उपेक्षित क्रांति के उपेक्षित नायक: तिलका माँझी

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By-Kirti Kumar

भारत के इतिहास में कई क्रांति हुई है, लेकिन जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त ब्राह्मणवादी इतिहासकारो द्वारा षड्यंत्रपूर्वक इतिहास को दबाया है, या तो तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है. इतिहासकार मुस्लिम और अंग्रेज के खिलाफ हुए युद्धों को ही स्वाधीनता की लड़ाई कहलाते है. जबकि, विदेशी आर्यों के आक्रमण के बाद जातिवाद के तहत अपने मुलभुत मानवीय हक़-अधिकार खो बैठे भारत के मूलनिवासी विदेशी आर्य ब्राह्मणों की जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ 3500 साल से लड़ रहे है. भारत में बौद्ध और जैन विचारधारा का उद्भव भी जातिवाद के खिलाफ क्रांति ही थी.

भारत में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भी कई भारतीयों ने आवाज़ उठाई थी, कई युद्ध हुए, कई लोगो की जाने गई. सन 1857 में तत्कालीन भारतीय गवर्नर लार्ड डलहौजी के ‘डाक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स’ क़ानून के तहत सतारा, झाँसी, नागपुर और अवध को कंपनी शासन में जोड़ देने की वजह से इन राज्यों ने विद्रोह किया. उसी समय मंगलपांडे नाम के ब्रिटिश सैनिक ने ब्राह्मण होने की वजह से एनफील्ड रायफल की गाय के मांस से लदी कारतूस का विरोध किया, और ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ बगावत कर दी. इस तरह 1857 में कंपनी शासन के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत हुई, जिसे ब्राह्मणवादी इतिहासकारों ने भारत का प्रथमस्वातंत्र्य संग्राम कहा! मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल करके 8 अप्रिल 1857 को फांसी दे दी गई. और इतिहासकारों ने उसे भारत के स्वातंत्र्य संग्राम का प्रथम शहीद घोषितकर दिया. जबकि अंग्रेजो के खिलाफ जंग की शुरुआत काफ़ी पहले आदिवासी युवान तिलका मांझी के नेतृत्व में संथालआदिवासीयों ने सन 1770 में कर दी थी..

11 फरवरी 1750 में तिलकपुर गावं में जन्मे तिलका मांझी को भारतीय इतिहासकारों की जातिवादी मानसिकता के कारण इतिहास में कहीं जगह नहीं मिली, तिलका मांझी ने गाय की चरबी के कारण या किसी भी धार्मिक भावना को ठेस लगने के कारण अंग्रेजो के खिलाफ जंग की शुरुआत नहीं की थी. और न ही उनका कोई राज्य अंग्रेजो ने हड़प लिया था. तिलका मांझी लोगो में राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए भागलपुर मेंसभाएं संबोधित करते थे और जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोगो को राष्ट्र के लिए एकत्रित होने का आह्वान करते थे. तिलका मांझी ने राजमहल की पहाडियों में अंग्रेजोके खिलाफ कई लड़ाईयां लड़ी. सन 1770 में पड़े अकाल में तिलका मांझी के नेतृत्व मेंसंथालो ने सरकारी खजाने को लूट कर गरीबो में बाँट दिया, जिससे गरीब तबके के लोग तिलका मांझी से प्रभावित हुए और उनके साथ जुड़ गए. जिससे तिलका ने अंग्रेजो और सामंतो पर हमले तेज किए. हर जगह तिलका मांझी की जीत हुई.

सन 1784 में तिलका मांझीने भागलपुर पर हमला किया और 13 जनवरी 1784 में ताड के पेड़ पर चढ़कर घोड़े पर सवार अंग्रेज कलेक्टर अगस्टस क्लीवलैंड को अपने तीर का निशाना बनाया और मार गिराया. अंग्रेज कलेक्टर की मौत से ब्रिटिश सेना में हड़कंप मच गया. यह तिलका मांझी और उनके साथीयों के लिए बड़ी कामयाबी थी. जब तिलका मांझी और उनके साथी इस जित का जश्न मना रहे थे तब रात के अँधेरे में अंग्रेज सेनापति आयरकूट ने हमला बोला लेकिन किसीभी तरह तिलका मांझी बच निकले और उन्होंने पहाडियों में शरण लेकर अंग्रेजो के खिलाफ छापेमारी जारी रखी. तब अंग्रेजोने पहाड़ो की घेराबंदी करके तिलका मांझी तक पहुँचनेवाली तमाम सहायता रोक दी. तब मजबूरन तिलका मांझी को अन्न और पानी के अभाव के कारण पहाड़ो से निकल कर लड़ना पड़ा और एक दिन पकडे गए. कहा जाता है, तिलका मांझी को चार घोडों से घसीट कर भागलपुर ले जाया गया, 13 जनवरी 1785 के दिन भागलपुर के चौराहे पर हज़ारों लोगों की भीड़ के सामने बरगद के विशाल पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गई.

तिलका मांझी के इस बलिदान को इतिहासकारों ने भले ही नजरअंदाज कर दिया हो, लेकिन राजमहल के आदिवासी आज भी उनकी याद में लोकगीत गुनगुनाते है, उनके साहस की कथाएँ सुनाते है. और अपने नायक को याद करते है.. तिलका मांझी उनके दिलो में जिन्दा है.

याद रहे, जब तिलका मांझी को फांसी दी गई थी, तब भारत के कथित प्रथम शहीद का जन्म भी नहीं हुआ था..!!

-कीर्ति कुमार

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