‘फैक्ट’ के साथ खिलबाड़,, आखिर कब तक ???

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Aqil Raza~

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया (पत्रकारिता )पर आज के दौर में बड़ी आसानी के साथ सवाल उठ जाते हैं। कोई कहता है बिकाऊ मीडिया, तो कोई कहता है लाचार मीडिया, यहां तक कि लोग दलाल मीडिया कहने तक से भी परहेज़ नहीं करते। लेकिन हमें ये जानने की ज़रूरत है कि आखिर मीडिया पर इतने सवाल क्यों उठ रहे हैं। मीडिया लोकतंत्र का अगर चौथा स्तदंभ है तो में ये दावे के साथ कह सकता हूं कि मीडिया गलत नहीं हो सकती, मीडिया को चलाने वाले लोग गलत हो सकते हैं, इसका उधारण आपको हाल ही में हुई कासगंज घटना में मिल जाएगा।

कासगंज की घटना अभी शांत हुई नहीं है और कासगंज पर मीडिया द्वारा रिपोर्ट्स भी लोगों तक पहुंचाई जा रही है। मीडिया को बदनुमा धब्बा लगाने वाले कौन लोग हैं ये जानने से पहले कासगंज में जो हुआ उसे जानना ज़रूरी है। जिससे आप सही और गलत, या यूं कहो पत्रकारिता और चाटुकारिता का अंदाज़ा लगा सको।

दरअसल उस दिन चश्मदीद के मुताबिक हमीद चौक के पास मुसलमानों ने ध्वजारोहण का प्रोग्राम रखा था, और तिरंगा फहराने के लिए सारी तैयारी कर ली थी काफी संख्या में लोग इकठ्ठा भी हो गए थे, तभी सुबह 9 बजे के आसपास तिरंगा और भगवा झंडे के साथ 70-75 बाइक पर लोग आए.. तिरंगे के बीच भगवा झंडे लहराने लगे.. साथ में पाकिस्तान मुर्दाबाद, वन्दे मातरम, गाने के लिए जबरदस्ती करने लगे। इस पर वहां मौजूद लोगों ने विरोध किया और थाने में इसकी सूचना भी दी. बाइक सवार लोग गालियों के साथ मारपीट पर उतारू हो गए, जिसके बाद तिरंगा फह रहे लोगों ने उनके साथ हाथापाई करते हुये उन्हें खदेड़ा….वो लोग अपनी गाड़ियां छोड़ कर भागने लगे… थोड़ी देर में वहां पुलिस भी आ गई।

चश्मदीद के मुताबिक लगभग एक घंटे बाद वो लोग और ज्यादा संख्या में इकट्ठा होकर वापस आए और ज़ोर- ज़ोर से नारेबाजी करते रहे, वो नारेबाजी कर रहे थे.. भद्दी भद्दी गालियां दे रहे थे, और फिर देखत ही देखते हमला भी शुरू कर दिया। कुछ लोगों ने घरों में भी घुसने की कोशिश शुरू कर दी, लेकिन इस बीच प्रशासन अभी मूकदर्शक बना देखता रहा, जब स्थिति ज़्यादा बिगड़ने लगी तो पुलिस ने फायरिंग की, मगर इतना सब होने के बावजूद धारा 144 या अलर्ट जारी नहीं किया था.. इसी दौरान एटा के सांसद राजवीर सिंह उर्फ़ राजू ने पुलिस को न सिर्फ इस्तेमाल किया बल्कि उन्हीं के संरक्षण में सांप्रदायिक भाषण और हिंसा फैलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।

आपको बता दें कि कासगंज में 1990 के बाद से कभी कोई साम्प्रदायिक हिंसा नहीं हुई थी, और इस बार घटना का कोई तात्कालिक कारण नहीं था, बल्कि जान-बूझ कर हिंसा फैलाई गई। इसमें पुलिस प्रशासन की भूमिका संदिग्ध है। ये घटनाएं इन आरोपों की पुष्टि करती हैं कि पुलिस ने समय रहते कार्रवाई नहीं की, आरोप है कि इसके उलट उन्हीं लोगों का साथ दिया जो हिंसा के आरोपी हैं। सच अब निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा, लेकिन दुख इस बात का है कि पुलिस प्रशासन ने जान-बूझ कर सांप्रदायिक तत्वों को खुलेआम हिंसा करने की ढील दी।

लेकिन अब इसके बाद असली खेल शुरू होता है मैन स्ट्रीम मीडिया (मनुवादी मीडिया) का, देश का सबसे बड़ा न्यूज़ चैनल का दावा करने वाले खास न्यूज़ चैनल के एक खास प्रोग्राम में हिंसा को हवा देने और फैक्ट के साथ खिलबाड़ करने की शुरुआत हुई, जिसमें ये सवाल रखा गया कि क्या भारत में ‘भारत का नारा’ लगाना गलत है? दूसरा सवाल जब भारत में तिरंगा यात्रा नहीं निकालेंगे तो कहा निकालेंगे? तीसरे सवाल में कश्मीर को भी इस घटना से जोड़ा, इसके बाद दिखाया गया कि जब तिरंगा यात्रा निकाली जा रही थी तो पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे। लेकिन अफसोस इस बात का है कि जब तिरंगा यात्रा हमीद चौक पर रुकी, तो वो रोकने वाले लोग क्या काम करने के लिए इकठ्ठा हुए थे और वो क्या कर रहे थे, इस बात को टीवी एंकर ने क्यों नहीं दिखाया। सच्चाई को बताने या हमीद चौक पर लोग तिरंगा फहराने के लिए इकठ्ठा हुए थे ये बताने पर कौन आपसे नाराज़ हो जाता ?

ये क्यों नहीं बताया कि बाइक्स पर तिरंगा यात्रा निकालने वालों के साथ तिरंगा झंडे के अलावा एक और झंडा भी था जिसको वो तिरंगे के साथ फहरा रहे थे। उस टीवी एंकर ने तिरंगे को लेकर कश्मीर का उधारण तो दे दिया, ये क्यों नहीं दिया कि आज भी हमारे देश के सभी लोग एक साथ मिलकर तिरंगे को सलामी देते हैं और ये घटना शर्मसार है.. क्या ऐसा बोलने से लोगों में शांती का माहौल बनता और चाटुकारिता का मौका नहीं मिलता,, सिर्फ इसलिए ? ये सवाल हम सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि महज़ कुछ लोगों कि वजह से मीडिया और सच्चाई से रूबरूह कराने वाले सच्चे पत्रकार को भी इस बदनामी के दाग को सहना पड़ रहा है। एक दिन जनता आपसे पूंछेगी की फैक्ट के साथ खिलबाड़, आखिर कब तक ???????

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