जानिये कौन हैं ईश्वरीबाई जिनके नाम का पुरस्कार तेलंगाना सरकार ने सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और मशहूर डॉ मनीषा बांगर को प्रदान किया है।

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आंध्र प्रदेश-तेलंगाना की जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता ईश्वरीबाई कहा करती थीं कि सामाजिक न्याय की अंबेडकरवादी विचारधारा लगातार तभी आगे बढ़ सकती है, जब आने वाली पीढ़ियां भी अपने सामाजिक दायित्वों को निभाएं। जे ईश्वरीबाई के नाम पर दिया जाने वाला पुरस्कार का इस वर्ष मशहूर चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ मनीषा बांगर को प्रदान किया जाना इस मायने में बहुत अहम है क्योंकि डॉ मनीषा भी अपने चिकित्सकीय पेशे के साथ-साथ सामाजिक योगदान करते हुए ईश्वरीबाई की परंपरा को ही आगे बढ़ा रही हैं।

महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में दिया जाने वाला सुप्रसिद्ध ईश्वरीबाई पुरस्कार इस बार जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता और ख्यातिलब्ध चिकित्सक डॉ मनीषा बांगर समेत 4 जानी-मानी महिलाओं को दिया गया है। तेलंगाना सरकार की तरफ से दिया जाने वाला यह पुरस्कार पाने वाली अन्य 3 महिलाएं हैं लेखिका और फिल्म निर्माता बी विजय भारती ताराकम, संपादक कोंडावीटी सत्यवती और तेलंगाना मानव अंग दानदाता संघ की प्रदेशाध्यक्ष के भारती।

कौन हैं डॉ मनीषा बांगर? डॉ मनीषा बांगर करीब दो दशकों से सामाजिक न्याय और बहुजन आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं और इस क्षेत्र में एक जाना-माना नाम है। एबीबीएस, एमडी और डीएम की उपाधि प्राप्त डॉ मनीषा अंतरराष्ट्रीय स्तर की लिवर ट्रांसप्लांट स्पेशलिस्ट और हीपेटोलॉजिस्ट हैं।दक्षिण भारत का प्रतिष्ठित ईश्वरी बाई से डॉ मनीषा बांगर को सम्मानित किया जाना निश्चित रूप से बहुजन समाज की भी एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि वे बाबा साहब अंबेडकर की पे बैक टू सोसायटी की अवधारणा को साकार करने में हमेशा आगे रही हैं। चिकित्सक के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह से निभाते हुए भी वे सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाती आ रही हैं।


ऐसे युग में जबकि सरकार के खिलाफ बोलना भी गुनाह मान लिया गया है, तब भी डॉ मनीषा ही हैं जो केंद्रीय सड़क परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को चुनौती देने गडकरी के गृहक्षेत्र नागपुर पहुंच जाती हैं। 2019 में उन्होंने पीपुल्स पार्टी ऑफ इंडिया-डेमोक्रेटिक के उम्मीदवार के रूप में नागपुर लोकसभा सीट से गडकरी को पूरे साहस के साथ चुनौती दी थी।
समाज के 85 प्रतिशत बहुजनों को न्याय दिलाने के लिए रास्ता खोजने में लगातार प्रयासरत डॉ मनीषा पीपुलिस पार्टी ऑफ इंडिया-डेमोक्रेटिक की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तो हैं ही, साथ ही, वैकल्पिक मीडिया स्थापित करने में उनका बड़ा योगदान है। बहुजनों की सशक्त आवाज बन चुका नेशनल इंडिया न्यूज़ यूट्यूब चैनल और वेबसाइट की स्थापना करके उन्होंने बहुजन समाज की बहुत बड़ी आकांक्षा को पूरा करने की कोशिश की है। उनके यूट्यूब चैनल के आज तकरीबन 15 लाख सब्सक्राइबर हैं, जो डॉ मनीषा बांगर के प्रयासों की सफलता और बहुजन समाज के उनके प्रति विश्वास के प्रतीक हैं।


डॉ मनीषा देश-विदेश में चिकित्साजगत और कोलंबिया यूनिवर्सिटी, कार्लटन यूनिवर्सिटी, कराची यूनिवर्सटी जैसे नामी विश्वविद्यालयों में होने वाले सेमिनारों में उन्हें भाषणों के लिए लगातार आमंत्रित किया जाता है। साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर स्टडी ऑफ लिवर डिसीज़ और इंडियन एसोसिएशन फॉर स्टडी ऑफ लिवर स्टडी जैसे अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बोर्ड में भी वे शमिल हैं। चिकित्सा के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें फ्रैंड ऑफ हेपेटाइटिस एलायंस और कलिंग अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।एक डॉक्टर के रूप में उनकी जितनी उपलब्धियां हैं, उतनी सफलता उन्होंने जातीय समानता और लैंगिक समानता लाने के क्षेत्र में हासिल की है। जाति और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव के खिलाफ और टिकाऊ समानतापूर्ण विकास के पक्ष में बोलने के लिए वे न्यूयॉर्क समेत देश-विदेश के कई स्थानों पर जा चुकी हैं और लगातार जाती रहती हैं। उनके इन्हीं कामों के लिए उन्हें ग्लोबल बहुजन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है।


