विश्व मूलनिवासी दिवस: हमारी विरासत, संस्कृति, पहचान और अधिकारों का दिवस।

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By- DR. Manisha Bangar

आज  9 August अर्थात विश्व मूलनिवासी दिन है आज यह दिन विरासत और संस्कृति को याद करने का दिन है। सदियों से खोई हुई पहचान को उजागर करने का  दिन है | अधिकार दिवस भी है | यह हमारी आन-बान और शान का दिन है | हमारे गर्व और गौरव का दिन है | हमारे लिये हर्षोल्लास का दिन  है | खूब नाचो खूब गाओं जश्न मनाओ |

मैं भी तो पिछले कुछ दिनों से शासक जातियों से,  शेठजी-भट्टजी से विदेशी आर्यों से सवाल करते हुए, बार बारगुनगुना रहीं हूँ एक गीत…

“तुम इतना क्यूँ घबरा रहे हो

क्या डर है जिसको छुपा रहे हो”

क्योंकि पूरी दुनिया जब मूलनिवासी दिन मनाने की तैयारी में लगी हुई है तब शासक जातियां सत्ताधारी चम्मच/दलाल गुलाम विलास को आगे कर भारत बंध करवाने पर तुली हुई है। हकीकत यह है कि इन्हें डर लगता है हमारी मूलनिवासी पहचान से इन्हें डर लगता है बहुजनों के आपस में जुड़ने से इन्हें डर लगता है हमारे गर्व और गौरव से इन्हें डर लगता है फुले अम्बेडकरी सपने संजोने से। क्यों डर लगता है ?

अगर यह दिन शांति से हर्षोल्लास से गर्व और गौरव से SC/ST/OBC और इनमे से धर्मान्तरित अल्पसंख्यक लोगो ने मनाया तो मूलनिवासी संकल्पना पर जूलूस निकलेगा। कार्यक्रम होंगे, विचार होगा,चर्चा होगी, संवाद होगा, परिसंवाद होगा, नारे लगेंगे, जय जय जयकार होगा। और अंतत पहचान होगी दोस्त और दुश्मन की जब यह लोग अपने को मूलनिवासी कहेंगे तो कौन विदेशी है इसका भी पता चल जायगा, और पता चल गया तो भारत छोडो के नारे लगेंगे। बहुत डरावना है यह इसीलिए तो वे इस पहचान को दबाना चाहते है और अपनी विदेशी वाली पहचान छुपाना चाहते है। इसीलिए तो आपका ध्यान भटकाने के लिए  आप जब मूलभूत अधिकारों (आपातकाल) की बात करते हो तो वे एकात्म यात्रा (गंगा जल यात्रा) (1977) निकालते है |

इतना ही नहीं आपातकाल लगाने वाली प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को समापन समारोह में बुलाकर 1977 में विवेकानंद रॉक मेमोरियल का उद्घाटन करवाया जाता है ।आपके मूलाधिकारो की जाग्रति से आपका ध्यान हटाया जाता है। आप (SC/ST/OBC) जागृत हो कर जब आप मंडल रिपोर्ट (1989) के आधार पर संगठित होते जाते है तो फिर वे डर जाते है। फिर एक यात्रा, राम रथ यात्रा (1990) निकाल देते हैं।और रामजन्मभूमि का मुद्दा उछाल देते है, मंडल पर कमंडल को भारी करने के लिएस इन्हें डर लगता है।

 

आपके (SC/ST/OBC) सामाजिक ध्रुविकरण से अगर आप इस तरह बहुजन बन गए तो फिर मूलनिवासियो को बेवकूफ बनाकर सदियों से यह अल्पजन परजीवी (शेठजी भटजी) सता पे काबिज है।उनका क्या होगा ?  उनका तो सवर्णवादी ढांचा ही ढह जायेगा।वो बहुत डर गए थे ।जब पहलीबार  सपा-बसपा 1993 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान साथ आये और नारा लगाया था की ‘मिले मुलायम कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ वाकई में उन्हें डर लगता है आपके (SC/ST/OBC) सामाजिक ध्रुविकरण से उन्हें डर लगता है। ब्राह्मणेतर चिंतन से जहाँ पर Caste को Class में परिवर्तित करने की जिद्दो जहद है। क्योंकि जब वह क्लास में परिवर्तित हो कर आपस में मेल जोल बढ़ाते है तो फिर डर है की  वह बहुजन बनने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

 

जातियों के ध्रुवीकरण से ही तो  बहुजन बन रहे है। बहुजन एक संख्या वाचक संकल्पना है इसलिये इसमे जाति का स्कोप नही है ना जातिवाद का क्यूंकि जाती अपने आपमें एक अल्पसंख्यक सिध्धांत है। जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कभी प्रभावी नहीं हो सकता है।जब की बहुजन एक बहुसंख्यक सिध्धांत है, जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था बहुत प्रभावी है।लोकतंत्र में अगर आप (SC/ST/OBC) ब्राह्मणवाद की  समाप्ति चाहते है तो बहुजन होना न केवल आवश्यक है अनिवार्य भी है |

 

