ओबीसी के अंदर क्यों नहीं है छटपटाहट?

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By- संतोष यादव

इतिहास साक्षी है इस बात का कि अपने हक-अधिकारों के लिए जितना भारत के अनुसूचित जाति के लोग जागरूक रहे हैं, उतना पिछड़ा वर्ग के लोग नहीं रहे। यह जागरूकता तब भी नहीं थी जब देश में अंग्रेज शासक थे। जोतिबा फुले जैसे महान समाज सुधारक से मिली विरासत को भी पिछड़ा वर्ग संभाल नहीं पाया। वहीं बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने द्विजों की सत्ता को नकारते हुए समाज के अंतिम पायदान पर रह रहे लोगों के लिए संघर्ष किया। जबकि उन दिनों ही देश की राजनीति में ओबीसी समाज के कई कद्दावर नेता कांग्रेस की द्विजपरक राजनीति के हाथों की कठपुतली बने रहे। इनमें सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाम निस्संकोच लिया जा सकता है। फिर चाहे वह आरक्षण का सवाल हो या फिर हिंदू बिल कोड।

कल्पना करिए कि आजादी के पहले देश के ओबीसी समाज के नेताओं में अपने समाज के लिए थोड़ी सी भी संवेदनशीलता होती तो क्या भारतीय संविधान में ओबीसी को अपने अधिकार के लिए करीब 40 वर्षों का इंतजार करना पड़ता? चालीस वर्षों के बाद जो मिला है, वह अपने आप में एक विचारणीय प्रश्न है। मंडल कमीशन की अनुशंसा के लागू होने के बाद 54 फीसदी से अधिक आबादी वाले ओबीसी वर्ग को केवल 27 फीसदी आरक्षण। उच्च शिक्षा में प्रवेश का अधिकार तो करीब डेढ़ दशक के बाद ही मिल सका। विचारणीय यह भी है कि इस बीच अदालत ने क्रीमीलेयर का रोड़ा ओबीसी की राह में अटका दिया।

जो मंडल आयोग के लागू होने के बाद की राजनीति को जानते हैं, वे इस बात को समझते हैं कि देश के कई राज्यों में पिछड़े वर्ग के लोगों की सरकारें अस्तित्व में आने की वजह केवल मंडल आयोग की अनुशंसा का लागू किया जाना नहीं था। मसलन बिहार में ही सतीश प्रसाद सिंह(कुशवाहा), बी पी मंडल(यादव), कर्पूरी ठाकुर(नाई), दारोगा प्रसाद राय(यादव) मुख्यमंत्री बन चुके थे। अनुसूचित जाति से संबंध रखने वाले भोला पासवान शास्त्री और रामसुन्दर दास को भी सीएम की कुर्सी पर बैठने का सौभाग्य मंडल कमीशन के लागू होने के पहले ही मिल चुका था। उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी रामस्वरूप वर्मा से लेकर मुलायम सिंह यादव तक अपनी पैठ जमा चुके थे।

यानी एक बात तो साफ है कि ओबीसी में जागरूकता पहले ही आ चुकी थी। आजादी के पहले त्रिवेणी संघ के प्रयासों को भला कौन झुठला सकता है। यादव, कोईरी और कुर्मी जाति के लोगों का यह संगठन अपने पहले राजनीतिक प्रयास(1935 में हुआ अंतरिम चुनाव) में भले ही असफल रहा था लेकिन सामाजिक स्तर पर इसके प्रभाव का फलक बहुत बड़ा था। आजादी के बाद भी राष्ट्रीय स्तर पर डॉ. राममनोहर लोहिया ओबीसी समाज के महान नायक के रूप में स्थापित हुए। उन्हें तो ओबीसी समाज अपना अांबेडकर भी मानने लगे थे। उन्होंने यह नारा भी दिया था – पिछड़ा पावे सौ में साठ। उनकी सप्तक्रांति का मूल भी यही था। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि ओबीसी के हक अधिकार नारों की गूंज में दबते चले गये?

