जन्म दिन विशेष: बिहार लेनिन अमर शहीद बाबू जगदेव कुशवाहा के जन्म दिवस पर बामसेफ संगठन की तरफ से मूलनिवासी बहुजन समाज को बहुत-बहुत बधाई

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By- Rama Shankar Ram, CEC member Bamcef

  1. लोहिया जी कहा करते थे कि समाजवाद का उद्देश्य समाज मे समता लाना है। इस पर महामना राम स्वरूप वर्मा ने कहा कि समाज मे समता स्थापित करने के लिए जीवन के चार मुख्य क्षेत्रो मे समता लानी पड़ेगी।
  2. सांस्कृतिक समता
  3. सामाजिक समता

III. राजनीतिक समता

  1. आर्थिक समता

महामना राम स्वरूप वर्मा ने कहा कि लोहिया जी यदि आप राजनीतिक समता चाहते है तो राजनीतिक समता से पूर्व सांस्कृतिक समता एवं सामाजिक समता स्थापित होनी चाहिए। सांस्कृतिक समता एवं सामाजिक समता के बाद ही राजनीतिक समता एवं उसके बाद आर्थिक समता स्थापित हो सकती है। इस पर लोहिया जी ने कहा कि हमारा लक्ष्य समता नहीं बल्कि संभव समता है। इस पर वर्मा जी ने कहा कि यह संभव समता क्या है? समता तो केवल समता है।

  1. जहां महामना राम स्वरूप वर्मा ने सांस्कृतिक समता को सर्वोपरि माना वही लोहिया पूरे जीवन भर जहा एक तरफ गांधी एवं नेहरू से प्रभावित रहे और उनको अपना आदर्श मानते रहे तो वही दूसरी तरफ वे रामायण मेला का आयोजन एवं द्रोपति/सीता मे आदर्श नारी का चरित्र ढ़ूढ़ते रहे। यह सर्वविदित है कि पौराणिक रामायण ग्रंथ मे विषमता एवं वर्ण व्यवस्था का समर्थन है। इस लिए रामायण मेला से न तो सांस्कृतिक समता एवं न ही सामाजिक समता स्थापित हो सकती है। लोहिया गांधी वादी थे और गांधी जाति वादी थे।
  2. लोहिया ने नारा दिया था कि “ससोपा ने बाँधी गांठ पिछड़े 100 मे पावें साँठ।“ इससे पिछड़े वर्ग के लोग लोहिया की ओर आकर्षित हुये लेकिन जब टिकट देने की बात आई तो उन्होने सवर्ण महिलाओं को भी पिछड़े वर्ग के कोटे से टिकट दे दिया। इस पर बाबू जगदेव ने विरोध किया और कोई समाधान न होने पर लोहिया का साथ छोड़ दिया।
  3. जगदेव बाबू ने 1967 के विधानसभा चुनाव में संसोपा (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) के उम्मीदवार के रूप में कुर्था से लड़ा और जीत दर्ज की। जगदेव बाबू तथा कर्पूरी ठाकुर की सूझ-बूझ से पहली गैर-कांग्रेस सरकार का गठन हुआ। लेकिन यहाँ भी मुख्यमंत्री के चयन में भारी तमाशा हुआ। यहां गैर कांग्रेसी संयुक्त विधायक दल (संविद) में संसोपा सबसे बड़ी पार्टी थी जिसके 68 विधायक थे, दूसरी सोशलिस्ट पार्टी प्रसोपा के 17 सदस्य थे। इसके अलावा छोटानागपुर इलाके के एक बड़े जमींदार राजा रामगढ कहे जाने वाले कामाख्या नारायण सिंह की जेबी पार्टी जनक्रांति दल के भी 27 विधायक थे।