खैर फिर भी बहुजन संकल्पना में मैथमेटिक्स ज्यादा है। केमिस्ट्री कम है।  बहुजन संकल्पना का मैथमेटिक्स जातियो को वर्ग में परिवर्तित करते हुए आपको शासक तो बना सकता है मगर केमेस्ट्री की अनुपस्थिति में  इनका एक समाज नहीं बना सकता अर्थात ब्राह्मण वाद को ख़तम नहीं कर सकता है।

इसीलिए तो इसके जवाब के तौर पर  इन्होने अपने हिंदुत्व के मैथमेटिक्स से इसको काउंटर करने की योजना बना ली है | और समय समय पर लागू भी करते रहते है। इन्हें डर लगता है। आपका (SC/ST/OBC)  एक समाज बनने से.. वे मूलनिवासी संकल्पना से इसीलिए डरते है क्योंकि इसमें बहुजनो का एक अखंड समाज निर्माण करने के लिए पर्याप्त मैथमेटिक्स भी है और केमेस्ट्री भी मैथमेटिक्स का गुणधर्म है केवल जोड़ना है।

 

जबकी केमिस्ट्री का गुणधर्म है घुलमिल कर देना और एक ऐसे समाज का निर्माण करना जो धरती का आबा बनकर एक गौरान्वित पहचान के साथ अपना वजूद प्रस्थापित करें। उनके लिए बहुत डरावना है यह इसीलिए वे हत्कंडे ढूँढते रहते है मूलनिवासी पहचान को छुपाने के दबाने के कभी ६ दिसम्बर को मस्जिद गिरा देते है तो ९ अगस्त को भारत बन्ध का एलान कर देते है। असल में वे इस विषय पर चर्चा नहीं होने देना चाहते।

 

जब समूचा विश्व मूलनिवासी दिन मनाने में लगा हुआ है तब यह लोग सरकारी स्तर पर आदिवासी दिन मनाने में लगे हुए है। बहुजनों को गुमराह करने का एक और हत्कंडा ढूंढ लिया है उन्होंने सच तो यह है कि भारत बंद के नाम पर आदिवासी दिन के नाम पर  वो मूलनिवासियो की पहचान को व्यापक रूप से प्रचारित प्रसारित होने से दबाये रखना चाहते है। वास्तव में वे अपनी विदेशी वाली पहचान को छुपाये रखना चाहते है।

 

इससे निपटने का उपाय क्या है? फिलहाल तो आज के दिन उपाय यही है की अपनी विरासत और संस्कृति को याद करों  सदियों से खोई हुई पहचान को उजागर करों, अधिकार दिवस मनाओ, आन बान और शान से जिओ, गर्व और गौरव से  हर्षोल्लास से खूब नाचो खूब गाओं जश्न मनाओ। और कल से एक नयी उर्जा के साथ जातीय चिंतन से मुक्त हो कर सामाजिक चिंतन को ग्रहण करते हुए।  जन चेतना के कार्य में जुड़ जाओ।

एक बात और बता दूँ की यह जातीय चिंतन एक मानसिक बीमारी है। कोई भी चेतना जिसकी सीमा “जाति” अंतर्गत ही खत्म हो जाती हो वह ब्राह्मण वाद द्वारा पैदा किया गया मानसिक रोग है। यह मत भूलिए की बहुजनआदिवासी चिंतन या पाटीदार चिंतन या यादव या जाट या गुर्जर यह जातीय चिंतन मे ही ब्राम्हणवादी चिंतन के प्राण बसते हैं। जो अंततः आपको शुद्रत्व का स्वीकार करने पर बाध्य करते है, शर्म-सार और जिल्लत की जिंदगी बसर करने पे मजबूर करते है।

 

इसीलिए जरूरी है ब्राह्मणेतर चिंतन जो सम्पूर्ण मानवता का चिंतन है जिस पर फुले-शाहू-पेरियार-आंबेडकर ने काम किया आज उनकी विचारधारा पर चाहे छोटे पैमाने पर ही क्यों न हो अपनी एक अलग पहचान ही नहीं बल्की अपने अपने क्षेत्रो (उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु) में ब्राह्मणवाद को रौंदते हुए गुर्राता हुआ नज़र आ रहा है।

 

हालाँकि प्रवर्तमान स्थिति में ब्राह्मणवाद हिंदुत्व के नाम पर बहुजन पर भारी पड़ता हुआ नज़र आ रहा है। कमंडल मंडल पर भारी पड़ता हुआ नज़र आ रहा है। वास्तव में वह जातीय चिंतन के बढ़ते प्रभाव का ही नतीजा है। इसीलिए जरूरी है कि ब्राह्मणेतर चिंतन के महत्वपूर्ण हथियार के रूप में मूलनिवासी संकल्पना को बहुजन समाज में प्रस्थापित की जाय और न केवल संख्यात्मक रूप से बल्की भावात्मक रूप से भी एक समाज का निर्माण करने की जिद्दो जहद के साथ आन्दोलन खड़ा किया जाय।

ऐसी कामना करते हुए आप सभी को मूलनिवासी दिन की हार्दिक शुभकामनाएं। बोल पच्चासी जय मूलनिवासी।….

-डॉ मनीषा बांगर

मूलनिवासी चिन्तक

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