनों को त्याग दो। मंदिर केवल ब्राह्मणों का मनरेगा है। तुम मंदिर जाना बंद करोगे तो कुछ पैसे जुड़ेंगे कम से कम बच्चों को ढंग का खाना खिला सकोगे।
  3. हिंदू धर्म छोड़ कर अपने बाबासाहेब का दिखाया हुआ बौद्ध धम्म स्वीकार करें प्रज्ञा-शील-करुणा के मार्ग पर चलते हुए अपना दीपक स्वयं बनें। शिक्षित होकर, अपने हक़ों के लिए संघर्ष करो और आंदोलन के लिए संगठित होना सीखो। ये सुनिश्चित कर लें आप, आपका परिवार और अगली सात पुश्तें धर्म के चुंगल में ना फँसे।
  4. मंदिर,पंडे उस जैसी कोई भी संरचना ट्रस्ट या चैरिटी में अपना एक रूपपल्ली भी ख़र्च ना करें। ब्राह्मण तुम्हारे टुकड़ों पर पलकर ही तुमको अब तक डसते आएँ हैं, कम से कम अब आगे ऐसे ना हो।
  5. ब्राह्मणीय संरचना से यथासंभव अलगाव रखें क्योंकि वो लोग इस लायक नहीं है उन्हें इंसान माना जाए। ब्राह्मणों के धर्म के गुलाम बनने से कई गुना बेहतर है मरना।

इस घटना को बहुजन क्रांति के लिए एक अच्छा संकेत माने और नई शुरुआत कीजिये।

क्रांतिकारी जयभीम

 

लेखक- दिपाली तायड़े

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