जन क्रांति दल विधायक दल के नेता कामाख्या नारायण सिंह और उपनेता महामाया प्रसाद सिन्हा थे। संसोपा विधायक दल के नेता कर्पूरी ठाकुर थे। कायदे से कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री होना चाहिए था लेकिन यह नहीं हुआ। कहा जाता है कि इस बात पर कुछ सवर्ण नेता अंदरखाने में सहमत हो गए कि किसी भी कीमत पर कर्पूरी ठाकुर को सीएम नहीं होने देना है और तर्क दिया गया कि मुख्यमंत्री को हराने वाला मुख्यमंत्री बनेगा। पटना शहरी क्षेत्र से मुख्यमंत्री केबी सहाय को जनक्रांति दल उम्मीदवार के रूप में महामाया प्रसाद ने हराया था। लेकिन सच्चाई यह भी थी कि केबी सहाय दो चुनाव क्षेत्रों से चनाव लड़े थे। दूसरी जगह हज़ारीबाग था, जहाँ से उन्हें जनक्रांति दल के ही एक पिछड़ी जाति से आने वाले रघुनन्दन प्रसाद ने हराया था लेकिन उनकी कोई पूछ नहीं हुई, उन्हे मंत्री भी नहीं बनाया गया। मतलब यह था कि संविद सरकार की बुनियाद ही गलत थी।

पाखंड का हाल यह था की सबसे बड़े विधायक दल का नेता उपमुख्यमंत्री था और एक बहुत छोटे दल का उपनेता मुख्यमंत्री। सरकार ने तैंतीस सूत्री कार्यक्रम बनाये। इसमें भूमि सुधार के भी बिंदु थे और उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्ज़ा देना था। इन दोनों कार्यक्रमों का संविद सरकार में शामिल जनसंघियों ने विरोध किया। भूमि सुधार पर कम्युनिस्टों का जोर था। संसोपा -प्रसोपा के लोगों को भी जोर देना चाहिए था, लेकिन वे तटस्थ रहे। जब ये प्रोग्राम शिथिल हुए, तब केवल राजपाट ही मुख्य ध्येय रह गया। दस महीने बाद ही कोलाहल शुरू हो गया और फरवरी 1968 में संविद सरकार गिर गयी। संसोपा का एक धड़ा अलग होकर शोषित दल बन गया, इसमें एकाध अपवाद छोड़कर सभी पिछड़ी जातियों के विधायक थे।

यह उस पाखंड की प्रतिक्रिया थी, जो मुख्यमंत्री बनाने में हुई थी। लेकिन पाखंड का विस्थापन पाखंड से ही हुआ। कांग्रेस ने शोषित दल को सरकार बनाने में समर्थन दिया तब कांग्रेस के 128 विधायक थे। पहली बार बिहार में बिंध्येश्वरी प्रसाद मंडल, एक जमींदार, लेकिन पिछड़ा वर्गीय, के मुख्यमंत्रित्व में सरकार बनी। गौरतलब है कि महामाया प्रसाद सिन्हा और बी पी मंडल दोनों कांग्रेसी पृष्ठभूमि के थे ( बाद में मंडल फिर कांग्रेस में चले गए और दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बने)।

  1. पार्टी की नीतियों तथा विचारधारा के मसले पर जगदेव बाबू की लोहिया से अनबन हुयी और ‘कमाए धोती वाला और खाए टोपी वाला’ की स्थिति देखकर संसोपा छोड़कर 25 अगस्त 1967 को ‘शोषित दल’ नाम से नयी पार्टी बनाई, उस समय अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा था- “जिस लड़ाई की बुनियाद आज मैं डाल रहा हूँ, वह लम्बी और कठिन होगी। चूंकि मै एक क्रांतिकारी पार्टी का निर्माण कर रहा हूँ इसलिए इसमें आने-जाने वालों की कमी नहीं रहेगी परन्तु इसकी धारा रुकेगी नहीं। इसमें पहली पीढ़ी के लोग मारे जायेंगे, दूसरी पीढ़ी के लोग जेल जायेंगे तथा तीसरी पीढ़ी के लोग राज करेंगे। जीत अंततोगत्वा हमारी ही होगी।”
  2. मार्च 1970 में जब जगदेव बाबू के दल के समर्थन से दरोगा प्रसाद राय मुख्यमंत्री बने, उन्होंने 2 अप्रैल 1970 को बिहार विधानसभा में ऐतिहासिक भाषण दिया- “मैंने कम्युनिस्ट पार्टी, संसोपा, प्रसोपा जो कम्युनिस्ट तथा समाजवाद की पार्टी है, के नेताओं के भाषण भी सुने हैं, जो भाषण इन इन दलों के नेताओं ने दिए है, उनसे साफ हो जाता है कि अब ये पार्टियाँ किसी काम की नहीं रह गयी हैं, इनसे कोई ऐतिहासिक परिवर्तन तथा सामाजिक क्रांति की उम्मीद करना बेवकूफी होगी। इन पार्टियों में साहस नहीं है कि सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी जो असली कारण है उनको साफ शब्दों में मजबूती से कहें। कांग्रेस, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी ये सब द्विजवादी पूंजीवादी व्यवस्था और संस्कृति के पोषक है।

