Home Language Hindi फुले अम्बेडकरी आन्दोलन के अतीत और वर्तमान का अद्भुत मिलन अर्थात डॉ. मनीषा बांगर को इश्वरिबाई स्मृति सम्मान
Hindi - February 28, 2020

फुले अम्बेडकरी आन्दोलन के अतीत और वर्तमान का अद्भुत मिलन अर्थात डॉ. मनीषा बांगर को इश्वरिबाई स्मृति सम्मान

24 फरवरी को हैदराबाद में चार महिलाओं को ईश्वरीबाई स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया | जिसमे फुले-अम्बेडकरी आन्दोलन की तेजतर्रार सेनानी, सावित्रि,फातिमा,रमाई के सपनो की बुलंद तस्वीर, अद्भूत वक्ता, लेखिका, पत्रकार, मूलनिवासी बहुजन आन्दोलनकारी और प्रखर राजनेत्री डॉ मनीषा बांगर को भी इश्वरिबाई स्मृति सम्मान से नवाज़ा गया । यह उचित सन्मान तो मनीषा जी को मिलना ही था | यह केवल सन्मान या पुरस्कार का मसला नहीं था यह तो फुले-अम्बेडकरी आन्दोलन की दो शानदार समर्पित शख्सियत को एक दूसरे से रूबरू कराने का प्रसंग था | फुले-अम्बेडकरी आन्दोलन की दो मजबूत कड़ियों को जोड़ने का अवसर था |यह बात अलग है की इश्वरिबाई की गौरवान्वित एवं प्रेरणादायी शख्सियत को हम तक पहुँचने में 70 साल लग गए |

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के सुविख्यात लेखक पी एस सत्यनारायण अपनी किताब “Woman of Courage – J. Eashwari Bai ” में लिखते है. की इश्वरी बाई का संपूर्ण जीवन सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में बहुजन समाज के उत्थान के लिए समर्पित रहा |1 दिसंबर, 1918 को सिकंदराबाद के अनुसूचित जाति परिवार में जन्मी, इश्वरिबाई की शादी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण होने के साथ ही डॉ. जे. लक्ष्मीनारायण से हो गई जो पुणे में चिकित्सक थे । ईश्वरी बाई, बचपन से ही समाज में असमानताओं के अस्तित्व को अच्छी तरह से समझ रही थीं | इसीलिए ही वह सामाजिक न्याय की स्व-निर्मित महिला नेता बन गई और ब्राह्मणवादी समाजव्यवस्था से पीड़ित शोषित समाज की बहादुर सेनानी बन गईं ।

सिकंदराबाद में ही ईश्वरीबाई ने एक स्कूल शिक्षिका के रूप में अपने करियर की शुरूआत की । मगर वह केवल शिक्षिका नहीं थी, वह एक सामाजिक आन्दोलनकारी थी | 1950 में उन्होंने महिलाओं के लिए और सिलाई, कताई, बुनाई और अन्य शिल्प में महिलाओं को प्रशिक्षित करने के कार्य का प्रारंभ किया इतना ही नहीं बल्की और बाद में प्रशिक्षुओं के लिए स्व-रोजगार इकाइयों की भी शुरुआत की । उन्होंने चिलकलगुडा में उचित मूल्य की मेडिकल डिस्पेंसरी शुरू की । वहीँ, उन्होंने चिन्ताबाई इलाके में अपने स्वयं के धन से एक स्कूल का निर्माण किया और इसे सरकार को दान कर दिया । चूँकि वह सार्वजानिक जीवन में प्रवेश कर चुकी थी. 1950 में ही वह सिकंदराबाद नगर निगम की पार्षद चुनी गई थी । उन्होंने भारतीय समाज कल्याण सम्मेलन (ICSW) के सचिव और भारतीय रेड क्रॉस के सदस्य के रूप में भी काम किया|

1952 में वह बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर के संपर्क में आयीं और शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन से जुड़कर बाबा साहेब अम्बेडकर की अनुयायी बन गई । बाद में आजीवन वह रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की सदस्य बनी रहीं। 1960 में उन्हें, सिकंदरबाद कोर्ट में दो वर्षों के लिए मानद दंडाधिकारी नियुक्त किया गया। 1967 में एवं 1972 में, दो टर्म के लिए वह विधानसदस्य के रूप में चुनी गई; उन्हें स्त्री एवं बाल कल्याण निगम की अध्यक्षा के रूप में मनौनित किया गया | उच्च शिक्षा तक लड़कियों के लिए मुफ्त शिक्षा के लिए वह विधान सभा एवं बहार लडती रही | 1969 में, अलग तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर चल रहे आन्दोलन में वह शामिल हुई और इसी वजह से उनकी गिरफ़्तारी हुई और उन्हें हैदराबाद की चंचलगुडा जेल में जाना पड़ा |

