प्रोफेसर पर हमला, जातिवादी संकीर्ण सोच का खतरनाक परिचय

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By-Rajeev Suman

महात्मागांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, में आज लगातार जिस तरह से एक प्रोफ़ेसर को एक ख़ास विचार वाले लोगों और छात्र समूह द्वारा ट्रोल किया जा रहा है वह बेहद शर्मनाक और निंदनीय है। यह चिंतनीय भी है कि वर्तमान राजनीति और सत्तारूढ़ पार्टी के वैचारिक रूप से कुंद और कुपोषित कार्यकर्ता और छात्र इकाई से जुड़े विद्यार्थी जिस तरह से विश्वविद्यालयों के बौद्धिक विमर्श के स्पेस को संक्रमित और संकुचित कर रहे हैं उसे किसी भी लिहाज से लोकतांत्रिक संस्थानों और अभिव्यक्ति के स्थलों के लिए स्वास्थ्यकर नहीं कहा जा सकता।

मुझे आज भी याद है कि जेएनयू जैसे सर्वोच्च संस्थान में देशभक्ति के नाम पर आसपास के गाँव के लोग वहाँ के प्रोफेसरों को देशभक्ति और राष्ट्रवाद का विमर्श समझाने लगे थे। अचानक से कुकुरमुत्तों और टिड्डियों की फ़ौज की तरह ये देशभक्त घर-घर से पैदा हो गए और देशभक्ति और राष्ट्रवाद के विमर्श को गो पूजन, मुस्लिम, दलित और अल्पसंख्यक उत्पीडन के रूप में बदल दिया। यही हाल देशभर के तमाम विश्वविद्यालयों में दुहराया जाने लगा है।

हालिया घटनाक्रम में वर्धा विश्वविद्यालय के अनुसूचित जाति एवं जनजाति अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रोफ़ेसर एल. कारुण्यकरा को इस बात के लिए ट्रोल किया जा रहा है कि उन्होंने दिवंगत प्र.मं अटल बिहारी वाजपेयी पर आलोचनात्मक तरीके से अपनी बात रखी। उन्होंने उनके प्रधानमंत्रित्व काल और एक राजनेता के रूप में उनके नीतियों और ऐतिहासिक भाषणों और बहुजन समाज पर उसके नकारात्मक प्रभावों को रेखांकित करनेवाले तथ्यात्मक बातें रखीं।

लेकिन विद्यार्थी वेश में कुछ भक्तों को यह नागवार गुजरा और आज सुबह से ही उन्हें लगातार ट्रोल किया जा रहा है, भद्दी-भद्दी गालियाँ दी जा रही हैं, जान से मारने की धमकी दी जा रही है. तो सवाल यह बनता है कि आखिर प्रोफ़ेसर विश्वविद्यालयों में करें क्या? क्या वे शिक्षण का मूल कार्य छोड़ दें। लेकिन अगर उन्होंने ऐसा करना शुरू कर दिया तो फिर देश का बौद्धिक विकास असमय कालकलवित हो जाएगा और देखते ही देखते लोकतांत्रिक मूल्यों का समापन भी। तो फिर सवाल यहाँ यह है कि इन धार्मिक अफीम से ग्रसित इन कमज़ोर बौद्धिक छात्रों को कैसे तार्किक और विवेकवान बनाया जाए। ये इतने दिन-हीन हैं कि इनपर कोई पाठ असर नहीं होता।

जातिवादी संकीर्णता और ब्राह्मणवादी वाइरस इनको इनके जन्मदाता के यहाँ से ही इनके जन्म के साथ अनुगत हुआ है। जिनके अन्दर ये वाइरस सुसुप्तावस्था में थे उन्हें भी संघ, भाजपा और उनकी सहायक संस्थाओं ने जागृत कर दिया है। अब शिक्षकों के रूप में भी ये सक्रीय हैं. लेकिन हमें डरने की आवश्यकता बिलकुल नहीं है। इसका जो एकमात्र उपाय है वह हमलोगों के पास ही है–बुद्ध, बिरसा, फुले और अम्बेडकर के विचारों के साथ लैस हुआ जाए और लोगों को लैस किया जाए।

लेकिन अम्बेडकरवादी बहुजन प्रोफ़ेसर कारुण्यकरा से अनुरोध है कि जिस तरह से उन्होंने दरोगा कुलपति को माफ़ किया था वैसे ही इन विद्यार्थियों को भी माफ़ करें क्योंकि वे मानसिक रूप से विकारों से ग्रस्त हैं और साथ ही, इन कमज़ोर वर्ग के लोगों पर विशेष ध्यान दें और उन पर अधिक मेहनत करें। आपके इस काम में हम सब आपके साथ हैं पूर्णत।.

-राजीव सुमन

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