मेरे ख्याल से यह सरकार और सभी राजनीतिक पार्टियाँ द्विज नियंत्रित होने के कारण दिशाहीन हो चुकी है। मुझको कम्युनिज्म और समाजवाद की पार्टियों से भारी निराशा हुयी है। इनका नेतृत्व दिनकट्टू नेतृत्व हो गया है.” उन्होंने आगे कहा कि, ‘सामाजिक न्याय, स्वच्छ एवं निष्पक्ष प्रशासन के लिए सरकारी, अर्धसरकारी और गैरसरकारी नौकरियों में कम से कम 90 सैकड़ा जगह शोषितों के लिए आरक्षित कर दिया जाये’।

  1. जगदेव बाबू बाद मे रामस्वरूप वर्मा द्वारा स्थापित ‘अर्जक संघ’ (स्थापना 1 जून, 1968) में शामिल हो गए। जगदेव बाबू ने कहा था कि अर्जक संघ के सिद्धांतों के द्वारा ही ब्राह्मणवाद को ख़त्म किया जा सकता है और सांस्कृतिक परिवर्तन कर मानववाद स्थापित किया जा सकता है। अर्जक संघ ने आचार, विचार, व्यवहार और संस्कार को अर्जक विधि से मनाने पर बल दिया। उस समय ये नारा गली-गली गूंजता था-

मानववाद की क्या पहचान- ब्राह्मण, भंगी एक सामान,

पुनर्जन्म और भाग्यवाद- इनसे जन्मा ब्राह्मणवाद.

  1. 7 अगस्त 1972 को रामस्वरुप वर्मा एवं जगदेव बाबू का मिलन हुआ। जगदेव बाबू का शोषित दल तथा रामस्वरूप वर्मा जी के ‘समाज दल’ का एकीकरण हो गाय और ‘शोषित समाज दल’ नमक नयी पार्टी का गठन किया गया। शोषित समाज दल ने नया नारा दिया कि

दस का शासन नब्बे पर,

नहीं चलेगा, नहीं चलेगा.

सौ में नब्बे शोषित है,

नब्बे भाग हमारा है.

धन-धरती और राजपाट में,

नब्बे भाग हमारा है.

  1. जगदेव बाबू वर्तमान शिक्षा प्रणाली को विषमतामूलक, ब्राह्मणवादी विचारों का पोषक तथा अनुत्पादक मानते थे। वे समतामूलक शिक्षा व्यवस्था के पक्ष में थे। एक सामान तथा अनिवार्य शिक्षा के पैरोकार थे तथा शिक्षा को केन्द्रीय सूची का विषय बनाने के पक्षधर थे। वे कहते थे-

चपरासी हो या राष्ट्रपति की संतान,

सबको शिक्षा एक सामान.

जगदेव बाबू ने सामाजिक क्रांति का बिगुल फूंका। उन्होंने कहा था कि- ‘यदि आपके घर में आपके ही बच्चे या सगे-संबंधी की मौत हो गयी हो किन्तु यदि पड़ोस में ब्राह्मणवाद विरोधी कोई सभा चल रही हो तो पहले उसमें शामिल हो’,

(यह लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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