फुले, अंबेडकर और पेरियार की विचारधारा के लिए प्रतिबद्ध डॉ मनीषा बांगर बौद्ध और सिख धर्म की अच्छी जानकार हैं, और दोनों ही विषयों पर अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में भाग लेती रहती हैं। भारत के अंदर उनका कार्यक्षेत्र तेलंगाना से लेकर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे अनेक राज्यों में फैला हुआ है। कौन थीं ईश्वरीबाई? तेलंगाना का जो प्रतिष्ठित जे ईश्वरीबाई डॉ मनीषा बांगर समेत 4 जानी-मानी महिलाओं को दिया गया है, वह जानी-मानी सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता स्वर्गीय श्रीमती जे ईश्वरीबाई के नाम पर दिया जाता है।

अंबेडकर की विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए पूरा जीवन समर्पित करने वाली ईश्वरीबाई का जन्म एक दिसंबर 1918 को सिकंदराबाद के एक ओबीसी परिवार में हुआ था। मेट्रिक तक पढ़ाई करने के बाद उनका विवाह पुणे के मशहूर चिकित्सक डॉ जे लक्ष्मी नारायण के साथ हुआ। अपने कैरियर की शुरुआत ईश्वरीबाई ने सिकंदराबाद में शिक्षिका के रूप में की और बालिकाओं तथा पिछड़े वर्गों के बच्चों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अथक प्रयास किए। सिकंदराबाद में उन्होंने गीता विद्यालय की स्थापना की और गरीब महिलाओं को सिलाई, कढ़ाई, चित्रकला जैसे हुनर सिखाने के लिए कार्यशालाएं आयोजित करना शुरू किया ताकि ये महिलाओं आर्थिक रूप से सबल हो सकें।

डॉ अंबेडकर से प्रभावित होकर ईश्वरीबाई ने 1952 में राजनीति में कदम रखा और फिर पूरे जीवन भर अंबेडकरवादी और रिपब्लिकन पार्टी की विचारधारा से जुड़ी रहीं। 1950 के दशक में अपने सामाजिक कार्यों की बदौलत वो सिकंदराबाद नगरनिगम की काउंसलर निर्वाचित हुईं।
हैदराबाद नगर निगम के चुनाव गैर राजनीतिक आधार पर लड़ने के लिए उन्होंने 1960 के दशक में सिविक राइट्स समेटी का गठन किया, और कुछ ही महीनों के अंदर इस कमेटी के 4 काउंसलर जीत भी गए। वे खुद मारेडपल्ली क्षेत्र से चुनाव जीतीं। तमाम प्रलोभनों को ठुकराते हुए उन्होंने अपने को हमेशा रिपब्लिकन पार्टी की विचारधारा से ही जोड़े रखा और इस पार्टी के अध्यक्ष पद तक पहुंचीं। 1960 के दशक में उन्हें सिकंदराबाद कोर्ट डिवीज़न में दो साल के लिए मानद मजिस्ट्रेट भी नियुक्त किया गया था।


रिपब्लिक पार्टी में ईश्वरीबाई ने विभिन्न पद संभाले। आंध्रप्रदेश सरकार के महिला और बाल विकास निगम की अध्यक्ष का पद भी उन्होंने संभाला और इस दौरान महिलाओं और बच्चों की शिक्षा के लिए बहुत काम किया। उन्होंने बालिकाओं के लिए इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई निशुल्क करवाने में अहम भूमिका निभाई। वे तेलंगाना प्रजा समिति की उपाध्यक्ष भी रहीं।1972 में वे निजामाबाद जिले की येल्लारेड्डी विधानसभा सीट से आरपीआई और तेलंगाना प्रजा समिति की उम्मीदवार के रूप में आंध्रप्रदेश विधानसभा की सदस्य निर्वाचित हुईं। जब पृथक तेलंगाना राज्य का आंदोलन चला तो श्रीमती ईश्वरीबाई ने उसमें भी सक्रिय भूमिका निभाई जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार करके हैदराबाद की चंचलगुड़ा जेल में रखा गया था। 24 फरवरी 1919 को श्रीमती ईश्वरीबाई समाजसेवा और सामाजिक न्याय के आंदोलनों की गौरवशाली विरासत अगली पीढ़ी के लिए छोड़कर इस दुनिया से विदा हो गईं। उनकी बेटी डॉ जे गीता रेड्डी वर्तमान में तेलंगाना कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक हैं और राज्य में मंत्री भी रह चुकी हैं।

ये शब्द वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र यादव के है ।

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