अपने जीवन काल में, वह सशक्त महिला के रूप में उभरीं और आधुनिक तेलंगाना की निर्माता बनीं। ईश्वरी बाई ने अलग तेलंगाना, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण, बाल विकास, स्वच्छता, भूमि सुधार, जाति उन्मूलन, पुरुषों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त करने, सामाजिक-आर्थिक शोषण और शराब और जुए की लत छुड़ाने के लिए अपना योगदान दिया । यह उन दिनों में एक महिला नेत्री द्वारा किये गये अकल्पनीय एवं सराहनीय कार्य थे। ऐसी शानदार समर्पित शख्सियत जे. इश्वरिबाई के नाम से स्मृति सन्मान; तेजतर्रार एवं फुले अम्बेडकरी आन्दोलन की प्रखर नेत्री डॉ मनीषा बांगर को दिया जाना केवल संयोग नहीं बल्की फुले अम्बेडकरी आन्दोलन के अतीत और वर्त्तमान का अद्भुत मिलन ही था । वैसे मुझे नहीं लगता की मनीषा जी की शख्शियत आज किसी के द्वारा दी गई पहचान की मोहताज है. उनके विचार, उनके कार्य, उनके आन्दोलन ने ही उनकी शख्सियत को समाज जीवन में उभारा है।

मनीषा जी अपने समय की होनहार छात्रा रही है; उन्होंने MBBS और Internal Medicine में MD धम्मक्रांति की भूमि Nagpur से किया और Gastroenterology & Hepotology में DM, नई दिल्ली से किया । गौरवपूर्ण बात यह है की उनकी जो चिकित्सा छात्रजीवन की उपलब्धिया है वहां तक केवल 0.005 प्रतिशत महिला चिकित्सक ही पहुंच पायी है। उन्होंने अपनी करियर की शुरुआत मेडिकल कॉलेज में आसिस्टंट प्रोफेसर के रूप में की । यहां हम इस बात से अवगत है की इश्वरिबाई ने भी अपनी करियर की शुरुआत शिक्षिका के रूप में ही की थी.

डॉ. मनीषा बांगर ने अपनी मेहनत और लगन से अपने व्यवसायिक जीवन को भी बेमिसाल बनाया। वहां पर उन्होंने Indian National Association for the Study of the Liver की Governing Council एवम् Special task force की सदस्या के रूप में सक्रीय रूप से कार्य किया। उनकी तेजस्विता को देश की सरहदों को लांघना ही था, उन्होंने South Asian Association for Study of the Liver में infection control committee में अपने लिए जगह बनायी। जहां पर उन्होंने सामुदायिक स्तर पर स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच (Health Care Accessibility), पोषण जागरूकता (Nutrition Awareness), वायरल हेपेटाइटिस के नियंत्रण और रोकथाम (Prevention and Control of Viral Hepatitis) जैसे महत्वपूर्ण अभियान चलाये । और पिछले एक दशक से ज्यादा समय से वह इन संगठनो की governing body में स्ट्रेटेजी फोर्मुलेशन में अपना योगदान दे रही है ।

जब डॉ मनीषा बांगर, पारिवारिक कारणों से महाराष्ट्र से आंध्रप्रदेश और अब तेलंगाना में शिफ्ट हुए तो वहां पर भी उन्होंने अपने प्रभावपूर्ण व्यक्तित्व परिचय व्यवसायिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में दिया । उन्होंने Indian Association for study of Liver disease की ओर से आंध्रप्रदेश के 1 करोड़ लाभार्थिओं के लिए एक ECHO प्रोजेक्ट लॉन्च किया जिसका मकसद था Primary Care Physician को Interdisciplinary Expert team के साथ जोड़कर उन Primary Care Physician में सामान्य एवं जटिल Lever Disease के रोगियों के इलाज के लिए कौशल और ज्ञान विकसित करना । इन व्यवसायिक जिम्मेवारियो के बीच वह अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को कैसे भूल सकती थी । क्योंकि इसकी शिक्षा तो उनको फुले-अम्बेडकरवादी परिवार में जन्म लेने से ही मिल रही थी । छात्रावस्था में ही वह BAMCEF के कार्यक्रमों में सक्रीय रहती थी | बाद में वह BAMCEF से जुड़ गयी और वहाँ राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य बनी और राष्ट्रीय उपाध्यक्षा के रूप में नेतृत्व किया ।

