कांशीराम के जीवन का संघर्ष कैसा रहा ?

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By- Mahendra Yadav

1987-88 के आसपास की बात है। न चुनाव हो रहे थे, न मध्यप्रदेश में उस समय अक्सर होने वाले आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसी कोई घटना हो रही थी। छतरपुर जिले में कांशीराम की मेला ग्राउंड में एक सामान्य सभा होने जा रही थी।

अचानक महाराजा कॉलेज के सवर्ण छात्रों की बड़ी भीड़ जमा होने लगी। नारे लगाने लगी कि कांशीराम की सभा नहीं होने देनी है। कुछ दूरद्रष्टा आंदोलनकारी अंदेशा जताने लगे थे कि एक दिन यही आदमी देश पर शासन करेगा, इसलिए इसे अभी दबाना ज़रूरी है। सभा के आयोजक गिने-चुने संसाधनविहीन थे। सभा के लिए कई गांवों में मैंने भी जाकर प्रचार किया था। जब रैली का समय आया तो सवर्ण छात्रों ने सभास्थल ही घेर लिया। योजना थी कि कांशीराम को सभास्थल तक पहुंचने ही न दिया जाए।

तत्कालीन एसपी संतकुमार पासवान ने चतुराई दिखाई और कांशीराम को अलग रास्ते से सभास्थल तक पहुंचाया गया। मुझे याद है कि कड़ी पुलिस व्यवस्था के बीच भी कांशीराम की मौजूदगी में भी पंडाल को करीब दो बार गिराया गया था। ऐसे संघर्ष के बीच, जब रैली तक करना मुश्किल हो रहा हो, तब कांशीराम का संघर्ष जारी रहा। जल्द ही म.प्र. में बसपा 13 विधायक और पहले 1 फिर 2 सांसदों की पार्टी बन गई। फिर आगे क्या हुआ ? फिर पत्थर बाजी भी हुई परंतु मान्यवर साहेब का आंदोलन नहीं डिगा।

सभा के दौरान ही सवर्णों कि भीड़ ने दो बार मंच का पंडाल गिराया, उस समय आरक्षण विरोधी आंदोलन क्यों होते थे और काशीराम से लोगों को क्यो चिढ़ थी ? आरक्षण विरोधी आंदोलन होने का जो कारण अब है वही तब था। सारा माल खुद ही खाना था। पूरी बोगी में अकेले ही पसरकर बैठना था। तनिक भी स्पेस नहीं देना था किसी को, इसलिए आरक्षण विरोधी आंदोलन होते थे और आज भी होते हैं।

कांशीराम व्यापक ओबीसी-एससी को साथ लेकर चल रहे थे, पहचान तेजी से बनने लगी थी, ब्राह्मणों ने दूरबीन से देख लिया था कि ये कितना नुकसानदायक हो सकता है उनके लिए। उसके पहले 1985 में अर्जुन सिंह ने ओबीसी आरक्षण लागू करने का ऐलान किया था, चुनावों से कुछ समय पहले। चुनावों में आरक्षण बड़ा मुद्दा बन चुका था। अर्जुन सिंह ने ऐलान किया कि मतदान के बाद फैसला करूंगा। वोटिंग होते ही और ओबीसी के वोट समेटते ही, अर्जुन सिंह ने ओबीसी आरक्षण वापस ले लिया। तात्पर्य ये कि लागू तो एससी-एसटी आरक्षण ही था, लेकिन ओबीसी आरक्षण लागू होने का खतरा मंडराने लगा था।

ये लेख वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र यादव के फेसबुक पोस्ट से लिया गया है, इससे नेशनल इंडिया न्यूज का कोई संबंध नही है ।

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