इससे पहले कि इन सवालों पर विस्तार से चर्चा करें, एक हाल की घटना पर नजर डालते हैं। बीते 23 अगस्त 2018 को एम नागराज मामला(2006) के तहत सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने बड़ी बात कह दी। संविधान पीठ ने पदोन्नति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण देने के लिए राज्य को बाध्य नहीं करार दिया है। लगे हाथ संविधान पीठ ने केंद्र सरकार से यह भी पूछा है कि जब ओबीसी पर क्रीमीलेयर लागू किया जा सकता है फिर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति पर क्यों नहीं?

अब बदलती हुई तस्वीर पर निगाह डालते हैं। 20 मार्च 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एससी एसटी अत्याचार रोकथाम अधिनियम 1989 में संशोधन किया तब पूरे देश में इसके खिलाफ गूंज सुनाई दी। देश का पिछड़ा वर्ग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ सड़क पर उतर गया। यह सब बीते 2 अप्रैल को पूरे देश ने देखा। लेकिन अब क्या हो रहा है? कहीं से कोई आवाज नहीं। मानों सभी के सभी कान में तेल डालकर सोये पड़े हैं। केंद्र सरकार ने भी कह दिया है कि ओबीसी पर क्रीमीलेयर तो ठीक है लेकिन एससी व एसटी पर क्रीमीलेयर नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि हमारे पास उनकी समृद्धि के आंकड़े नहीं हैं।

यानी अब भी ओबीसी के पक्ष में बोलने वाला कोई नहीं है। कोई यह नहीं कह रहा कि ओबीसी के आंकड़े सामने लाओ ताकि यह समझ में आये कि आज के दौर ओबीसी वर्ग कितना समृद्ध हुआ है? जातिगत जनगणना के आंकड़े ही सार्वजनिक हों ताकि मोटे तौर पर ही सही, देश का ओबीसी वर्ग स्वयं का आकलन भी करे। कुछ लोग हैं जो यह तर्क दे रहे हैं कि यदि यह रिपोर्ट सार्वजनिक हो जाय तो ओबीसी के उन नेताओं की पोल खुल जाएगी जो अबतक ओबीसी के नाम पर राजनीति करते रहे हैं। जाहिर तौर पर वे द्विजों के तर्ज पर भविष्य बांच रहे हैं। जबकि एक संभावना यह भी है कि अपनी बदहाली देख ओबीसी समाज भी एकजुट हो और वह अधिक मजबूती के साथ अपनी लड़ाई लड़े।

बहरहाल ओबीसी के राजनेताओं के लिहाज से बात करें तो उनके एजेंडे में अब ओबीसी नहीं रह गये हैं। फिर चाहे वह मुलायम सिंह यादव हों, लालू प्रसाद हों या फिर नीतीश कुमार। हालांकि ऐसा नहीं है कि यह विचलन केवल ओबीसी वर्ग के नेताओं में ही है। अनुसूचित जाति के नेताओं के लिए भी उनके अपनों का हित कोई मायने नहीं रखता है। उदाहरण के लिए बसपा प्रमुख मायावती बहुजन के नाम पर राजनीति करने के बाद अब सर्वजन की राजनीति करती हैं।

कुल मिलाकर ओबीसी के नेता अपने पथ से भटक चुके हैं। फिर चाहे इसके कितने भी कारण क्यों न हों? सच्चाई यही है। रही बात हक और अधिकारों की तब यह लड़ाई इस वर्ग को खुद ही लड़नी होगी। यह छटपटाहट उन्हें ही अपने अंदर पैदा करनी होगी। जब उनके अंदर छटपटाहट होगी तभी ओबीसी के नेताओं की नींद भी खुलेगी। फिलहाल तो उनके लिए ओबीसी महज एक वोट बैंक है जो केवल जाति या समाज के नाम पर वोट देने से भी गुरेज नहीं करता है।

~ संतोष यादव

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