प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम नहीं, जानिए क्या है साजिश?

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By: Deepali Tayday

नई दिल्ली। दरअसल अब तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण पर बंबई, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अलग-अलग निर्णय दिए हैं। जब ये मामले हाईकोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचे तो सुप्रीम कोर्ट की अलग-अलग बेंचों ने अलग-अलग मामलों में अलग-अलग तरह के निर्णय दिए। इस तरह प्रमोशन में आरक्षण पर कोई एक पुख़्ता फैसला नहीं हो सका है। यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने कल एससी-एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण को मौखिक सहमति दे दी। उसका साफ कहना है कि “जब तक संविधान पीठ इस बारे में कोई फैसला नहीं करती तब तक केंद्र सरकार उपलब्ध कानून के अनुसार आरक्षण पर आगे बढ़ सकती है। इस मामले पर आगे विचार किया जाना लंबित रहने तक पुरानी व्यवस्था लागू रह सकती है और यह अगले आदेश तक जारी रहेगी।” तो कल हुए निर्णय को अंतिम नहीं माना जा सकता क्योंकि अभी भी इस मामले की गेंद में सुप्रीम कोर्ट के पाले में है।

फिलहाल के लिए तो प्रमोशन में आरक्षण मिलेगा। यह मिलना भी चाहिए क्योंकि इन वर्गों का प्रतिनिधित्व सरकारी सेवाओं में कम है। जो प्रतिनिधित्व है भी तो वह तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी में ज्यादा है, इसके ठीक विपरीत ऊँचे पदों पर इनकी उपस्थिति बेहद कम है। सचिव या राजनयिक स्तर पर तो इनकी मौजूदगी ढूंढे से भी नहीं मिलेगी। देश और सभी राज्यों की कार्यपालिका के शीर्ष पदों पर आपको ब्राह्मण-सवर्ण ही बैठे मिलेंगे। सरकारी सेवाओं में आ जाने के बाद भी इन वर्गों के कर्मचारियों को घोर जातिवाद का सामना करना पड़ता है क्योंकि सरकारी सेवाओं में सवर्ण वर्गों की लॉबिंग और दबदबा बहुत मजबूत है। ऐसे में इस वर्ग के कर्मचारी अपने कोटे से होने की वजह से घृणा का पात्र बनते हैं ना ही उनकी योग्यता को स्वीकारा जाता है और ना ही वे नीतिगत स्तर की भूमिका में आ पाते हैं।

संविधान का अनुच्छेद 16(4ए) राज्य को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को पदोन्नति के मामले में आरक्षण देने में सक्षमता प्रदान करता है, बशर्ते राज्य यह मानता हो कि सेवाओं में उन समुदायों का प्रतिनिधित्व नहीं है। इस रूप में प्रमोशन में आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है। इस संदर्भ में राज्य संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप निर्णय ले सकता है परन्तु प्रमोशन में आरक्षण मिलने यानि 1992 के बाद से ही सवर्णों ने इस मामले को कोर्ट में लगातार चुनौती दी है।

आपको बता दूँ कि तमाम कोशिशों के बाद भी प्रमोशन में आरक्षण बिल अब संसद में अटका हुआ है। इसे लेकर भी मौजूदा सरकार ने कोई रुचि नहीं दिखाई है। बल्कि कांग्रेस सरकार के समय वर्ष 2012 में जब यह बिल संसद में रखा गया तो खूब हंगामा हुआ। प्रमोशन में आरक्षण बिल, राज्यसभा में पारित किए जाने का सवर्णों और ओबीसी वर्ग ने तीखा विरोध किया था, यहाँ तक कि समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम जी ने सरकार से समर्थन वापसी की धमकी भी दी और सदन से वॉकऑउट भी किया था।

अभी सुप्रीम कोर्ट सरकार के हिसाब से चल रही है इसलिए हो सकता है ऐसे निर्णय 2019 के चुनावों को ध्यान में रखकर किये जा रहें हैं। आगे यह फैसला बदला भी जा सकता है। ठीक वैसे ही जैसे एससी-एसटी एट्रोसिटी एक्ट मामले में हुआ। हालाँकि आपकी मांग यह भी होनी चाहिए कि प्रमोशन में आरक्षण बिल संसद से पारित हो और पूरे देश में लागू हो। लेकिन सरकारें इस मामले पर चुप्पी लगाती आईं हैं।

नोट: यह लेख हमें दिपाली तायड़े ने भेजा है जो बहुजन समाज के मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखती है. साथ ही इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी के लिए नेशनल इंडिया न्यूद उत्तरदायी नहीं है।।

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