आज सोशल मीडिया के जमाने में लोग जब हवा-हवाई में वाह वाही लूटने की फ़िराक में लगे रहते है; जिनका जमीनी स्तर पर कुछ भी कॉन्ट्रिब्यूशन नहीं होता ऐसे समय में मनीषा जी हमें दिखाई देती है जमीनी स्तर पर गुर्राते हुए आन्दोलन करती हुई. कभी स्त्री सन्मान पर, तो कभी मूलनिवासी पहचान पर, बहुजन आन्दोलन पर, राजनितिक वर्तमान पर, धर्म के विधि विधान पर, ब्राह्मणवाद और मनुवाद को आड़े हाथ लेते हुए धर्मान्धता की खाल उधेड़ते हुए । डरती नहीं कुछ भी कहने से, संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के अधिकार का उपयोग निर्भीकता से करते हुए। वह हर मोर्चे पर लडती हुई नज़र आती है. कोई भी मुद्दा हो, रोहित वेमुला संस्थागत हत्या का मुद्दा हो, भीमां-कोरेगांव का मुद्दा हो, मोब लीन्चिंग का मुद्दा हो, कैराना, ऊना, नागौर, उत्पीड़न कांड का मुद्दा हो, आरक्षण का मुद्दा हो, डेल्टा-जीशा-संजली-डॉ पायल तडवी-काजल परमार हत्याकांड का मुद्दा हो, EVM हैकिंग का मुद्दा हो, संविधान के मुद्दे हो, CAA\NCR का मुद्दा हो, शाहीनबाग़ आन्दोलन का मुद्दा हो, JNU, DU, Central Universities कैंपस के मुद्दे हो, साम्यवादी षड्यंत्रों के मुद्दे हो, UGC के मुद्दे हो, मुद्दा 13 पॉइंट रोस्टर आन्दोलन का हो, बहुजनों के विरुद्ध सरकारी षड्यंत्रों के मुद्दे हो, मूलनिवासी संस्कृति एवं सभ्यता के मुद्दे हो, धर्मान्धता के मुद्दे हो,अर्थव्यवस्था के मुद्दे हो, बहुजन सामाजिक संगठनो की गतिविधियाँ हो, बहुजन आन्दोलन के सन्दर्भ में कुछ भी हो, पलभर में मनीषा जी हमें जमीनी स्तर पर आन्दोलनकारियों के साथ पहली पंक्ति में दिखाई देती है.

इतना ही नहीं, मूलनिवासी, बहुजन, फुले अम्बेडकरी विचारधारा आधारित विमर्श लिए सोशल मीडिया में भी तुरत-फ़ुरत उपस्थित रहती है. जिन मुद्दों पर शेठजी भट्टजी मीडिया चुप्पी साध लेता है, वहां जलते सवालों की बौछार लिए चट्टान की तरह खडी हो जाती है National India News की मुख्य निर्देशिका रूप में । वहां पर इंटरव्यूज, विमर्श, बहस, सवाल लिए मूलनिवासी बहुजन आन्दोलन को नए आयाम देते हुए नज़र आती है । अपने व्यवसायिक व्यस्थता के बावजूद वह फुले अम्बेडकरी विचारधारा के आधार पर सामाजिक राजनितिक जनजागरण के लिए प्रतिबद्ध होकर लगी रहती है। पिछले दो तीन सालों से राजनितिक पटल पर भी सक्रिय हुई है पीपल्स पार्टी ऑफ़ इंडिया (डेमोक्रेटिक) की राष्ट्रिय उपाध्यक्ष के रूप में ।

सामाजिक राजनितिक जनजागरण की जिन बुलंदियों को आज वह छू रही है इसके लिए इतना ही कहा जा सकता है की… नज़र-नज़र में उतरना कमाल होता है, नफ़स-नफ़स में बिखरना कमाल होता है, बुलंदियों पे पहुँचना कोई कमाल नहीं, बुलंदियों पे ठहरना कमाल होता है। मनीषा जी के मिशन के साथी के रूप में, एक मित्र के रूप में मिलना बेहद ख़ुशी ही नहीं बड़े ही गर्व और गौरव की बात है। आज जब उनको इश्वरिबाई स्मृति सम्मान से नवाज़ा गया तो बिल्कुल ऐसी अनुभूति हो रही है की जैसे फुले अम्बेडकरी आन्दोलन के अतीत और वर्त्तमान का अद्भुत मिलन हुआ हो | आज उनकी यह प्रेरणादायी उपलब्धि को सलाम, वंदन, आदाब, करते हुए मुईन शादाब का यह शेर उनकी खिदमत में पेश करना चाहुंगा । उस पर ही फूलों की बारिश होती है, जिसकी हर बात में चिंगारी होती है |अंत में डॉ मनीषा बांगर जी को इतना जरूर कहूंगा की हमें आप पर बेहद गर्व है |डॉ. जे डी चंद्रपाल,सामाजिक चिंतक, राजनीतिक विश्लेषक, लेखक. मैनेजमेंट प्रशिक्षक
पूर्व वरिष्ठ कार्य प्रभारी, बामसेफ
अहमदाबाद गुजरात

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